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भूटान में जनतंत्र Print
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Tuesday, 16 July 2013 09:59

जनसत्ता 16 जुलाई, 2013: लंबे समय की राजशाही को किनारे कर भूटान ने पांच साल पहले जिस लोकतंत्र के युग में प्रवेश किया था, वह वहां हुए दूसरे आम चुनावों के बाद और मजबूत होकर उभरा है।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां ताजा चुनाव में अस्सी फीसद मतदान हुआ और भूटान नरेश की करीबी समझी जाने वाली सत्तारूढ़ पार्टी डीपीटी, यानी द्रुक फुएनसम त्शोंगपा को पीडीपी, यानी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने अच्छे-खासे अंतर से हरा कर जीत हासिल की। गौरतलब है कि अपने तैंतीस साल लंबे शासनकाल के बाद राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने 1998 में ही सत्ता में अपने अधिकार कम करना शुरू कर दिया था और करीब साढ़े सात साल पहले घोषणा की थी कि 2008 में पूरे भूटान में लोकतांत्रिक चुनाव कराए जाएंगे। कई दूसरे देशों की तरह वहां नरेश पर अपनी सत्ता छोड़ने का कोई दबाव नहीं था, बल्कि दुनिया भर में यह अनोखा उदाहरण था कि किसी राजशाही ने अपनी ओर से लोकतंत्र के लिए रास्ता तैयार किया। उसके बाद से भूटान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया लगातार मजबूत होते जाने का ही सबूत है कि पिछले चुनावों में महज दो सीटें प्राप्त करने वाली पीडीपी को इस बार कुल सैंतालीस में से बत्तीस सीटें मिलीं। 2008 में हुए संसदीय चुनाव में विजयी रही डीपीटी को केवल पंद्रह सीटें मिल सकीं। जाहिर है, जनता ने पिछले कार्यकाल के आधार पर डीपीटी की नीतियों और उन पर अमल को अपनी कसौटी पर परखा और असहमति की स्थिति में मौजूद विकल्प के रूप में पीडीपी को मौका दिया।

भूटान में हुए चुनावों के नतीजों पर आंतरिक राजनीति के अलावा पड़ोसी देशों और खासकर भारत के साथ उसके संबंधों का भी असर साफ दिखता है। भूटान कई दशकों से विदेश और व्यापार नीतियों के लिए भारत पर भरोसा करता रहा है। लेकिन पिछले कुछ घटनाक्रमों से ऐसा


लग रहा था कि भूटान की नजदीकी चीन के साथ बढ़ रही है। वहां के प्रधानमंत्री जिग्मे थिनले के सुरक्षा और विदेश संबंधी कई मामलों में उठाए गए कदमों को भारत के हितों के खिलाफ देखा गया। इसके बावजूद संभव है कि भारत के असहज होने का यह प्रत्यक्ष कारण न भी रहा हो। लेकिन यह तथ्य है कि भारत ने हाल ही में करार की समय-सीमा पूरा होने के तर्क पर भूटान को दी जाने वाली तेल और गैस सबसिडी में कमी कर दी थी। जाहिर है, पहले ही बदहाल अर्थव्यवस्था से गुजरते भूटान की जनता के लिए यह एक नई समस्या थी और लोगों ने इसके लिए डीपीटी को जिम्मेदार माना। हालांकि भूटान और भारत की सरकारों ने इसे लेखा संबंधी खामियों का नतीजा माना और जल्दी ही इसे ठीक करने का स्पष्टीकरण जारी किया। लेकिन तब तक पीडीपी ने सबसिडी के मामले को वहां एक बड़े चुनावी मुद्दे की शक्ल दे दी थी। इसे कोई नकारात्मक राजनीति मानने के बजाय भूटान के लोकतंत्र में दिनोंदिन आती परिपक्वता के रूप ही देखा जाना चाहिए कि कोई राजनीतिक दल जनहित के मुद्दों को समय पर पहचान कर उसे अपने पक्ष में भुनाता है। बहरहाल, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से भारत के लिए भूटान एक महत्त्वपूर्ण पड़ोसी रहा है। आए दिन चीन की ओर से जिस तरह की आशंकाएं खड़ी हो रही हैं, उसे देखते हुए भूटान के साथ न सिर्फ भौगोलिक दृष्टि से, बल्कि राजनीतिक रूप से भी अच्छे संबंध बनाने के लिए भारत को खुद भी पहल करनी चाहिए।


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