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इरोम का संघर्ष Print
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Tuesday, 26 August 2014 12:03

जनसत्ता 26 अगस्त, 2014 : इरोम शर्मिला चानू को सलाम। मानवीय मूल्यों से लबरेज इरोम का संघर्ष ऐतिहासिक है। अपनी मांग के लिए आमरण अनशन को हालांकि आत्महत्या नहीं माना जाएगा, पर यदि इस क्रम में मौत आसन्न दिखे तो राज्य मौन कैसे रह सकेगा! जाहिर है, राजनीतिक बहुमत इरोम के साथ नहीं है। कम से कम मणिपुर के राजनीतिक प्रतिनिधि चुने जाने के बाद हर बार त्यागपत्र देते रहते तो शायद समाधान निकल चुका होता। ऐसा मुमकिन नहीं। ऐसे हालात कई राज्यों में हैं। समाधान वर्तमान लोकतंत्र (यानी पूंजीवादी लोकतंत्र) को और जनपक्षीय बनाने में निहित है। हम सबको इस पर सोचना होगा। 

रोहित रमण, पटना विवि, पटना



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