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दंगे और इंसाफ की लाचारी Print
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Thursday, 08 May 2014 11:42

कनक तिवारी

जनसत्ता 8 मई, 2014 : अंगरेज भारत में कई कुटिल प्रशासनिक व्यवस्थाएं दे गए हैं। उनमें अदालती न्यायदान पद्धति का मिथक भी शामिल है।

हत्या शारीरिक क्षतियों की सूची में सबसे जघन्य और घृणित कृत्य है। सांघातिक चोट, बलात्कार, अपहरण और सायास धमकियां उसी अपराध कुटुंब की हिंसाएं हैं। ‘कानून का राज’ वाला जुमला दुनिया के लोकतंत्रों में जनता की जुबान पर चस्पां कर दिया गया है। उसके नैतिक अर्थ से कानून का कोई लेना-देना नहीं होता। न्याय है कि होता हुआ दीख रहा है, लेकिन होता नहीं है। गरीब, अशिक्षित और दुर्घटनावश बने अपराधियों को कानून और न्यायालय डींगें मारते भी सजाएं दे सकते हैं। कुछ अपवादों को छोड़ कर सजायाफ्ता और उसके सामाजिक स्तर में उलट अनुपात का संबंध होता है। अमीर, असरदार, नौकरशाह, राजनेता, उद्योगपति, सुपारी लेने वाले सीरियल किलर, पुलिस बल वगैरह अभियुक्त होने पर भी समाज में उन्मुक्त होते हैं। मामलों में उनका बरी हो जाना तो पहले से तय लगता है। 

सांप्रदायिक और अन्य दंगे लोकतंत्र के उजले चेहरे पर चेचक के बदनुमा दाग हैं। स्वाधीन देश में हजारों की संख्या में सांप्रदायिक दंगे हुए और अब भी हो रहे हैं। अंगरेजों ने ताजीरात-ए-हिंद, दंड प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य अधिनियम का त्रिभुज लॉडर््स की इबारत में इंग्लैंड के हाउस आॅफ कॉमन्स में बैठ कर खींचा था। फौजदारी अदालती व्यवस्था इसी त्रिभुज में फंसी न्याय देने की कोशिश, जुगत या गलतफहमी में व्यस्त है। दिल्ली में सिखों का कत्लेआम (1984), मुंबई (1992), कंधमाल (2008) और गुजरात (2002) सहित मुजफ्फरनगर (2014) के सांप्रदायिक दंगों में वास्तविक अभियुक्तों को कभी सजा नहीं मिलेगी। फिर भी राजनेता, जनता और मीडिया की यह खुशफहमी लगातार उम्मीदजदा है कि न्याय-व्यवस्था में गहरा विश्वास रखना चाहिए। अदालतें ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ के मुहावरे के अनुरूप कभी न कभी न्याय तो जरूर करेंगी! यह ठीक है कि गुजरात दंगोंं को लेकर पूर्व मंत्री माया कोडनानी, बाबू बजरंगी और बिलकीस बानो बालात्कार कांड के अपराधियों को सजाएं मिली भी हैं। लेकिन ये सजाएं अपवाद हैं, जो नियम को ही सिद्ध करती हैं। 

सांप्रदायिक दंगे अगर दो शत्रु-समूह करें, एक-दूसरे के विरुद्ध दंड प्रक्रिया संहिता के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करें, तब जांच प्रक्रिया का न्याय के अंतिम पड़ाव तक पहुंचने की मृगतृष्णा का पाथेय झिलमिलाने लगता है। मगर जब राज्य ही सांप्रदायिक हिंसा का कारक या संरक्षक हो तो पुलिस थानों में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हो पाती। जब पुलिस ही अपने आकाओं का हुक्म बजाते नागरिकों को जानवरों की तरह काटने लगे, स्त्रियों का शीलहरण करे, गरीबों तक की संपत्तियां छीन ले, माहौल में अश्लीलता, असभ्यता और बदतमीजी का तांडव भर दे, तब कानूनी प्रक्रिया की रस्मअदायगी तक भीगी बिल्ली की तरह दुम दबाने लगती है। 

गुजरात, दिल्ली, ओडिशा, मुंबई, मेरठ, मुजफ्फरनगर सहित पूरे देश में सांप्रदायिक दंगों से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया लाचार-सी दिखती रही है। कुछ बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, प्रबुद्ध वकीलों और मीडिया के ईमानदार पत्रकारों के नैतिक दबाव और हठवादी जागरूकता के चलते इने-गिने मुकदमों में वास्तविक न्याय मिलने की धूमिल संभावनाओं का उजला चेहरा दिखता है। लेकिन राज्य प्रायोजित हिंसा के अधिकतर मुकदमों में वही ढाक के तीन पात नजर आते हैं। 

