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कुपोषित विकास Print
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Monday, 07 October 2013 10:09

जनसत्ता 7 अक्तूबर, 2013 : भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करते हुए सबसे ज्यादा इसी बात का प्रचार किया है कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते जिस तरह गुजरात को विकास के शिखर पर पहुंचा दिया है, उसी तरह वे देश की तकदीर बदल डालेंगे।

लेकिन कैग यानी नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक ने अपनी ताजा रिपोर्ट में गुजरात में कुपोषण की जो तस्वीर सामने रखी है, वह एक बार फिर यह बताने के लिए काफी है कि गुजरात मॉडल की हकीकत क्या है। यह भी गौरतलब है कि इसी साल अगस्त में खुद राज्य सरकार ने कुपोषण का सच स्वीकार किया था। गुजरात विधानसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्री वासुबेन त्रिवेदी ने कहा था कि राज्य के चौदह जिलों में कम से कम छह लाख तेरह हजार बच्चे कुपोषण या फिर अतिकुपोषण के शिकार हैं; बारह जिलों के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। अब कैग ने अपने आकलन में राज्य सरकार को इस बात के लिए कठघरे में खड़ा किया है कि मासिक प्रगति रिपोर्ट में हर तीसरे बच्चे का वजन मानकों के मुकाबले कम पाया गया। जबकि गुजरात सरकार का कहना है कि उसने 2007 से 2012 के बीच कुपोषित बच्चों को अतिरिक्त पूरक पोषणयुक्त आहार मुहैया कराया। सवाल है कि अगर सरकारी दावे सही हैं तो कुपोषण की समस्या क्यों और गहराती गई है।
राज्य भर में व्यावसायिक दृष्टि से सबसे उन्नत माने जाने वाले अमदाबाद में कुपोषित या अतिकुपोषित बच्चों की तादाद सबसे ज्यादा है। कैग के मुताबिक समूचे राज्य में लगभग साढ़े पचहत्तर हजार आंगनवाड़ी केंद्रों की जरूरत है। लेकिन फिलहाल इनकी स्वीकृत संख्या महज बावन हजार के आसपास है। इनमें भी लगभग दो हजार केंद्र निष्क्रिय हैं। यानी कुल मिला कर करीब एक करोड़ सत्तासी लाख बच्चे एकीकृत


बाल विकास योजना के तहत मिलने वाले लाभ से वंचित हैं। करीब दो साल पहले भारत मानव विकास रिपोर्ट में कहा गया था कि गुजरात में प्रतिव्यक्ति आय ज्यादा होने के बावजूद कुपोषण के मामले में वह पिछड़े कहे जाने वाले राज्यों की ही कतार में है। वहीं 2010-11 के आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं में खून की कमी के लिहाज से भारत के बीस प्रमुख राज्यों में गुजरात सबसे पहले नंबर पर था। जहां महिलाओं की सेहत अच्छी नहीं होगी, बच्चों में कुपोषण उसकी स्वाभाविक परिणति होगी। इसलिए कहा जा सकता है कि गुजरात में कुपोषण की समस्या के कई स्तर हैं।
विकास के दावों के बरक्स जब इन तल्ख हकीकतों पर सवाल उठाए जाते हैं तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि यहां की लड़कियां छरहरी दिखने के लिए दूध नहीं पीना चाहतीं और कुपोषण का शिकार हो जाती हैं। जबकि भारत मानव विकास रिपोर्ट में यह तथ्य दर्ज है कि राज्य में अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाएं सबसे ज्यादा कुपोषण का शिकार हैं। जिन वर्गों के लोगों को भरपेट खाना नहीं मिल पाता है, उनके कुपोषित होने की और क्या वजह हो सकती है? कैग की रिपोर्ट उस वंचना की ओर संकेत करती है जिसे फ्लाइओवरों, मॉलों और औद्योगिक चमक-दमक का हवाला देकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। चूंकि विकास की इस खाई पर देश में चुप्पी है, इसलिए कथित गुजरात मॉडल की हकीकत पर भी चर्चा नहीं होती।

 

 

 

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