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विजय कुमार मल्होत्रा के चुनाव लड़ने के एलान से विजय गोयल के मंसूबों पर पानी फिरा Print
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Thursday, 10 October 2013 09:37

नरेंद्र भंडारी
नई दिल्ली। दिल्ली भाजपा में विधानसभा चुनावों के टिकट बंटवारे को लेकर राजनीतिक ऊथल-पुथल तेज हो गई है। दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रोफेसर विजय कुमार मल्होत्रा के इस बार भी विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ ही भाजपा संगठन में कई नेताओं का राजनीतिक गणित गड़बड़ा गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी का ख्वाब देख रहे कई नेताओं को मल्होत्रा के इस फैसले से गहरा झटका लगा है। उन्हें लग रहा है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी के एक दावेदार और हो गए हैं। भाजपा ने इस बार चुनावों में किसी भी का नाम मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए घोषित नहीं करने का फैसला किया है।
आगामी विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा में टिकटों को लेकर सरगर्मियां बढ़ गईं हैं। टिकटों के बंटवारे को लेकर पता चलेगा कि किस गुट के लोगों को ज्यादा टिकट हासिल हुईं हैं। अगर चुनावों में भाजपा की जीत होती है तो उस गुट का ज्यादा असर होगा, जिसके ज्यादा लोग चुनाव में जीतंगे। टिकटों को लेकर भाजपा कई धड़ों में बंटी हुई है। एक गुट मौजूदा प्रदेशाध्यक्ष विजय गोयल का, दूसरा गुट प्रोफेसर विजय कुमार मल्होत्रा का और तीसरा प्रवेश वर्मा का है। वैसे टिकटों के बंटवारे को लेकर मुख्य मुकाबला प्रोफेसर मल्होत्रा और विजय गोयल के बीच है। यह मुकाबला मौजूदा चुनावों से ही नहीं बल्कि पिछले कई चुनावों से है। चाहे वे आम चुनाव हो, विधानसभा चुनाव हो या फिर दिल्ली नगर निगम का चुनाव हो। ज्यादातर चुनावों में टिकट बंटवारे को लेकर प्रोफेसर मल्होत्रा की चली है। कई बार तो गोयल टिकट बंटवारा कमेटी की बैठकों का बहिष्कार भी कर चुके हैं। लेकिन इस बार हालात दूसरे हैं। गोयल भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष हैं और चुनाव कमेटी के अध्यक्ष भी हैं।
दिल्ली विधानसभा के गठन के बाद हुए चुनावों में भाजपा एक बार और कांग्रेस तीन बार चुनाव जीत चुकी है। वर्ष 1993 का विधानसभा चुनाव भाजपा ने जीता था। उसके बाद वर्ष 1998 का चुनाव मदनलाल खुराना की अगुआई में लड़ा गया और भाजपा को 14 सीटें हासिल हुईं। वर्ष 2003 का चुनाव सुषमा स्वराज की अगुआई में लड़ा गया और उस दौरान भाजपा को 19 सीटें हासिल हुईं। वर्ष 2008 का चुनाव प्रोफेसर विजय कुमार मल्होत्रा की अगुआई में लड़ा गया


और भाजपा को 24 सीटें हासिल हुईं। अब वर्ष 2013 का चुनाव पार्टी किसी के भी नेतृत्व में नहीं लड़ रही है। लेकिन भाजपा में कई नेता दिल्ली की मुख्यमंत्री का ख्वाब देख रहे हैं। इनमें सबसे प्रबल दावेदार विजय गोयल हैं,जो किसी भी तरह का जोड़-तोड़ करके दिल्ली के मुख्यमंत्री की गद्दी तक पहुंचना चाहते हैं। वैसे भाजपा में सबसे गंभीर दावेदार डा हर्षवर्धन माने जा रहे हैं। इनके अलावा विजेंद्र गुप्ता भी अपने लिए लाबिंग कर रहे हैं। भाजपा में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए आतुर नेता उस समय तक राजनीतिक चैन में थे, जब तक उन्हें लगा कि मल्होत्रा इस बार का विधानसभा का चुनाव नहीं लडेंÞगे। वैसे प्रोफेसर मल्होत्रा इस बार अपनी ग्रेटर कैलाश सीट से अपने पुत्र अजय मल्होत्रा को चुनाव लड़वाना चाहते थे। संगठन में उनके राजनीतिक विरोधी उनके इस फैसले से इन दिनों काफी प्रसन्न भी थे। दिल्ली की राजनीति में गोयल का मल्होत्रा से छत्तीस का आंकड़ा रहा है। इस बार का चुनाव नहीं लड़ने के मल्होत्रा के फैसले से गोयल गुट आश्वस्त था। मल्होत्रा को अब अपने लिए खतरा नहीं मानकर गोयल ने संगठन की सभी प्रचार सामग्रियों में अपनी तस्वीरों के साथ प्रोफेसर मल्होत्रा की भी तस्वीरें प्रकाशित करनी शुरू कर दीं। इसके साथ ही प्रोफेसर मल्होत्रा विरोधी गुट ने उनके पुत्र को हल्का उम्मीदवार बताकर विजय जौली को वहां से चुनाव लड़ने के लिए तैयार कर दिया। कभी साकेत और कभी नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़ चुके जौली इस बार अपने लिए कोई सुरक्षित सीट तलाश रहे थे। उधर प्रोफेसर मल्होत्रा का जब इस राजनीतिक खेल का पता लगा तो उन्होंने फिर से विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। दिल्ली नगर निगम से दो बार, महानगर परिषद से दो बार, लोकसभा से चार बार चुनाव लड़ चुके और छह साल तक राज्यसभा सांसद रहे प्रोफेसर मलहोत्रा के इस राजनीतिक फैसले से उनके विरोधी हतप्रभ हैं। अब उन्हें सूझ नहीं रहा है कि राजनीति के इस माहिर खिलाड़ी का वे जवाब किस तरह से दें।

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