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वैकल्पिक राजनीति की खोज में Print
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Saturday, 03 May 2014 10:44

अनिल सद्गोपाल

जनसत्ता 3 मई, 2014 : ‘‘पिछले वर्ष जेल में साथ-साथ बिताए तीन महीनों ने हमें और नजदीक ला दिया था।... पूरे जेल प्रवास में हमने साथ-साथ एक ही बरतन में खाना खाया। बरतन के नाम पर हमें एक-एक थाली मिली थी, अतएव हम संयुक्त रूप से एक थाली में दोनों की दाल लेते और एक थाली में दोनों की सब्जी और फिर मिल कर खाते। दाढ़ी, चश्मा, वेशभूषा, टायर की एक-सी चप्पलें, दुबला-पतला शरीर आदि ने हम दोनों में काफी साम्यता पैदा कर दी थी। लोग अक्सर मुझे राजनारायण समझते और राजनारायण को सुनील समझते।’’

ये बातें अभी हाल  में 21 अप्रैल को मस्तिष्क आघात के चलते एम्स, दिल्ली में महज चौवन साल की उम्र में दिवंगत हुए सुनील भाई ने लगभग चौबीस साल पहले अपने हमसफर राजनारायण की आकस्मिक सड़क दुर्घटना के बाद उनकी याद में जारी की गई ‘लड़त जा रे’ नामक स्मारिका में दर्ज की थीं। राजनारायण मूर्धन्य समाजवादी चिंतक किशन पटनायक की प्रेरणा से 1980 में गठित समता संगठन के जिला होशंगाबाद (मध्यप्रदेश) के केसला ब्लॉक के आदिवासियों के बीच रहते हुए उनको आंदोलित करने वाले एक मौलिक संघर्षशील कार्यकर्ता थे। 

वे दस साल तक इसी समाजवादी धर्म का पालन करते हुए अपने निधन तक उस क्षेत्र की शोषित जनता के लिए एक किंवदंती बन चुके थे। उसी आलेख में सुनील ने आगे लिखा, ‘‘राजनारायण के निधन से देश के लिए एक आदर्शवादी क्रांतिकारी चला गया, समता संगठन के लिए एक उत्साही, समर्पित नौजवान कार्यकर्ता चला गया, किसान आदिवासी संगठन के लिए अनन्य जुझारू नेता चला गया, होशंगाबाद-बैतूल जिलों के आदिवासी अंचल के लिए एक सच्चा जन हितैषी चला गया, लेकिन मेरे लिए एक दुर्लभ साथी और सहारा चला गया...।’’ 

आज सुनील के इस तरह असमय चले जाने के बाद देश भर के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनकामी लोगों की ओर से उनके बारे में हूबहू वही भावनाएं अभिव्यक्त की जा रही हैं, जो चौबीास साल पहले खुद सुनील ने अपने साथी राजनारायण के जाने पर व्यक्त की थीं। फर्क केवल यह है कि 1980 का समता संगठन 1995 तक समाजवादी जन परिषद नामक एक राजनीतिक पार्टी में बदल चुका था, सुनील अपने निधन के वक्त जिसके राष्ट्रीय महामंत्री थे। 

गौरतलब है कि जब राजनारायण ने 1980 में केसला क्षेत्र में काम शुरू किया था उस वक्त सुनील जेएनयू में अर्थशास्त्र में एमए के विद्यार्थी थे और उन्हीं की तरह समता संगठन और समता युवजन सभा में सक्रिय थे। वे राजनारायण के काम से बेहद प्रेरित थे और अक्सर दिल्ली से केसला आकर काम करते रहते थे। लेकिन 1985 में जब राजनारायण के नेतृत्व में पानी के लिए चल रहे आंदोलन के दौरान लोगों ने मटके फोड़े तो इसकी खबर मिलने पर सुनील को समझ आ गया कि उनका दिल्ली छोड़ने का समय आ गया है। एमए के बाद वे जेएनयू में ही अर्थशास्त्र में एमफिल के शोधछात्र बन चुके थे। 

सुनील ने अपने दिल की बात सुनी और मई 1985 में अर्थशास्त्र का अपना मेधावी कैरिअर छोड़ कर केसला में हमेशा के लिए बस गए। राजनारायण के निधन के बाद सुनील ने उस संघर्षशील और समाजवादी बौद्धिक विरासत को अगले चौबीस साल तक न केवल निभाया, उसे बहुआयामी स्तरों पर समृद्ध किया, कई मायनों में पुनर्परिभाषित भी किया।

