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समांतर संसार: नेकी के रास्ते Print
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Sunday, 22 June 2014 09:30

सय्यद मुबीन ज़ेहरा

जनसत्ता 22 जून, 2014 : मनुष्य के पास धड़कता हुआ दिल है। यह दिल उसे जीवन देता है। उसमें अच्छी-बुरी सभी तरह की भावनाओं के लिए जगह होती है। जब हम अच्छी भावनाओं को बढ़ावा देते हैं तो समाज में अच्छाइयां फैलती हैं और बुराई के साथ खड़े हो जाते हैं तो हमारे चारों ओर बुराइयों की सत्ता नजर आने लगती है। इसलिए हमारे यहां नीयत पर ही सब कुछ निर्भर है। अगर आपकी नीयत ठीक है, तो दिल गवाही देता है। कई लोग भाषण तो बहुत अच्छा देते हैं, लेकिन उनकी नीयत में खोट होती है। तब हम कहते हैं कि उनकी कथनी और करनी में अंतर है। समाज में सहानुभूति को बढ़ावा मिलता है तभी शांति और संतोष रहता है। जो बेचैनी और परेशानी में होते हैं उन्हें हमदर्दी की बातें जीने का हौसला देती हैं। मानवता का विकास इसी तरीके से होता है। इसलिए दिल का मामला दिल से तय होता है और दिल का अच्छा होना ही महान होना होता है। 

बीते सोमवार को तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में वहां के लोगों ने जिस तरह हमदर्दी दिखाई, वह स्वार्थी दुनिया में एक आशा की किरण की तरह है। यह उम्मीद इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि एक जीवन बचाने के लिए अगर शहर ठहर सकता है, तो यह इस बात का सबूत है कि शहर के दिल में निश्चित रूप से नेकियों के लिए जगह मौजूद है। वहां की सड़कों पर ट्रैफिक रोक कर लोगों ने एक दिल की यात्रा तेज गति से पूरी कराने का नेक कार्य किया, ताकि समय पर एक जीवन को जिंदा रख सकें। यह अपने आप में एक संदेश है हम सबके लिए। 

अगर हम चाहें तो एक-दूसरे का सहारा बन सकते हैं। एक-दूसरे का जीवन और धड़कन बन सकते हैं। एक दूसरे का अहसास हो सकते हैं। एक-दूसरे की ताकत, विश्वास और विचार भी हो सकते हैं। जब हम एक-दूसरे के बारे में सोचते हैं तो दो तरह के शब्द हमारे आसपास इकट्ठा होते हैं। एक तो सकारात्मक और दूसरे नकारात्मक। अगर हम सकारात्मक सोच के साथ विचार करें तो हमारे आसपास सकारात्मक शब्दों के साथ सकारात्मक सोच जुड़ता है, पर अगर हम नकारात्मक सोच को बढ़ावा देंगे तब हमारे आसपास नकारात्मक विचारों और नकारात्मक शब्दों के साथ नकारात्मक लोग जमा हो जाएंगे। 

यहां सोच ही है, जो पूरे चेन्नई शहर को एक धड़कते दिल को रास्ता देने के लिए रोक देती है। निश्चित रूप से यहां कई सामाजिक सोच काम कर रहे थे। एक वह नेक सोच, जो अपने करीबी की मौत को यादगार बनाते हुए उसके शरीर के उपयोगी अंग को किसी जरूरतमंद को देने को तैयार था। एक दूसरा सोच उन डॉक्टरों का था, जो कठिन काम करने के लिए तैयार था। एक सोच था उन सरकारी अधिकारियों का, जो इस नेक काम में अपना भरपूर सहयोग देने के लिए बेचैन था। मगर इन सबमें एक महत्त्वपूर्ण सोच चेन्नई के लोगों का था, जो इस नेक काम के लिए अपने जीवन को कुछ देर के लिए रोक देना चाहता था और वह भी उस शहर में, जो कभी ठहरना नहीं चाहता। 

यह केवल एक धड़कते दिल की राजीव गांधी अस्पताल से फोर्टिस मालार अस्पताल तक की नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं की यात्रा थी। शायद ये भावनाएं आज की हमारी व्यस्त दुनिया में कमजोर पड़ती जा रही हैं। सोलह यातायात सिग्नलों वाला यह रास्ता अगर आम दिनों में शाम को उस समय तय किया जाता, जब यह यात्रा हुई थी, तो पैंतालीस मिनट से एक घंटा तक लग सकता था। लेकिन इसी व्यस्त सड़क पर दिल ले जाने वाली एंबुलेंस को सिर्फ तेरह मिनट बाईस सेकेंड का समय लगा। 

