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बाजार में खबर Print
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Wednesday, 17 July 2013 10:23

ब्रजेश कानूनगो
जनसत्ता 17 जुलाई, 2013: छोटे परदे पर इन दिनों समाचार चैनलों की बाढ़-सी आई हुई है। खबरों की यह बाढ़ अपने साथ हमारी बुद्धि और समझ को भी अनायास बहाती ले जाती दिखाई दे रही है।

एक ओर हमारी रुचि को तो ये चैनल प्रभावित कर ही रहे हैं, वहीं इन पर कई बार विवेकहीनता और उतावलेपन के भी उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। अत्याधुनिक साधनों से संपन्न इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता में विचार-पक्ष का जिस तरह अभाव दिखता है, उसे लेकर कभी-कभी बहुत पीड़ा होती है। समाचार चैनलों पर चौबीसों घंटे लगातार, खबरों की गहराई में गए बगैर, सूचनाओं को मनमाने विश्लेषण के साथ प्रसारित किया जाना किसी भी विचारवान दर्शक या व्यक्ति के भीतर क्षोभ पैदा कर सकता है। समाचार चैनलों के लिए खबर एक डबल-रोटी के टुकड़े की तरह होती है। चौबीस घंटे चैनल का पेट भरने के लिए पूरी रात चबाते रहना एंकरों की मजबूरी होती है। संवाददाता ने अगर कोई रसीली खबर भेज दी है तो फिर क्या है, लगातार उसे च्युइंगम की तरह चबाते रहना है, भले ही उसका स्वाद खत्म हो जाए। इन्हीं अवसरों को भुनाने के चक्कर में ऐसे-ऐसे कार्यक्रम परोसे जाते हैं कि सिर धुनने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखाई देता।
अंधविश्वास और भूतप्रेत से संबंधित ऊलजलूल कार्यक्रमों की बात छोड़ भी दें और केवल समाचार आधारित कार्यक्रमों की बात करें तो अधिकतर चैनल खबर को पूरी तरह खबर बनने के पहले ही उसका विश्लेषण प्रारंभ कर देते हैं। ज्वालामुखी फूटा नहीं कि विशेषज्ञों से पूछा जाने लगता है कि लावे का तापमान और उससे निकलने वाली ऊर्जा कितनी होगी; लावा क्या कभी ठंडा भी होगा या


नहीं; वह बहता हुआ कहां तक जाएगा; भारत के लोगों को इन परिस्थितियों में क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए; प्रभावित लोगों के पुनर्वास में सरकार की क्या भूमिका होगी; ज्वालामुखी के फटने से किन राजनीतिक पार्टियों को लाभ मिलेगा... आदि।
शेखचिल्ली की कहानी की तरह हवाई और बेतुका विश्लेषण घंटों चलता रहता है। किसी मनोरंजक कार्यक्रम की तरह ये चैनल दर्शकों को बांधे जरूर रखते हैं, लेकिन उनके विवेक और विचारशीलता पर ताला डाल देते हैं। समाचार चैनलों के एंकरों के अपरिपक्व मस्तिष्क सामने बैठे विचारकों, विशेषज्ञों पर एक तरह से आक्रमण करते दिखाई देते हैं। उनके मुंह से अपने शब्द कहलवाने की कोशिश में कई बार वे अभद्रता की हद तक पीछे पड़े नजर आते हैं। अपने मतलब का एकाध शब्द विशेषज्ञ विचारक की जुबान से फिसलते ही वे उसे लपक लेते हैं और उसे पूरी तत्परता के साथ अधिकृत घोषणा में तब्दील कर दिया जाता है।
दरअसल, पत्रकारिता जैसे महत्त्वपूर्ण पेशे, खासतौर पर टीवी पत्रकारिता को बाजारवाद की चकाचौंध ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। समाचार और सूचना को भी अब चैनलों द्वारा वस्तु की तरह बेचा जा रहा है और इस व्यापार में विचारशीलता, विवेक और सहिष्णुता जैसे मूल्यों-गुणों को बहुत हद तक नजरअंदाज करने में कोई गुरेज नहीं है। यह स्थिति न सिर्फ पत्रकारिता के लिए, बल्कि हमारे बौद्धिक विकास के लिए भी कुछ ठीक नहीं कही जा सकती!

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