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निनाद : आस्था और विरोध Print
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Sunday, 29 June 2014 11:04

altकुलदीप कुमार

जनसत्ता 29 जून, 2014 : शिरडी के सार्इं बाबा के बारे में द्वारकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद की बेवजह टिप्पणियों ने एक बार फिर समूचे भारतीय समाज- खासकर हिंदू समाज- को आईना देखने पर मजबूर कर दिया है। स्वामी स्वरूपानंद ने हिंदुओं से कहा है कि वे सार्इं बाबा के मंदिर में न जाएं, क्योंकि उनकी राय में उन्हें भगवान नहीं माना जा सकता। स्वामी स्वरूपानंद को इस बात पर भी एतराज है कि सार्इं बाबा के मंदिर को सालाना अरबों रुपए की आमदनी होती है। कांग्रेस के नजदीक माने जाने वाले इन शंकराचार्य की यह भी राय है कि सार्इं बाबा को हिंदू-मुसलिम एकता का प्रतीक नहीं माना जा सकता। 

द्वारकापीठ को महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों में गिना जाता है। नवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में जब इन मठों की स्थापना हुई थी, तब इन्होंने कर्मकांड पर आधारित मीमांसा और संसार से विरक्ति पर आधारित बौद्ध मत का विरोध करके एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। शंकर अद्वैतवाद के अद्भुत व्याख्याकार थे। काशी में चांडाल के साथ उनका संवाद इस बात का प्रमाण है कि उनके समय में ही उनकी दार्शनिक स्थापनाओं के क्रांतिकारी निष्कर्ष निकाले जाने लगे थे। लेकिन समाज-व्यवस्था में जाति की जकड़न इतनी मजबूत थी कि आखिरकार उनका दर्शन भी यथास्थिति के पक्ष में खड़ा हो गया और पारमार्थिक और व्यावहारिक सत्ता जैसी अवधारणाएं निकाली गर्इं, ताकि अद्वैत यानी पूरे विश्व में एक ही तत्त्व के दर्शन करने वाला सिद्धांत आखिरकार समाज के स्तर पर जाति और वर्गभेद को भी स्वीकार कर सके। 

नवीं शताब्दी के आरंभ में तो यह ब्राह्मण और चांडाल के एक होने का विचार अपने समय से बहुत आगे का था, लेकिन आज नहीं है। क्या किसी ने कभी सुना कि किसी भी शंकराचार्य या अन्य महंत-मठाधीश ने जाति-व्यवस्था के खिलाफ एक शब्द भी कहा हो। हकीकत यह है कि ये सभी पीठ दकियानूसी और पुरातनपंथी हिंदू धर्म का ही प्रचार-प्रसार करते हैं और शुद्धता और परंपरा के नाम पर हमेशा प्रगति के विरोध में खड़े मिलते हैं। यही नहीं, जगद्गुरु कहे जाने वाले ये शंकराचार्य अक्सर एक-दूसरे के खिलाफ मुकदमे लड़ते हुए भी पाए जाते हैं। 

इसलिए आश्चर्य नहीं कि सार्इं बाबा के मंदिर को होने वाली आय स्वामी स्वरूपानंद की आंख में गड़ रही है। मंदिर में न जाने का उनका निर्देश मानना या न मानना उनके अनुयायियों पर निर्भर है। लेकिन उनकी इस घोषणा का विरोध करना जरूरी है कि सार्इं बाबा हिंदू-मुसलिम एकता का प्रतीक नहीं थे। उनके बारे में प्राप्त जानकारी के आधार पर निश्चय के साथ कहा जा सकता है कि वे भक्त और सूफी संतों की परंपरा के उत्कृष्ट प्रतिनिधि थे और उनके जीवन और विचारों में धार्मिक संकीर्णता का कोई स्थान नहीं था। वे फाके करके रहते थे, एक टूटी-फूटी मस्जिद में उनका बसेरा था और वे हिंदुओं और मुसलमानों के त्योहारों में समान रूप से शिरकत करते थे। जिस मस्जिद में वे रहते थे, उसका नाम उन्होंने द्वारका के नाम पर रखा था। आज तक उनके भक्त यह तय नहीं कर पाए हैं कि वे हिंदू थे या मुसलमान। और उनके भक्तों में सभी धर्मों के लोग शामिल भी हैं। 

मगर यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि उनके अधिकतर भक्त उनके प्रति इसलिए श्रद्धा-भक्ति रखते हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास है कि सार्इं की कृपा से उनके सभी मनोरथ पूरे होंगे। मनोरथ पूरे होने की आशा में और पूरे होने के बाद वे मंदिर में आकर लाखों रुपए का चढ़ावा चढ़ाते हैं, उनकी प्रतिमा पर हीरे-जवाहरात से जड़े सोने के मुकुट पहनाते हैं और उनकी ईश्वर मान कर पूजा करते हैं, जबकि सार्इं बाबा ने कभी दावा नहीं किया कि वे ईश्वर का अवतार थे। उनका प्रमुख जोर मानवसेवा और मानव की एकता पर था। 