गुजरात दंगों को लेकर पीड़ित जकिया जाफरी की एक विविध याचिका को अमदाबाद के मेट्रोपोलिटन न्यायालय ने यह कहते हुए रद्द कर दिया कि दंगों की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआइटी) ने ठीक कहा था कि उसे अपराध सिद्ध करने योग्य साक्ष्य मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य के विरुद्ध नहीं मिला। इसलिए मोदी और अन्य संदेहियों को अपराध से पृथक कर दिया गया। सबसे निचली अदालत द्वारा लाचार एसआइटी आवेदन पर इस आदेश के आत्मप्रचारित राजनीतिक गुणनफल निकाले गए। कहा गया कि न्याय की जीत हुई है। 

एसआइटी प्रमुख और सीबीआइ के पूर्व निदेशक आरके राघवन का आत्मविश्वास बोला कि जांच रिपोर्ट को वैधानिक मान्यता मिल गई है। प्रचारित हुआ कि अपनी आंखों पर पट्टी बांधे न्याय-व्यवस्था ने आखिर खुली आंखों से वास्तविक न्याय कर दिया है। घृणित अपराधों का सच लाशों के मलबे के नीचे टीसता रहेगा। प्रचार का इतना तेज शोर है कि सत्य की कराह को सुनने का व्यवस्था के पास वक्त, नीयत और समझ तक नहीं है। 

राज्य प्रायोजित हिंसा की रपट पुलिस थानों में पीड़ित व्यक्ति दर्ज कराने की हिम्मत नहीं करता। जाता भी है तो उसे जान-माल की धमकी मिलती है, जो क्रियान्वित भी की जा सकती है। स्वयंसेवी संस्थाओं, समाज, सुप्रीम कोर्ट और मीडिया वगैरह के साहसिक दबाव के चलते प्राथमिकी दर्ज भी कर ली गई, तब भी जांच तो थाने के अधिकारियों को ही करनी होती है। वही तो अभियुक्तों का आचरण करते पीड़ितों द्वारा देखे गए होते हैं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत लिए गए गवाहों के बयान न्यायालय में सरेआम झुठलाए जा सकते हैं। उन पर कोई मुकदमा भी नहीं चल सकता। 

अंगरेजों ने यह जुमला जनता को झांसा देकर रचा था कि पुलिस किसी भी शरीफ व्यक्ति को झूठे मुकदमे में फंसा कर नकली गवाहियां टीप सकती है। ऐसे गवाह अदालत में निर्भय होकर बयान को खंडित कर सच बोल सकते हैं। लेकिन हो यह रहा है कि लोकतंत्र में रसूखदार उद्योगपति, फिरौती वसूलने वाले, राजनेता, नौकरशाह और खुद पुलिस अधिकारी भी अभियुक्त होते गए हैं। उनके खिलाफ सच्चे या झूठे दर्ज किए गए बयान न्यायालयीन कथन के स्तर पर सच की देह से आत्मा निकाल लेते हैं। अभियुक्त मूछें ऐंठते अदालत से निकलते हैं। शिकायतकर्ता


शर्मसार होकर चूहों की तरह घर के बिल में कुंठित होकर दुबक जाते हैं। गवाह दलाली का कमीशन खाते सियासत चलाते हैं। मीडिया का बहुलांश अभियुक्तों का गुणगान करने के रोमांच से लबरेज होता रहता है। 

विचारण न्यायालय अभियुक्त का स्वर्ग और पीड़ित का नर्क बनाए जा रहे हैं। घटना के दस-बारह वर्ष बाद महंगी फीस लेकर वाक्कला में टर्राने वाले वकील निरक्षर, अल्पशिक्षित और औसत बुद्धि के कानूनी जुमलों से भी बेखबर नागरिकों से आत्ममुग्ध शैली में साक्ष्य अधिनियम की सर्वोच्च उपपत्तियों का ठीकरा जिरह में उन पर फोड़ते हैं। वे लगातार अभियुक्त की आंखों में पारस्परिक प्रशंसा और मोटी फीस के अहसान के कृतज्ञ भाव से सराबोर होकर देखते रहते हैं। न्यायालय थानेदार द्वारा संदेहजनक परिस्थितियों में लिखी गई इबारतों में एक-एक शब्द तक में विसंगति ढूंढ़ते हैं। फिर दंड दे सकने के न्यायपथ के आसपास उग आई चोर पगडंडियों में भटक जाने को अभिशप्त होते हैं। 

विचारण न्यायालयों की सांख्यिकी पर शोध किया जाए तो लगभग नब्बे प्रतिशत मुकदमों में या तो चश्मदीद गवाह को खरीदा जाकर उसे अभियोजन द्वारा पक्षविरोधी घोषित किया जाता है या अभियुक्त या बचाव पक्ष के अधिवक्ता को गैरहाजिर रखा जाकर विचारण को दशकों की यात्रा करनी होती है या गैरजमानती और समझौते के नाकाबिल मामलों में भी भरी अदालत में समझौते की तजवीज की जाती है, जिससे समझौतानामा की संभावित प्राप्य राशि को लेकर बंदरबांट की जा सके। कुछ प्रकरणों में तो न्यायाधीश को ही खरीद लेने की संभावनाएं साकार कर ली जाती हैं।

