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महात्मा गांधी बनाम चर्चिल Print
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Tuesday, 09 September 2014 11:42

सुधांशु रंजन

 जनसत्ता 9 सितंबर, 2014: ब्रिटेन सरकार ने घोषणा की है कि महात्मा गांधी की मूर्ति लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर में

विंस्टन चर्चिल के साथ 2015 के ग्रीष्मकाल तक लगाई जाएगी। पहले से ही गांधीजी की एक और मूर्ति लंदन में किंग्ज क्रॉस के निकट टैविस्टॉक स्क्वायर पर है जो 1968 में स्थापित की गई थी। पर ब्रिटिश पार्लियामेंट के बगल में यानी पार्लियामेंट स्क्वायर में राष्ट्रपिता की मूर्ति स्थापित करने का, जो वहां ग्यारहवीं मूर्ति होगी, बड़ा भारी प्रतीकात्मक महत्त्व है क्योंकि स्कावयर जन-विरोध की जगह है। अहिंसा के पुजारी गांधी ने अहिंसक संघर्ष से ब्रिटिश साम्राज्यवाद की चूलें हिला दीं। ब्रिटेन के विदेशमंत्री विलियम हेग एवं एक्सचेकर के चांसलर जॉर्ज आॅस्बॉर्न ने हाल में अपनी दो दिवसीय भारत यात्रा के दौरान कहा कि गांधी व्यापक प्रेरणा और शक्ति के स्रोत हैं। 


यह किसी विडंबना से कम नहीं कि घोर साम्राज्यवादी चर्चिल मूर्ति के रूप में गांधी के साथ खड़े होंगे जिन्होंने उस साम्राज्यवाद का जुआ तोड़ डाला। चर्चिल का पक्का मत था कि ‘भारत को खोना ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पतन का प्रारंभ और अंत होगा’, और उन्होंने घोषणा की, ‘हमें राजा के मुकुट के सबसे चमकीले और बेशकीमती रत्न को अलग करने का कोई इरादा नहीं है जो अन्य सभी डोमिनियनों और अधीन राष्ट्रों से अधिक ब्रिटिश साम्राज्य की महिमा और शक्ति का निर्माण करता है।’ महात्मा ने सम्राट के मुकुट के ‘सबसे चमकीले एवं बेशकीमती रत्न’ को शंतिपूर्ण संघर्ष से छीन लिया। 

गांधी और वायसराय के बीच बराबरी को चर्चिल बर्दाश्त नहीं कर पाए, जब उन्होंने देखा कि राष्ट्रव्यापी सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू होने के बाद वायसराय लॉर्ड इरविन गांधी से राजनीतिक संघर्ष-विराम के लिए वार्ता कर रहे थे। 23 फरवरी 1931 को काउंसिल आॅफ द वेस्ट एसेक्स यूनियनिस्ट एसोसिएशन को संबोधित करते हुए उन्होंने तल्खी से कहा कि ‘इनर टेम्पुल के एक अधिवक्ता श्री गांधी को, जो उस किस्म के एक देशद्रोही फकीर बन गए हैं जो पूरब में सर्वविदित है, वायसराय के महल की सीढ़ियों पर अधनंगे चढ़ते देखना जबकि वे अब भी अवज्ञापूर्वक सिविल नाफरमानी आंदोलन का संचालन कर रहे हैं, सम्राट के प्रतिनिधियों से बराबरी के स्तर पर बात करते देखना हैरतअंगेज और उबकाई लाने वाला है।’ उन्होंने आगे जोर देकर कहा, ‘मैं लॉर्ड इरविन और श्री गांधी के बीच वार्तालाप तथा संधियों के विरुद्ध हूं। ...सच्चाई यह है कि गांधीवाद और इसके जो भी मायने हैं, उनसे निपटना होगा और अंतिम रूप से चूर कर देना होगा।’ यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जब दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने महात्मा गांधी इंग्लैंड गए तो चर्चिल ने उनसे मिलने से मना कर दिया।

