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दिल्ली: मुख्यमंत्री की उम्मीदवारी पर भाजपा में घमासान Print
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Thursday, 10 October 2013 09:33

मनोज मिश्र
नई दिल्ली। मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर चुनाव लड़ने की परंपरा अब भाजपा के गले की फांस बनती जा रही है। चुनाव की तारीख घोषित हो जाने के बावजूद भाजपा का एक वर्ग अभी भी मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करवाने के लिए सक्रिय है, जबकि कोई उम्मीदवार न घोषित होने पर प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल के समर्थक और मीडिया का एक वर्ग उन्हें ही मुख्यमंत्री का उम्मीदवार प्रचारित कर रहा है। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने यह कह कर नई बहस छेड़ दी है कि वे मुख्यमंत्री बने या न बने कांग्रेस चौथी बार विधानसभा चुनाव जीतेगी। कांग्रेस में तो मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने की परंपरा ही नहीं है। चुनाव नतीजों के बाद विधायक दल प्रस्ताव पास करके मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार कांग्रेस अध्यक्ष को दे देता है और वहीं से जो नाम तय होता है वह मुख्यमंत्री बन जाता है।
भाजपा ने पांच महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए तो प्रधानमंत्री का उम्मीदवार  घोषित कर दिया लेकिन दिल्ली विधानसभा के लिए किसी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषिच नहीं किया। और इसके पहले अचानक 15 फरवरी को विजेंद्र गुप्ता के स्थान पर विजय गोयल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। फिर दो महीने बाद अचानक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने की तैयारी कर ली गई और जब यह जानकारी मीडिया में आ गई तो घोषणा टाल दी गई। तब से पार्टी के दिल्ली चुनाव के प्रभारी नितिन गडकरी और दूसरे नेता इसी नाप-तोल में लगे हुए हैं कि मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने से पार्टी को फायदा होगा या घाटा।
पिछले विधानसभा चुनाव में तो शुरू से पार्टी की बागडोर तब के प्रदेश अध्यक्ष डा हर्षवर्धन के हाथ में थी। अचानक 26 सितंबर 2008 को पार्टी नेतृत्व ने वरिष्ठ नेता विजय कुमार मल्होत्रा को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया। डा हर्षवर्धन ने उनका सहयोग किया लेकिन उसके साल भर पहले हुए निगम चुनाव की जीत का सारा जोश कार्यकर्ताओं में ठंडा पड़ गया था। कुल 62,42,917 मत डले और उसमें कांग्रेस को 24,89,817 और भाजपा को 22,75,711 मत मिले यानी भाजपा 2,14,106 मतों के अंतर से चुनाव हार गई। बसपा को 9,01,670 वोट मिले थे। कांग्रेस को 70 में 43 और भाजपा को 23  सीटें मिलीं। उप चुनावों और अदला-बदली के बाद अभी कांग्रेस के तो 43 सदस्य ही हैं भाजपा के सदस्य 24 हो गए हैं। 1993 के विधानसभा चुनाव के समय मदन लाल खुराना प्रदेश भाजपा अध्यक्ष थे। काफी प्रयास करने के बाद पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया। पार्टी ने उन्हें फ्री हैंड दिया तो नतीजे भाजपा के हक में आए। उसका एक कारण तो जनता दल को मिले 18 फीसद वोट भी माने जा रहे हैं।
1998 के विधानसभा चुनाव के पहले तो भाजपा में भारी गुटबाजी चली। खुराना के दबाव में साहिब सिंह वर्मा को हटाया गया लेकिन इन दोनों के न चाहते हुए सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाकर उन पर अगले चुनाव में भाजपा को जिताने की जिम्मेदारी दे दी गई। वह प्रयोग कामयाब नहीं हुआ। भाजपा चुनाव हारी। उसी तरह 2002 के नगर निगम चुनाव हारने के बाद मांगेराम गर्ग को प्रदेस अध्यक्ष से हटा कर


फिर से खुराना को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। तब तक हालात काफी बदल चुके थे। इस बार खुराना नहीं चले और शीला दीक्षित का एजंडा चल गया। खुराना उससे पहले और उसके बाद कई प्रयोग कर चुके थे। यह चुनाव खुराना युग के समापन की घोषणा करने वाला था। खुराना के साथी मल्होत्रा को खुराना के रहते ज्यादा महत्व नहीं मिला तो उन्होंने उसके बाद अपनी चलवा ली। नतीजे जगजाहिर होने के बाद ही इस बार पार्टी नेतृत्व अभी तक फैसले नहीं ले पा रही है।
दरअसल सर्वेक्षणों की परंपरा ने मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री के उम्मीदवार घोषित करने की परंपरा को और बढ़ाया है। उसी के साथ-साथ मीडिया में भी सर्वेक्षण को कवर करवाने या खुद सर्वेक्षण करने की होड़-सी लग गई। उसके बाद तो पार्टियां अपने आप मुख्यमंत्री के उम्मीदवार घोषित करने लगीं। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना था कि अगर पार्टी ढंग का उम्मीदवार घोषित नहीं करेगी तब यही होगा कि शीला दीक्षित की तुलना अरविंद केजरीवाल जैसे नेता से की जाएगी। कांग्रेस में तो शीला दीक्षित के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा हुई है और उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार अपने-आप मान लिया गया है। 1998 में पूर्वी दिल्ली लोकसभा चुनाव हारने के बाद उन्हें चौ प्रेम सिंह को हटा कर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। उन्हें अध्यक्ष बनवाने वाले नेताओं में एचकेएल भगत, सज्जन कुमार, जगदीश टाईटलर आदि 1984 के सिख विरोधी दंगे के आरोपी होने के चलते खुद प्रदेश अध्यक्ष नहीं बन सकते थे तो उन्होंने दिल्ली की राजनीति की कम जानकार और कम पकड़ वाली शीला दीक्षित को प्रदेश अध्यक्ष बनवाया। साल भर में दीक्षित ने जता दिया कि वे अपने हिसाब से चलेंगी तो सभी उनके खिलाफ हो गए। बड़ा अभियान चला। शीला दीक्षित न केवल बच गईं बल्कि अपनी जमीन को सबसे ज्यादा मजबूत बना लिया।
2003 का विधानसभा चुनाव आते-आते तो दिल्ली में उनका सिक्का चलने लगा। बसपा के बढ़ते असर को कम करने के लिए 2002 में फिर चौ प्रेम सिंह को विधानसभा अध्यक्ष के बजाय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। चौ प्रेम सिंह के समर्थकों ने यही प्रचारित किया कि अगर कांग्रेस जीती तो प्रेम सिंह मुख्यमंत्री होंगे। लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद प्रेम सिंह के विधायकों की राय लेने की जिद के बाबजूद शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं। उन्होंने चुनाव में चालाकी से मौजूदा विधायकों को फिर से टिकट देने की वकालत की थी जबकि प्रेम सिंह एक दो टिकट पर ही अटक गए थे। दूसरे उनके दिल्ली में नए प्रयोगों का भी यह चुनाव था। तीसरे चुनाव में तो वे अपने आप मुख्यमंत्री की उम्मीदवार बन गईं, जैसे इस बार बनी हुई हैं। सभी नेता भी उन्हीं का नाम लेते हैं, वैसे पार्टी नेतृत्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात करता है लेकिन भाजपा में चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद भी किसी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार तय नहीं हो सका है लेकिन ऐसी घोषणा की जरूरत पार्टी के ज्यादातर लोग महसूस कर रहे हैं।

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