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केरी की मंशा Print
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Saturday, 02 August 2014 11:59

जनसत्ता 2 अगस्त, 2014 : मोदी सरकार बनने के बाद यह पहला मौका है जब अमेरिका के किसी प्रमुख प्रतिनिधि ने दिल्ली का रुख किया। अमेरिकी विदेशमंत्री जॉन केरी ने दिल्ली पहुंचने से पहले ही सबका साथ सबका विकास के भाजपा के चुनावी नारे की तारीफ कर और उसे कूटनीतिक रंग देते हुए खुशनुमा माहौल बनाने की कोशिश की। लेकिन उन्हें अहसास हो गया होगा कि यथार्थ इतना सरल नहीं है। यों उनसे हुई बातचीत में भारत की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने जोर देकर कहा कि सरकार बदलने से विदेश नीति नहीं बदल जाती; अमेरिका से जो रणनीतिक संबंध बना है वह जारी रहेगा। लेकिन यह भी साफ हो गया कि कई मामलों में दोनों पक्षों के बीच खटास भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगले महीने होने वाली अमेरिका यात्रा के मद््देनजर स्वाभाविक ही केरी उस समय उभरने वाले मुद््दों का जायजा लेना चाहते रहे होंगे। लेकिन उनके दिल्ली दौरे का मकसद इतना ही नहीं था। उनके आने के पीछे खास एजेंडा यह भी था कि अमेरिका भारत के बाजार में अपनी पहुंच बढ़ाना चाहता है। यह अपने आप में कुछ गलत नहीं है, खासकर विशाल अर्थव्यवस्थाओं वाले सभी देश इसकी जुगत में लगे रहते हैं। 

समस्या यह है कि कई मामलों में अमेरिका का रुख भारत के हितों से मेल नहीं खाता। केरी ने सुषमा स्वराज और फिर प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत के दौरान भी विश्व व्यापार संगठन के प्रस्तावित ट्रेड फैसिलिटेशन एग्रीमेंट यानी सुगम व्यापार समझौते को स्वीकार कर लेने का आग्रह किया, जिसे भारत नामंजूर कर चुका है। भारत ने साफ कर दिया है कि वह कृषि सबसिडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य को बेहद सीमित कर देने की कीमत पर टीएफए को मंजूर नहीं कर सकता। विडंबना यह है कि आयात-निर्यात के और उदार नियम बनाने के लिए जोर दे रहे अमेरिका का रवैया खुद इस मामले में विरोधाभासी रहा है। उसने जब भी चाहा, शुल्कीय और गैर-शुल्कीय बाधाएं खड़ी करने में संकोच नहीं किया। ताजा उदाहरण उसका आव्रजन विधेयक है, जिसके कानून बन जाने के बाद भारत के पेशेवरों के लिए अमेरिका में अवसर काफी सीमित हो जाएंगे। इस


विधेयक की बाबत सुषमा स्वराज ने चिंता जताई, पर केरी ने कोई साफ आश्वासन नहीं दिया। केरी ने कड़े बौद्धिक संपदा अधिकार की वकालत की। दरअसल, भारत की दवा कंपनियां कई जीवनरक्षक दवाओं को अपेक्षया काफी कम कीमत पर मुहैया करा रही हैं, जिससे अमेरिकी दवा उद्योग बेचैन है। दोनों पक्षों के बीच परमाणु करार का भी मसला उठा। 

भारत के एटमी उत्तरदायित्व कानून को अमेरिका इस करार की बाधा बता कर इसे हटवाना चाहता है। जबकि इस संबंध में खुद अमेरिका और यूरोप के कानून ज्यादा सख्त हैं। फिर, यह कानून संसद में विस्तृत चर्चा के बाद बना है। परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत को प्रवेश दिलाने की अमेरिकी पेशकश के बदले इस कानून को तिलांजलि देना एक गलत सौदेबाजी होगी। सुषमा स्वराज ने इस मौके का इस्तेमाल 2010 में अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी की तरफ से भाजपा समेत भारत के बारे में की गई जासूसी का मसला उठाने के लिए भी किया। उन्होंने दो टूक कहा है कि ऐसी हरकत भारत को बिल्कुल अस्वीकार्य है। केरी जासूसी के इस खुलासे का खंडन नहीं कर सके, इस शिकायत से पिंड छुड़ाने के लिए सिर्फ यह कहा कि जासूसी संबंधी प्रकरण पर वे सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं करना चाहते। केरी से हुई बातचीत में सुषमा स्वराज ने भारत के हितों का पक्ष मजबूती से रखा है। मोदी की संभावित यात्रा के समय भी संबंधित मसलों पर यह दृढ़ता कायम रहनी चाहिए।


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