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भाषा : हिंदी और सियासत Print
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Sunday, 06 July 2014 09:50

गिरिराज किशोर

जनसत्ता 06 जुलाई, 2014 : बड़ी मुश्किल से दिल को करार आया था। आजादी के बाद हिंदी कठिन दिनों से गुजर कर यहां तक पहुंची थी। अपनी सहयोगी भाषाओं के साथ बहनापे का वातावरण बना था। अहिंदी प्रदेशों में जाने पर ऐसा नहीं लगता था कि कोई हमें बदली हुई नजरों से देख रहा है। तमिलनाडु में भी भाषाई वैमनस्य नजर नहीं आता। पर वर्तमान सरकार ने वह माहौल बिगाड़ने का प्रयास किया है। 

हिंदी देश के कोने-कोने में आजादी के जज्बे की संवाहक बनी थी, लेकिन उसे राजभाषा करार दिया जाना उसके लिए सबसे बड़ी गांठ बन गई। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव राजभाषा में बदल गया। राजभाषा की इस कल्पना ने हिंदी को ऐसा राजनीतिक नाम दे दिया, जिसने उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व राजाश्रयी बना दिया। इंग्लैंड में सत्रहवीं शताब्दी में अंगरेजी की स्थिति हिंदी से भी अधिक उपेक्षित थी। वहां फ्रेंच का आधिपत्य था। कुलीन समाज और सरकार फ्रेंच के प्रेमी थे। संसद में अंगरेजी बोलना असभ्यता माना जाता था। हिंदी की स्थिति आजादी से पहले और बाद में भी ऐसी नहीं थी। पर अंगरेजी को स्थान देने के लिए इंग्लैंड ने राजभाषा बनाने जैसा मध्यमार्ग नहीं निकाला। 

हमारे यहां हिंदी को न राष्ट्रभाषा रहने दिया गया और न जनभाषा। जो लोग इसे राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे उनके हाथ में राजभाषा का खिलौना थमा दिया गया। हिंदी ने कभी नहीं चाहा कि वह राजाश्रयी बने। वह खेत-खलिहानों और झोपड़ियों से निकली थी। अमीर खुसरो, कबीर, सूरदास, जायसी आदि से लेकर यहां तक पहुंची थी कि इतने बड़े देश की आजादी का माध्यम बनी।

आजादी के बाद जो निजाम आया वह उन लोगों का था, जो कुछ को छोड़ कर, मेड इन इंग्लैंड थे। गांधी को छोड़ कर ज्यादातर लोग यही चाहते थे कि हिंदुस्तान को पाश्चात्य शैली में ढाल दिया जाए। यह तभी हो सकता था, जब पोशाक के साथ मानसिकता भी बदले। वह मैकाले के सिद्धांत से ही संभव हो सकता था। रहो बेशक हिंदुस्तान में, पर सभ्यता और भाषा पाश्चात्य हो। वही हुआ। गांधी हार गए, उनके साथ वे सब उपकरण हार गए, जिन्होंने भारतीयता को बचाए रख कर देश की आजादी को साकार किया था। इसकी शुरुआत हिंदी के गले में सरकारी तौक डालने से हुई थी। उसे राजभाषा की गद्दी दी। राजभाषा का क्या मतलब था या है? उसे लगभग तीन सौ करोड़ रुपए आबंटित करके दूसरी भाषाओं से अलग कर दिया गया। वैमनस्यता का आरंभ वहीं से हुआ। 

कैसा मजाक था, क्या कोई भाषा पैसे के बल पर राष्ट्रभाषा बन सकती है? भाषा का सम्मान भावना से होता है धन की प्रस्तावना से नहीं। भाषा अपनी मौलिकता और जन-आधार से बनती है। हिंदी वालों की भी गलती थी कि वे उसे सत्ता के बल पर राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे, बिना यह समझे कि वह जमीन से निकलने वाला सोता है, जो स्वत: फैल कर धारा बना है। उसे अपनी गति से विस्तार पाने दो। पर तत्कालीन सरकार और उसके समर्थक यही चाहते थे कि उसे बांध दें। उसी हालत में उनकी चहेती भाषा अंगरेजी स्थानापन्न राष्ट्रभाषा हो सकती थी। वही हुआ कि पंद्रह साल बाद अपर्याप्तता का ठप्पा लगा कर संसद से पारित करा लिया गया कि अगर एक भी प्रदेश हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के विरुद्ध होगा तो उसे राष्ट्रभाषा नहीं बनाया जाएगा। यह भाषा/भाषाओं का कैसा अपमान, और क्यों? हिंदी के साथ अंगरेजी संपर्क भाषा! दो की दौड़ में एक को रोक कर दूसरी को आगे निकाल दिया गया। वह कहने को दो संपर्क भाषाओं में से एक है, पर वास्तव में अब अंगरेजी ही स्थानापन्न राष्ट्रभाषा है। 

अंगरेजी के जिन वरद पुत्रों ने यह सब राग रचा, हिंदी के ही नहीं, सब भारतीय भाषाओं के विकास पर अवरोध लगा दिया। सब भाषाएं अपने-अपने क्षेत्र में भले फलती-फूलती दिख रही हों, पर उनके माथे पर चिंता की रेखाएं हैं। अंगरेजी की अमर बेल उन्हें परेशान कर रही है। 