विवरण इस प्रकार है: कांचीपुरम का एक सत्ताईस वर्षीय युवक ग्यारह जून को सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया। उसे बारह जून को राजीव गांधी अस्पताल लाया गया, जहां सोलह जून को डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया। उसके परिवार ने उसके अंग दान करने का फैसला किया और फिर दिल और दोनों गुर्दे फोर्टिस मालार अस्पताल को दे दिए गए। अन्य अंगों को कुछ अन्य अस्पतालों को


दान कर दिया गया। ऐसे में मुंबई की इक्कीस वर्षीय महिला को उसका दिल लगाने का फैसला हुआ। इसके बाद यातायात पुलिस से अनुरोध किया गया कि वह एक से दूसरे अस्पताल तक दिल की यात्रा को कम से कम समय में सुनिश्चित करने में मदद करे। क्योंकि एक बार शरीर से दिल निकलने के बाद कुछ घंटों तक ही सलामत रह सकता है। एक शरीर से दूसरे शरीर में दिल लगाने में समय लगता है। यहां सारा दारोमदार समय को काबू में रखने पर टिका था। 

इस तरह यातायात पुलिस ने एक ग्रीन कॉरीडोर तैयार किया, जिसके तहत एंबुलेंस तेज गति से एक अस्पताल से धड़कता हुआ दिल बिना रोक-टोक ले जाने में सफल रही। अब यह दिल उस इक्कीस वर्षीय महिला के शरीर में लगा दिया गया है और धड़क रहा है। 

यहां कई बातें गौर करने लायक हैं। एक तो यह कि आज चिकित्सा विज्ञान इतना विकसित हो चुका है कि अगर मनुष्य का जीवन बचाना चाहें तो अंत तक संघर्ष किया जा सकता है। लेकिन समस्या एक ही है कि जीवन बचाने वाली ऐसी चिकित्सा सुविधाएं बहुत महंगी होती जा रही हैं। मनुष्य का जीवन बचाने के लिए किए गए चिकित्सीय आविष्कार बाजार के हाथों में जाकर अपना मानवीय उद्देश्य खो चुके हैं। इस विषय पर फिर कभी, लेकिन एक विषय जो कहीं इस सहानुभूति के शोर-शराबे में डूब रहा है, वह उस व्यक्ति की मौत है, जिसके दिल की धड़कनों को दूसरे की जिंदगी देने की जीत पर हम खुशी व्यक्त कर रहे हैं। 

उस सत्ताईस वर्षीय व्यक्ति की मौत सड़क दुर्घटना में हुई थी। निश्चित रूप से इस दुर्घटना में किसी की गलती रही होगी। एक तरफ हम इंसानी जज्बे की ऊंचाई देखते हैं, तो दूसरी तरफ ऐसी गिरावट भी कि वहां एक-दूसरे के जीवन का जरा भी सम्मान नहीं करते और हमारी लापरवाही की बदौलत उसका जीवन समाप्त हो जाता है। 

हमारे अंदर का यही विरोधाभास हमें कमजोर बना रहा है। जहां हम एक तरफ तो किसी का जीवन बचाने के लिए मानवता की चरम सीमा से गुजरते हैं, वहीं दूसरी ओर हम किसी की जान की इतनी भी कद्र नहीं करते कि वह हमारी लापरवाही या नफरतों की वजह से समाप्त हो जाती है। जिस दिन हमारे अंदर यह सोच पल गया तब हम देखेंगे कि इंसान को इंसान की कद्र होने लगेगी। और तब शायद हमारे यहां कैदखानों की जरूरत नहीं रहेगी। इंसान अगर इंसान के काम आने लगे और समाज एक-दूसरे के बारे में सहानुभूति के साथ सोचना शुरू कर दे तो दुनिया की शक्ल ही बदल जाएगी। लेकिन मुश्किल यह है कि हम केवल अपने बारे में सोचते हैं। 

दुनिया भर से, खासकर इराक से आ रही तस्वीरों को देखें, जहां एक व्यक्ति दूसरे को इस तरह गोलियों से भून देता है जैसे कोई वीडियो गेम खेल रहा हो। मानव जीवन का कोई महत्त्व नहीं है। हमें खुद को ऐसी वहशी भावनाओं से बचाना है। हम चाहे किसी धर्म को मानने वाले हों, लेकिन वास्तविकता यह है कि हम सब इंसान हैं। हमें मानवता के बारे में सोचना होगा। मानवीय भावनाएं चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हों उन्हें बढ़ावा देना होगा, ताकि जब हम दर्पण में किसी दरिंदे के सामने हों तो आभास हो सके कि उसमें और हममें जमीन आसमान का अंतर है।


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