यह भी एक विचित्र विसंगति है कि जिस संत ने जीवन भर फटे-पुराने कपड़े पहने, रूखा-सूखा खाया या फिर उपवास किया, और किसी भी तरह के कर्मकांड को बढ़ावा नहीं दिया, उसी के भव्य मंदिर बन रहे हैं, स्वर्णजटित सिंहासन पर उसकी सोने की प्रतिमा प्रतिष्ठित की जा रही


है, दूध से उसे स्नान कराया जा रहा है और वे सारे कर्मकांड किए जा रहे हैं, जो आमतौर पर मंदिरों में होते हैं। और, जिस संत ने सदा शांति, भाईचारे और अहिंसा का पालन किया, उसके भक्त स्वामी स्वरूपानंद के बयान के विरोध में उपद्रव कर और उनके पुतले जला रहे हैं। उनकी भक्ति सार्इं बाबा के प्रति है, उनके जीवन के आदर्शों के प्रति नहीं। होती तो वे स्वामी स्वरूपानंद के खिलाफ इस तरह का उन्मादग्रस्त आक्रोश प्रकट न करते। उनका विरोध मुख्य रूप से इस बात पर है कि शंकराचार्य ने सार्इं बाबा के भगवान होने का खंडन किया है और हिंदुओं से उनके मंदिर में न जाने को कहा है। 

शायद जब किसी संत के नाम पर धर्म या संप्रदाय कायम होता है, तो हमेशा ऐसा ही होता है। वरना गरीब बढ़ई के पुत्र ईसा मसीह के नाम पर चले ईसाई धर्म के बहुसंख्यक कैथोलिक संप्रदाय के धर्मगुरु पोप के वैटिकन में इतनी धन-संपदा और वैभव न होता, जबकि ईसा की प्रसिद्ध उक्ति है कि सुई की नोंक में से होकर ऊंट गुजर सकता है, लेकिन धनी व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश नहीं पा सकता। और, न ही करुणा पर आधारित इस धर्म के अनुयायी ईशनिंदा के नाम पर मध्ययुगीन यूरोप में लोगों को जिंदा जलाते। हिंदू भी कहते हैं कि सभी को एक ही ईश्वर ने बनाया है और वह कण-कण में विद्यमान है, लेकिन उन्हें निचली जातियों में उस ईश्वर के दर्शन नहीं होते। 

हमारी पुलिस और न्याय-व्यवस्था भी गजब की है। पुलिस बलात्कार की शिकार महिलाओं की रिपोर्ट आसानी से दर्ज नहीं करती, लेकिन शिरडी के थाने में एक सार्इंभक्त की स्वामी स्वरूपानंद के खिलाफ रिपोर्ट तुरंत दर्ज हो गई। स्वामी स्वरूपानंद की किसी भी बात से सहमत न होते हुए भी यह समझ में नहीं आता कि उन्होंने क्या अपराध किया है? दरअसल, इन दिनों देश में जिस किस्म का माहौल पैदा किया जा रहा है, उसमें किसी से असहमत होना या किसी की आलोचना करना उस व्यक्ति या समुदाय की भावनाओं को आहत करना माना जाने लगा है। इस किस्म की असहिष्णुता मूलत: लोकतंत्र-विरोधी है और इसका जम कर विरोध किए जाने की जरूरत है। अगर यह प्रवृत्ति जड़ जमाती गई, तो भारत में किसी प्रकार के बौद्धिक विमर्श के लिए स्थान नहीं बचेगा, क्योंकि किसी भी प्रकार की असहमति को व्यक्त करने की इजाजत नहीं होगी। 

इन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय बहुत चर्चा में है। एक शैक्षिक और बौद्धिक संस्थान होते हुए भी उसने इस मामले में कोई अच्छा उदाहरण पेश नहीं किया और अकादमिक आजादी को कुचलते हुए एके रामानुजन के निबंध ‘तीन सौ रामायण’ को पाठ्यक्रम से निकाल दिया। इस प्रवृत्ति के पनपने से ही उन लोगों को शह मिली है, जो धार्मिक भावनाओं और परंपरा के नाम पर गंभीर बौद्धिक वाद-विवाद पर पूर्ण विराम लगा देना चाहते हैं। स्वामी स्वरूपानंद को अधिकार है कि वे सार्इं बाबा को भगवान न मानें, वैसे ही जैसे सार्इं बाबा के भक्तों को उन्हें भगवान मानने का अधिकार है। इस पर बहस निरर्थक है, क्योंकि यह आस्था का सवाल है। पर इस बिंदु पर बहस की जानी चाहिए कि सार्इं बाबा हिंदू-मुसलिम एकता के प्रतीक थे या नहीं। दूसरे, उनके अनुयायियों ने उन्हें आज जो रूप दे दिया है, वह भी बहस की मांग करता है।


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