सुनील ने जेएनयू के विद्यार्थी जीवन के दौरान ही अपने मौलिक सोच का परिचय देना शुरू कर दिया था। समता संगठन की ओर से असम के छात्र आंदोलन के समर्थन में 1983 की दिल्ली से गुवाहाटी तक की साइकिल यात्रा और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में फैले सिख-विरोधी उन्माद के खिलाफ 1984 में दिल्ली से अमृतसर तक किया गया शांति मार्च युवा सुनील की उभरती हुई नेतृत्व क्षमता और रचनात्मक राजनीति के शुरुआती सबूत हैं। उसी दौर में सुनील ने 1984 के सिख-विरोधी उन्माद पर ‘यह बर्बरता कहां छिपी थी?’ नामक पुस्तिका जारी की। इस पुस्तिका में सुनील  की उस विलक्षण क्षमता की झलक देखता हूं, जिसका मैं हमेशा प्रशंसक रहा हूं। 

मुल्क के ज्वलंत सामाजिक-राजनीतिक मुद््दों पर सुनील फटाफट पुस्तिकाएं जारी कर देते थे। यह आलेख लिखते वक्त मेरे सामने उनके द्वारा विभिन्न दौरों में जारी की गई एक दर्जन पुस्तिकाएं रखी हुई हैं- खेती पर उदारीकरण का हमला, किसानों की आत्महत्या, मध्यप्रदेश की संपदा लूटने के लिए विदेशी कंपनियों की एग्री-बिजनेस मीट, गेहूं आयात और खाद्य सुरक्षा, भ्रष्टाचार और नवउदारवाद, जन-विरोधी परिवहन नीति, राष्ट्रमंडल खेलों का तमाशा, समान शिक्षा व्यवस्था और बाजारीकरण, आदि विषयों पर सीधी-सादी भाषा में पैना विश्लेषण करती पुस्तिकाएं। हरेक में प्रस्तुत उस मुद््दे से जुड़ा इतिहास, तथ्य, आंकड़े, तालिकाएं और उनके स्रोत दिखाते हैं कि भले सुनील जेएनयू का अपना शोध कैरिअर छोड़ कर केसला में बस गए, लेकिन वे उस ज्ञान का भरपूर उपयोग जन-चेतना निर्माण के लिए जीवन पर्यंत करते रहे। 

छत्तीसगढ़ के क्रांतिकारी मजदूर नेता शहीद शंकर गुहा नियोगी ने भारत की राजनीति को ‘संघर्ष और निर्माण’ का परिवर्तनकामी दर्शन दिया था। सुनील ने भी उसी तर्ज पर नर्मदा की सहायक नदी तवा पर 1975 में बने बांध से विस्थापित आदिवासियों को उनके छीने गए जल-जंगल-जमीन के हकों की लड़ाई के लिए नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों में किसान आदिवासी संगठन के झंडे के तहत लामबंद किया। इस लड़ाई के चलते कांग्रेस की राज्य सरकार को बाध्य करके संगठन ने 1996 में आदिवासियों के लिए तवा बांध से बने विशाल जलाशय में मछली पकड़ने-पालने और उसके तट पर पानी उतरने से निकली जमीन पर खेती करने के अधिकार प्राप्त किए। 

इसके लिए जलाशय के आसपास बसे आदिवासियों की सैंतीस प्राथमिक सहकारी समितियों का गठन करके तवा मत्स्य संघ का निर्माण हुआ। तवा मत्स्य संघ और राज्य सरकार की ओर से मध्यप्रदेश मत्स्य महासंघ के बीच मछली पालन, पकड़ने और


खेती करने के अधिकारों को लेकर पांच-साला अनुबंध हुआ। आगामी पांच सालों में तवा मत्स्य संघ ने सामुदायिक नियंत्रण में प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन की एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की। आदिवासियों ने जलाशय से मछली का उत्पादन बढ़ाया, जिसकी बिक्री हावड़ा तक के बाजारों में होने लगी। इससे विस्थापित आदिवासियों को एक सुनिश्चित आमदनी होने लगी। मछली व्यापारियों, ठेकेदारों और बिचौलियों का धंधा ठप हो गया। शायद इसी कारण राज्य सरकार को विकास का यह जनपक्षीय वैकल्पिक मॉडल मंजूर नहीं था। राज्य सरकार द्वारा 2001 में पांच-साला अनुबंध की समाप्ति पर लीज नवीकरण से इनकार करने पर किसान आदिवासी संगठन ने एक साहसिक संघर्ष किया। अंतत: अगले पांच साल के लिए लीज का नवीकरण हो पाया। 