जो भी हो, अपनी प्रकृति के अनुरूप गांधी ने इसे दिल से नहीं लगाया। तेरह वर्ष बाद आगा खां पैलेस से रिहा होने के बाद 17 जुलाई 1944 को पंचगनी से, जहां वे स्वास्थ्य-लाभ कर रहे थे, उन्होंने चर्चिल को पत्र लिखा, ‘‘कथित रूप से आपकी ‘नंगे फकीर’ को, जैसा कि आपने मेरा वर्णन किया है, कुचल देने की इच्छा है। मैं लंबे समय से ‘फकीर’ बनने का प्रयास कर रहा हूं और नंगा-एक अधिक दुष्कर कार्य। इसलिए, मैं इस अभिव्यक्ति को एक सम्मान मानता हूं, भले ही जो आपकी मंशा नहीं थी। मैं आपसे प्रस्ताव करता हूं और निवेदन करता हूं कि मुझ पर भरोसा और मेरा इस्तेमाल करें अपने तथा मेरे लोगों के लिए और उनके जरिये विश्व के लिए।’’ उन्होंने अंत में लिखा- आपका सच्चा दोस्त, एमके गांधी। 

पर गांधी की मूर्ति की स्थापना के प्रस्ताव का विरोध आश्चर्यजनक रूप से एक अनपेक्षित वर्ग से आया है। इंडो-ब्रिटिश हेरिटेज ट्रस्ट की संस्थापिका कुसुम बदगामा ने इसका कड़ा विरोध किया है। बयासी वर्षीय बदगामा का कहना है कि जब वे स्कूली छात्रा थीं तो महात्मा को पूजती थीं क्योंकि उन्हें पता नहीं था कि वे नग्न किशोरियों के साथ अपने स्वनिर्मित ब्रह्मचर्य की जांच के लिए सोते थे। उनका आरोप है कि गांधी ने स्त्रियों का इस्तेमाल गिनीपिग के रूप में किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने मुंह इसलिए खोला क्योंकि आज भी भारत में सामूहिक बलात्कार की घटनाएं लगातार घट रही हैं और बलात्कार-पीड़िताओं को मार कर पेड़ से लटका दिया जा रहा है जिसका अर्थ है कि अब भी महिलाएं अपमानित होती हैं और कुछ पुरुषों द्वारा वस्तु के रूप में इस्तेमाल की जाती हैं।

आज की बलात्कार की घटनाओं के लिए महात्मा गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग को जिम्मेदार मानना सरासर अन्याय है। उनके प्रयोग की आलोचना तो हो सकती है और उस वक्त भी हुई थी, मगर उसे आज की घटनाओं से जोड़ना बिलकुल गलत है। आज जो यह दुष्कर्म कर रहे हैं उन्हें गांधी के उस प्रयोग की कोई जानकारी भी नहीं है। महात्मा ने कभी किसी का शोषण नहीं किया, महिलाओं का तो सवाल ही नहीं उठता। नोआखाली में गांधी ने ब्रह्मचर्य का प्रयोग शुरू किया क्योंकि उन्होंने देखा कि देश भयंकर सांप्रदायिक हिंसा की आग में जल रहा है। उनका विश्वास था कि ब्रह्मचर्य से इतनी आध्यात्मिक ऊर्जा विमुक्त होगी कि वह हिंसा को पूरी तरह निगल जाएगी। सांप्रदायिक हिंसा के कारण उन्हें खुद पर संदेह हुआ कि उनके ब्रह्मचर्य में ही कोई कमी है। 

एक रहस्यमय तरीके से उनकी चचेरी पोती मनुबेन उनके इस प्रयोग का हिस्सा बन गर्इं। उन्होंने तांत्रिक बौद्ध दर्शन पर जॉन वुडरॉफ


की पुस्तक पढ़ी थी जिसमें विस्तार से वर्णन है कि वासना को किस प्रकार वासना के द्वारा समाप्त किया जा सकता है। वे हिजड़ा बनने की बात भी किया करते थे- प्रार्थना के द्वारा, शल्यक्रिया द्वारा नहीं। उनके दुभाषिया निर्मल कुमार बोस ने लिखा है कि एक दिन वे हैरान रह गए जब 12 दिसंबर 1946 को अलस्सुबह गांधी के कमरे में घुसे। उन्होंने गांधी और मनुबेन को एक साथ बिस्तर पर पाया। वे दोनों आपस में बात कर रहे थे। 

रॉबर्ट पेन के अनुसार, ‘बाद में गांधी ने सफाई दी कि वे दोनों एक निर्भीक और मौलिक प्रयोग पर चर्चा कर रहे थे जिसकी गर्मी बहुत ज्यादा होगी।’ उन्होंने कहा कि वे अपने जीवन के एक अध्याय के अंत पर पहुंच चुके हैं, और एक नया शुरू होने वाला है। अगर किसी ने इस प्रयोग का विरोध किया तो उसे यहां छोड़ कर चला जाना चाहिए क्योंकि वह सिर्फ उन्हीं लोगों के साथ काम कर सकते हैं जो उनके प्रति वफादार हों।’

