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उच्चतम न्यायालय का एनजेएसी विधेयक को चुनौती देने वाली याचिका को स्वीकार करने से इंकार Print
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Monday, 25 August 2014 16:32


 नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति संबंधी कोलेजियम व्यवस्था के स्थान पर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) के तहत नई व्यवस्था स्थापित करने के लिए लाए गए संविधान संशोधन विधेयक की संवैधानिक वैधता के मुद्दे पर ‘‘इस चरण में ’’ हस्तक्षेप करने से आज इंकार कर दिया । 


    121वें संविधान संशोधन तथा एनजेएसी विधेयक को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को स्वीकार करने से इंकार करते हुए न्यायाधीश ए आर दवे की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि याचिकाएं ‘‘समय से पूर्व’’ आयी हैं । पीठ ने इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं को बाद के चरण में न्यायालय से संपर्क करने की अनुमति दी। 

    पीठ ने कहा, ‘‘ हमारा यह विचार है कि याचिकाएं समय से पूर्व आयी हैं । याचिकाकर्ताओं को अनुमति है कि वे बाद के चरण में इसी आधार पर न्यायालय से संपर्क कर सकते हैं ।’’

    पीठ में न्यायाधीश जे चेलमेश्वर और न्यायाधीश ए के सीकरी भी शामिल हैं।

    एनजेएसी विधेयक के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई के लिए विशेष तौर पर हुई बैठक में पीठ ने करीब डेढ़ घंटे तक धैर्य के साथ बात को सुना लेकिन इस चरण में विधेयक के संबंध में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया।

   एनजेएसी के संबंध में उठाए गए कदम को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग करते हुए


उच्चतम न्यायालय में चार जनहित याचिकाएं दाखिल की गयी हैं । संसद ने हाल ही में संपन्न बजट सत्र में उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों के लिए कोलेजियम व्यवस्था को समाप्त करने और इसके स्थान पर नयी प्रणाली स्थापित करने को लेकर दो विधेयक पारित किए थे। 

    जनहित याचिकाएं पूर्व अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल बिश्वजीत भट्टाचार्य , अधिवक्ताओं आर के कपूर और मनोहर लाल शर्मा तथा उच्चतम न्यायालय के कोर्ट एडवोकेट्स आन रिकार्ड ऐसोसिएशन की ओर से दाखिल की गयी हैं।

    वकीलों ने अपनी याचिकाओं में कहा है कि संसद द्वारा पारित एनजेएसी विधेयक और 121वां संविधान संशोधन विधेयक असंवैधानिक हैं क्योंकि ये संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करते हैं ।

    उन्होंने कहा कि संविधान स्वयं न्यायपालिका को कार्यकारिणी से स्पष्ट रूप से अलग रखने को मान्यता देता है जो एक मजबूत न्यायिक व्यवस्था की प्रमुख ताकत है।

    कपूर ने शीर्ष अदालत से कहा, ‘‘यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि संविधान के तहत राज्यों के नीति निर्देशक सिद्धांतों का अनुच्छेद 50 न केवल निचली न्यायपालिका पर लागू होता है बल्कि यह उच्च न्यायपालिका पर भी लागू होता है क्योंकि शक्तियों का बंटवारा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूलभूत अचल विशेषताएं हैं।’’

(भाषा)


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