अभियुक्तों की इन परिस्थितियों में की गई उन्मुक्ति के न्यायालयीन उद्घोष को दागी राजनेताओं के लोकचरित्र का प्रमाणपत्र बना कर उन्हें मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद तक का नैतिक दावेदार अनुकूल समूहों द्वारा बना दिया जाता है। राजनेता बजा फरमाते हैं कि ‘कानून अंधा होता है।’ ‘कानून के अनुसार न्याय होता है।’ ‘कानून का काम है कि वह अपनी राह चले।’ ‘अमुक मंत्री ने जनदृष्टि या नैतिक दृष्टि के अनुसार भले अपराध किया होगा, लेकिन कानून की दृष्टि ही सर्वोपरि है।’ 

कानून का नैतिकता, नागरिक समझ और ‘प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता’ जैसे शब्दार्थों से कोई सरोकार नहीं होता। गुजरात, दिल्ली, मुंबई, कंधमाल और मुजफ्फरनगर वगैरह में हजारों निर्दोष नागरिकों के साथ अन्याय हुआ। नकाबपोशों का गिरोह अगर किसी मुख्यमंत्री के बंगले पर डकैती करे, रात के अंधेरे में किसी उद्योगपति की मिल में कोई भीड़ आग लगा दे, अमीर घराने की किसी युवती को मुंह पर कपड़ा बांधे लोग सरेआम अगवा कर लें, तो इन प्रकरणों में मुलजिमों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट कैसे दर्ज की जा सकती है? 

ऐसे ही समांतर सवाल फिर भी भारतीय अदालतें अस्मत, अस्मिता और संपत्ति लुटा चुकी गरीब जनता से क्यों पूछती रहती हैं? बलात्कारी, डकैत, हत्यारे तस्वीर लगा पहचान पत्र पीड़ित के घर छोड़ कर नहीं जाते। पुलिसिया अन्वेषण या तो उन्नीसवीं सदी की लचर अवैज्ञानिक हालत में हो रहा है या वह जानबूझ कर आधुनिक प्रविधियों के उपलब्ध होते हुए भी हस्तरेखाओं, आवाजों, कद-काठी, वैमनस्य और बदला लेने के विस्तारित आयामों में जाकर मुलजिम को नहीं पकड़ रहा है। 

दंड व्यवस्था में अपील और अपीलोत्तर न्यायालयों में चित्रगुप्त की डायरी नहीं लिखी जाती। वे कनिष्ठ न्यायपालिका की डायरी को बांच कर नए अर्थ ढूंढ़ने का जतन जरूर कर सकते हैं। गुजरात ही तो वह प्रदेश है, जहां के एक मजिस्ट्रेट ने आपराधिक प्रकरण में राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायाधीश को अदालत में हाजिर होने के लिए समन जारी कर दिया था। उसे बाद में बर्खास्त कर दिया गया। हितबद्ध पुलिस अन्वेषण, अभियुक्तोन्मुख कानून और ‘बासी कढ़ी में उबाल’ की तरह की न्याय-प्रणाली में फंस कर सांप्रदायिक हिंसा के हजारों-लाखों शिकार लोगों की आवाजों का चीत्कार माहौल में गूंज तो रहा है। 

अभियुक्तों को ससम्मान बरी करने के आदेशों के कानूनी, लेकिन अनैतिक एलान को न्याय की सिंफनी बनाया जा रहा है। सबूतों के अभाव में निजी मुलजिम छोड़े जा सकते हैं। लेकिन सरकारी बदइंतजामी, नाकामी, निष्क्रियता और ढिठाई को नैतिक दृष्टि से मुलजिम क्यों नहीं कहा जाना चाहिए। अंगरेजों की गुलामी से मुक्त होकर भारतीय इतिहास की सबसे पहली और इकलौती सामूहिक समझ की किताब यानी संविधान को लिखने का श्रेय देश के प्रत्येक नागरिक यानी ‘हम भारत के लोगों’ को है। इसकी वाचाल, उद्दंड, अपराधउद्दीपक और बेखबर संतानें उस महान सामूहिक ग्रंथ के रचयिताओं, आम आदमी को ही नेस्तनाबूद होते देखने को भी न्याय होता कहती गुलछर्रे उड़ा रही हैं। 

गुजरात, मुंबई और मुजफ्फरनगर के फौत या पीड़ित रहे हिंदू-मुसलमान और दिल्ली सहित कई इलाकों के सिख भी तो संविधान की शास्त्रीय शब्दावली में उसके निर्माता हम भारत के लोग हैं। कानूनी व्यवस्थाएं और न्याय-पद्धति उनकी देहों के लिए दीमकों की भूमिका में न केवल उग आई हैं, बल्कि उनकी दंशवृत्ति और वंशवृद्धि की लगातार संभावनाएं बनी हुई हैं। 


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