उस समय कुछ वर्षों से यह अफवाह उड़ रही थी कि वे रात किसी औरत के साथ बिताते हैं, और इस बारे में कहा गया कि उनके रक्त प्रवाह में कुछ समस्या है और ऊष्मा की जरूरत है। दो व्यक्तियों ने इसका प्रबल विरोध किया- निर्मल बोस और उनके टंकक परथुराम ने उन्हें पत्र लिखे- परथुराम विरोध में उन्हें छोड़ कर चले गए। नरहरि पारेख ने विरोध में हरिजन सेवक संघ से त्यागपत्र दे दिया। उन्हें गांधी के चरित्र पर संदेह नहीं था, पर उनकी आपत्ति यह थी कि अगर अन्य लोगों ने भी गांधी का अनुकरण करना शुरू किया और उनकी साधना अगर गांधी की तरह उदात्त न हो तो अराजकता फैल जाएगी। 

निर्मल बोस और परथुराम के पत्रों को गांधी ने अपने सहयोगियों को भेज दिया, लेकिन जवाब केवल दो ने दिया। जेबी कृपलानी ने मौखिक रूप से उनसे कहा कि उन्हें इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता। खान अब्दुल गफ्फार खां ने जवाब दिया कि अगर वह उन पर भरोसा नहीं कर सकते तो वह अपने आप पर भी भरोसा नहीं कर सकते। गांधी ने मनुबेन से भी पूछा कि उनके साथ सोने में उन्हें कैसा महसूस होता है। इस पर मनुबेन का जवाब था कि उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे अपनी मां के साथ सो रही हैं। उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी ‘गांधी, मेरी मां’। 

गांधी का यह प्रयोग नायाब था जिसे सामान्य मस्तिष्क नहीं समझ सकता। उनकी किसी महिला सहयोगी ने उनके विरुद्ध सीमा लांघने या संवेदनहीनता का आरोप नहीं लगाया। हालांकि यह कहा जा सकता है कि गांधी को उन महिलाओं की मानसिक अवस्था के बारे में भी सोचना चाहिए था क्योंकि गांधी के विशाल व्यक्तित्व के समक्ष कोई महिला उन्हें शायद न कहने की स्थिति में नहीं थी। पर उनका महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण बड़ा सकारात्मक था। 

इसका सबसे बड़ा कारण था उनकी माता पुतलीबाई का उन पर प्रभाव, जिनकी वे वस्तुत: पूजा करते थे। दूसरा प्रभाव उनकी पत्नी कस्तूरबा का था। इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका में जुलु महिलाओं की पीड़ा को देख कर भी वे  बहुत द्रवित हुए। उन्होंने परदा, दहेज और बाल विवाह का पुरजोर विरोध किया और बाल विधवाओं की दोबारा शादी की वकालत की। परिपक्व विधवाओं के बारे में उन्होंने कहा कि उनकी दूसरी शादी का निर्णय उनपर छोड़ दिया जाना चाहिए। हालांकि शादी को वे संस्कार मानते थे, फिर भी औरतों को तलाक का अधिकार देने के पक्ष में थे, अगर वैवाहिक जीवन में बहुत तनाव हो। 

 सबसे बड़ी विशेषता गांधी की यही थी कि वे उन्हीं सिद्धांतों का समर्थन करते थे जिन्हें अपने ऊपर लागू कर लेते थे। ब्रह्मचर्य का समर्थन भी खुद पर लागू करने के बाद किया। उनके बड़े बेटे हरिलाल को दूसरा बच्चा हुआ तो वे बेटे और पुत्रवधू से इसलिए नाराज हुए कि दोनों ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर रहे हैं। स्कूली शिक्षा का वे विरोध करते थे। उनका मानना था कि घर पर शिक्षा देना बेहतर है और बच्चों का चारित्रिक विकास भी ज्यादा तभी होता है। इस कारण उन्होंने अपने बेटों का दाखिला स्कूल में नहीं कराया। हरिलाल गांधी का पिता के खिलाफ जो विद्रोह हुआ उसका एक कारण यह भी था उन्हें उचित शिक्षा नहीं दी गई। आज के नेता अंगरेजी का विरोध करते हैं और अपने बच्चों को अंगरेजी माध्यम के विद्यालयों में भेजते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि उनमें पाखंड बिल्कुल नहीं था। सत्य का ऐसा टुकड़ा उनके पास था जिसने उन्हें इस ऊंचाई पर पहुंचा दिया।


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