सवाल यह नहीं कि कौन-सी भाषा मर जाएगी या कब तक रहेगी। भाषाएं दीर्घजीवी होती हैं। सत्ता द्वारा बहुभाषी देश में भाषाओं को मोहरे की तरह चलना देश की अस्मिता और एकता को संकट में डालना है। जब से देश आजाद हुआ है, हिंदी को सियासत का मोहरा बनाया जा रहा है। मुझे स्वामी सत्यप्रकाश, पूर्व अध्यक्ष रसायनशास्त्र विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने बताया था


कि देश की आजादी के बाद विश्वविद्यालयों में विज्ञान तक हिंदी माध्यम से पढ़ाना शुरू कर दिया था। लेकिन अचानक भारत सरकार का गोपनीय सर्कुलर आया ‘गो-स्लो’। 

भारत सरकार लगातार हिंदी के साथ यह खेल खेलती रही। सबसे बड़ा और विवादास्पद बनाने वाला खेल था हिंदी को राजभाषा बना कर एक बड़ी धनराशि आबंटित कर देना। यह जो बार-बार तमिलनाडु और अन्य अहिंदीभाषी राजनेताओं द्वारा सवाल उठाया जाता है कि हिंदी को आगे बढ़ा कर दूसरी भाषाओं का अवमूल्यन किया जा रहा है, उसका जन्म उसी क्षण हो गया था, जब हिंदी को सरकार ने साजिशन राजभाषा का दर्जा देकर, बड़ी धनराशि आबंटित कर दी। 

अब गृह मंत्रालय ने केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों, सार्वजनिक उद्यमों और बैंकों से सोशल मीडिया के आधिकारिक एकाउंट में हिंदी को प्रमुखता देने को कहा है, यहां तक कि ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉग आदि का परिचालन करने वाले अधिकारियों को अंगरेजी-हिंदी का इस्तेमाल करना चाहिए। आगे यह भी जोड़ा है कि हिंदी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। क्या गृह मंत्रालय को यह अंदाजा नहीं था कि यह सब करने से कितना बवाल मचेगा? हिंदी ने न पहले कहा कि उसे राजभाषा बनाया जाए और न अब कहती है कि उसे राष्ट्रभाषा बना दो। वह सबको जोड़ने का प्रयत्न करती है। 

यह गृह मंत्रालय का स्वेच्छाचारी आदेश है। जिस शब्दावली में यह आदेश जारी किया गया, वह दूसरी भाषाभाषी सरकारों और नौकरशाहों को परेशान करने वाला है। उसकी यही प्रतिक्रिया होनी थी, जो हुई है। गृहमंत्री तो राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं, उन्होंने उस विकल्पहीन आदेश का मसविदा कैसे स्वीकार कर लिया। 

सरकारें हिंदी को बार-बार असम्मान और विरोध की स्थिति में क्यों डाल देती हैं? यह तो किसी बच्चे की तरह ठहरे जल में ढेला फेंक कर तमाशा देखना हुआ। हिंदी का सम्मान न कर सकें तो अपमान भी न कीजिए। केंद्र सरकार अपने स्तर पर हिंदी को कामकाज की भाषा बनाने के बारे में गंभीर थी, तो उसे सभी राज्यों से मशविरा करना चाहिए था। यह बहुभाषी देश है, यहां शासनादेश निकाल कर किसी भाषा को राजकाज की भाषा नहीं बनाया जा सकता। 

एकदम से आप ट्विटर फेसबुक, ब्लॉग आदि पर हिंदी को प्रमुखता देने की बात कैसे कह सकते हैं। बहुभाषी अधिकारियों-कर्मचारियों से यह कहना कि वे हिंदी को प्रमुखता दें, उन्हें धर्मसंकट में डालना है। उसमें काम करने वालों को आर्थिक प्रोत्साहन से जोड़ देना दूसरी भाषाओं के लिए ईर्ष्या का विषय हो जाना स्वाभाविक है। बेहतर होता कि इस आदेश को केवल कार्यालयी कामकाज से जोड़ा जाता। उसमें सोशल मीडिया को न जोड़ा जाता। द्रमुक और अन्ना द्रमुक की तरफ से प्रतिवाद आने के बाद केंद्र सरकार बचाव में आ गई। यह तभी होता है, जब बिना सोचे-समझे कदम उठाए जाते हैं। जो बाद में स्पष्टीकरण दिया गया वह उसी शासनादेश में जोड़ा जा सकता था कि यह आदेश हिंदी प्रदेशों से संबंधित है। 

हिंदी भाषा की बार-बार बेहुर्मती करना गवारा नहीं। आप सियासत में अच्छे दिन लाएं या बुरे, पर अपने हित के लिए दूसरी सहयोगी भाषाओं को यह अहसास कराना कि हिंदी उनका अवमूल्यन करना चाहती है, उनके लिए अपमानजनक है। हिंदी को आगे बढ़ने के लिए किसी सरकार या प्रदेश की मदद की आवश्यकता नहीं है। वह जहां है, उसे वहीं रहने दें। हो सकता है, मेरे कुछ साथियों को ठीक न लगे, पर हिंदी की अपनी सामर्थ्य और जिजीविषा इतनी है कि बहते जल की तरह किसी भी अवरोध को लांघ सकती है। 


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