Bookmark and Share
गतिरोध के बाद Print
User Rating: / 0
PoorBest 
Tuesday, 30 July 2013 10:19

जनसत्ता 30 जुलाई, 2013: पाकिस्तान में लोकतंत्र का मजबूत होना भारत से संबंध सुधार के लिहाज से भी जरूरी है। यह पहली बार हुआ कि पाकिस्तान में निर्वाचित सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया और उसकी जगह एक चुनी हुई सरकार ने ली। नवाज शरीफ के सत्ता संभालने के बाद दोनों देशों के बीच बातचीत की प्रक्रिया फिर से पटरी पर आने की जो उम्मीद की जा रही थी वह अब आकार लेने लगी है। यह अच्छी बात है कि वार्ता शुरू करने की पाकिस्तान की पेशकश पर भारत ने सकारात्मक रुख दिखाया है। दरअसल, इस दिशा में सहमति बनने की कवायद इस महीने के शुरू में ही दिखने लगी थी, जब आसियान की बैठकों के दौरान सलमान खुर्शीद पाकिस्तान के विदेश मामलों में नवाज शरीफ के शीर्ष सलाहकार सरताज अजीज से मिले थे। इसके बाद दोनों मुल्कों के प्रधानमंत्रियों के विशेष दूतों यानी सतींदर लांबा और शहरयार खान के बीच संपर्क और संवाद का क्रम चला और अब यह इस मुकाम पर पहुंच चुका है कि समग्र वार्ता के अगले दौर की बैठकों की तारीखों पर निर्णय होना है। संभावना है कि कोई महीने भर बाद पाकिस्तान की मेजबानी में सचिव स्तर की कई बैठकें होंगी।
समग्र वार्ता का तीसरा दौर पिछले साल सितंबर में शुरू हुआ था, जब दोनों तरफ के वाणिज्य सचिवों की बैठक इस्लामाबाद में हुई थी। फिर इस साल जनवरी में तुलबुल नौवहन परियोजना पर जल संसाधन सचिवों की बातचीत होनी थी। मगर सीमा पर एक भारतीय सैनिक का सिर काट लिए जाने की खबर आने के बाद जो तनाव पैदा हुआ उसने इस सिलसिले को जहां का तहां रोक दिया। यह अलग बात है कि वार्ता रोके जाने का कारण औपचारिक तौर पर भारत सरकार ने अपने जल संसाधन सचिव का सेवानिवृत्त होना बताया था। पर असली वजह किसी से छिपी


नहीं थी, क्योंकि वीजा के नियम-कायदों को उदार बनाने का जो समझौता हुआ था उस पर भी अमल रोक दिया गया। बहरहाल, दोनों देशों के बीच बातचीत के लिए प्रस्तावित मुख्य रूप से आठ मुद््दे हैं। तुलबुल नौवहन परियोजना, बुल्लर बैराज, सियाचिन और सर क्रीक के विवाद सुलझाने के अलावा आपसी व्यापार बढ़ाने, आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी पर लगाम लगाने और जम्मू-कश्मीर में शांति और सुरक्षा का मसला शामिल है। आपसी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए भारत ने पाकिस्तान को सबसे पसंदीदा मुल्क का दर्जा देने की घोषणा बहुत पहले कर दी थी। पाकिस्तान भी देर से ही सही, भारत को कारोबार के लिहाज से तरजीही मुल्क मान चुका है। मगर क्रियान्वयन के स्तर पर अभी गाड़ी आगे नहीं बढ़ी है।
मनमोहन सिंह सरकार ने अपने रुख के संकेत दे दिए हैं कि वह दूसरे मसलों पर आगे बढ़ने के लिए तभी उत्साहित हो सकती है जब कारोबारी उदारता का रास्ता साफ हो। इस साल सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के सालाना अधिवेशन के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों की मुलाकात न्यूयार्क में होनी है। तब तक सचिव स्तर की कई बैठकें हो चुकी होंगी। अगर इन बैठकों में संबंध सुधार की आशाजनक प्रगति हुई तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस्लामाबाद की यात्रा के पाकिस्तान के अनुरोध पर सोच सकते हैं। नवाज शरीफ से उनकी मुलाकात के समय भारत में लोकसभा चुनाव को कुछ महीने ही रह जाएंगे। ऐसे में पाकिस्तान के न्योते पर भारत के प्रधानमंत्री को इस नजरिए से भी निर्णय करना होगा कि वह आतंकवादी संगठनों पर लगाम लगाने और नवंबर 2008 में हुए मुंबई कांड के आरोपियों के खिलाफ न्यायिक कार्यवाही को तर्कसंगत परिणति तक पहुंचाने के लिए क्या करता है। नवाज शरीफ सरकार को भारत की यह चिंता ध्यान में रखनी होगी।

आपके विचार