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हादसे के आयोजन Print
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Wednesday, 27 August 2014 12:06

जनसत्ता 27 अगस्त, 2014 : धार्मिक आयोजनों, त्योहारों आदि के अवसर पर मंदिरों, मठों, तीर्थ स्थलों पर अधिक भीड़ जमा होने और भगदड़ मच जाने की वजह से होने वाले हादसों में लोगों के मारे जाने की घटनाएं जब-तब हो जाती हैं। मगर लगता है, उनसे सबक लेने की जरूरत नहीं समझी जाती। इसी का ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश के सतना में चित्रकूट स्थित कामतानाथ परिक्रमा पथ पर एक अफवाह के कारण मची भगदड़ में कुचल कर दस लोगों की मौत और डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोगों का घायल हो जाना है। यह घटना केवल भीड़ बढ़ने की वजह से नहीं हुई, बल्कि इसे प्रशासनिक लापरवाही का त्रासद परिणाम कहा जाना चाहिए। चित्रकूट में प्रशासन का अनुमान था कि सोमवती अमावस्या के दिन कामतानाथ पर्वत की परिक्रमा के लिए करीब पंद्रह लाख लोग जुटेंगे। उसी हिसाब से तैयारी की गई थी। मगर ऐसे मौकों पर उम्मीद से काफी ज्यादा लोगों का पहुंचना कोई आश्चर्य नहीं है, प्रशासन से जुड़े लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। जाहिर है, इसमें अचानक भगदड़ जैसी स्थिति से निपटने का इंतजाम सबसे अनिवार्य पहलू है। लेकिन शायद ही कभी ऐसा होता है जब इस पहलू पर गौर करना जरूरी समझा जाए। नतीजतन, धार्मिक स्थलों पर किसी आयोजन के दौरान होने वाली भगदड़ के चलते बड़ी तादाद में नाहक ही बहुत सारे लोग मारे जाते हैं। 

चित्रकूट में जहां हादसा हुआ, वहां की दशा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कामतानाथ परिक्रमा मार्ग की ओर जाने वाले रास्ते चार किलोमीटर पहले से ही खचाखच भरे हुए थे। उसी दौरान अचानक बिजली के तार टूटने की अफवाह फैली और भगदड़ मच गई। यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि अगर किसी जगह हजारों-लाखों लोगों की भीड़ जमा हो तो वहां भगदड़ से लेकर दूसरे कई तरह के हादसे हो सकते हैं। लेकिन ऐसी जगहों पर कुछ पुलिसकर्मियों की तैनाती करके प्रशासन बेफिक्र हो जाता है। संबंधित मंदिर प्रबंधन और आयोजन समितियों के लोग धर्मार्थ सेवा करने वाले कुछ अकुशल स्वयंसेवकों को भीड़ नियंत्रण की जिम्मेदारी सौंप कर निश्चिंत हो जाते हैं। सवाल है कि ऐसी अनेक घटनाओं के बावजूद इस सबसे


प्राथमिक और साधारण पहलू पर प्रशासन से जुड़े लोगों का ध्यान क्यों नहीं जाता कि समूचे इलाके में रास्ते पर लोगों के संयमित तरीके से और कुछ दूरी बना कर चलने का सख्त इंतजाम किया जाए। भीड़ प्रबंधन के लिए ऐसी कई बहुत मामूली बातों पर गौर कर भगदड़ या इसके चलते होने वाले किसी बड़े हादसे की आशंका बहुत कम की जा सकती है। 

पर विडंबना है कि ऐसे हर अगले जमावड़े में पिछले हादसे के सबक को भुला दिया जाता है और थोड़े समय बाद फिर इस तरह की कोई घटना सामने आ जाती है। गौरतलब है कि पिछले साल अक्तूबर में मध्यप्रदेश के ही दतिया जिले में रतनगढ़ मंदिर के पास रास्ते पर खचाखच भीड़ के बीच अफवाह फैल जाने से भगदड़ मच गई थी और उसमें एक सौ तेरह लोग मारे गए थे। ऐसी किसी भी त्रासदी में मारे जाने वाले लोगों में महिलाओं और बच्चों की संख्या ज्यादा होती है। ऐसी लगभग सभी जगहों पर धार्मिक आयोजनों के दौरान हुए हादसे की बड़ी वजह अफवाह के कारण भगदड़ मचना, अधिक भीड़ होना और अराजक हालात पैदा हो जाना ही रही है। जरूरत इस बात की है कि विशेष अवसरों पर जुटने वाली भीड़ के नियंत्रण, सतत निगरानी और उचित इंतजाम की जिम्मेदारी पूरी तरह पूजास्थलों के प्रबंधन और प्रशासन पर हो और हादसों के लिए उन्हें जवाबदेह बनाया जाए।     


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