उक्त अनुबंध की 2006 में समाप्ति तक भाजपा की राज्य सरकार बन चुकी थी, जिसने सतपुड़ा टाइगर रिजर्व का बहाना बना कर दूसरा लीज नवीकरण करने से सिरे से इनकार कर दिया और आदिवासियों को उनके लंबे संघर्ष से मिले संवैधानिक हक से वंचित कर दिया। इस दौर में सुनील के नेतृत्व में वैकल्पिक विकास की जो बहस राजनीतिक स्तर पर छेड़ी गई वह आज भी देश के शासक वर्ग से जवाब मांग रही है। वर्तमान चुनावी दौर में जिस हल्के और सतही ढंग से गुजरात वाले विकास के मॉडल बनाम बिहार और तमिलनाडु के विकास के मॉडल या फिर दिल्ली में हाल में प्रस्तावित मोहल्ला समितियों पर जुमलेबाजी हो रही है, उसके चलते केसला के आदिवासियों ने किसका विकास, कैसा विकास और किसके द्वारा किसके हित में विकास के जो बुनियादी सवाल खड़े किए थे उनसे पलायन करने वाले पूंजीपति वर्ग की राजनीति कभी भी देश का भला नहीं कर सकती, चाहे उसका प्रतिनिधित्व स्थापित पार्टियां कर रही हों या कोई नई पार्टी। शायद इसी विश्वास के कारण सुनील अपनी समाजवादी जन परिषद की समाजवादी राजनीति में अंगद की तरह पैर गाड़ कर अंत तक टिके रहे, जबकि उनके कई बरसों पुराने वरिष्ठ साथी विगत कुछ महीनों में पूंजीवाद के नवउदारवादी खाके में ही नवोदित आम आदमी पार्टी में शामिल हो चुके थे। 

पांच साल पहले सुनील ‘केजी से पीजी’ तक भेदभाव से मुक्त समतामूलक पूर्णत: मुफ्त शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए गठित ‘अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच’ के संस्थापक-सदस्य बने। 

शुरू से उन्होंने इस संगठन के आठ-सदस्यी अध्यक्ष मंडल के सक्रिय सदस्य के रूप में शिक्षा आंदोलन की विचारधारा, कार्यनीति और संघर्ष के मुद््दे तय करवाने में अहम भूमिका निभाई। पिछले साल तक वे इस आंदोलन की पत्रिका ‘तालीम की लड़ाई’ के संपादक भी रहे, लेकिन ‘सामयिक वार्ता’ के संपादन की नई जिम्मेदारी उनके कंधों पर आने से ‘तालीम की लड़ाई’ की जिम्मेदारी एक नए संपादक मंडल को सौंप कर अलग हुए। 

तवा मत्स्य संघ का 2006 में काम सिमट जाने के अनुभव से सबक लेते हुए सुनील ने अपनी ऊर्जा ‘वैकल्पिक विकास के लिए वैकल्पिक राजनीति’ के सवाल पर केंद्रित कर दी। इस विषय पर आयोजित एक संवाद (इंदौर, 2008) के दौरान सुनील द्वारा रखे गए विचार मौजूं होंगे। उन्होंने कहा, ‘‘जब तक आधुनिक विकास नीति से लेकर, आधुनिक शासन व्यवस्था एवं पूंजीवाद तक इसका विश्लेषण करके इनके विकल्प के निर्माण... वैचारिक तैयारी नहीं होगी तब तक कोई भी आंदोलन बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकता। तो बात घूम-फिर कर वैकल्पिक राजनीति पर आ जाती है।...

आप इस दुनिया को बदलने के प्रति कोई तीव्रता महसूस कर पा रहे हैं या नहीं?... आप कोई विकल्प देख पा रहे हैं या नहीं? या आपने सोच लिया है कि अब तो पूंजीवाद का कोई विकल्प नहीं है या अब ग्लोबलाइजेशन का कोई विकल्प नहीं है।... यदि आपने यह मान लिया है तो आप न तो वैकल्पिक राजनीति का निर्माण कर सकते हैं और न ही राजनीतिक विकल्प का।’’ 

वे यहां नहीं रुकते, बल्कि देश पर हावी बूर्जुआ राजनीति के सामने अपनी निर्णायक बात रखते हैं: ‘‘यह जो वैचारिक शून्य आया है यह बहुत खतरनाक है। बहुत-से लोग यह भी मानते हैं कि... विचारधारा की कोई जरूरत नहीं है... यह सोच दिशाहीनता की ओर ले जाता है। ... दुनिया को समझने और समझ कर दुनिया को बदलने का एक ढांचा तो बनाना ही पड़ेगा, उसी को आप विचारधारा कह सकते हैं। वह समाजवादी विचारधारा हो, सर्वोदयी विचारधारा हो, मार्क्सवादी विचारधारा हो या कोई और विचारधारा हो।’’ 

अंतत: सुनील हम सबको ललकारते हैं, ‘‘सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दुनिया को बदल कर एक नया समतामूलक, न्यायमूलक समाज बनाना संभव है? यदि आप ऐसा मानते हैं तो एक वैकल्पिक राजनीति निकलेगी और यदि हमने मान लिया कि यह संभव नहीं है तो कोई वैकल्पिक राजनीति नहीं निकलेगी।... कांग्रेस की जगह भाजपा आती रहेगी, भाजपा की जगह कांग्रेस आती रहेगी या कोई तीसरी भी आएगी तो वह उन्हीं का नया संस्करण होगी।... तो एक नए समाजवाद की कल्पना करें, जिसमें हम पूंजीवादी व्यवस्था का विकल्प ढूंढ़ने के साथ-साथ विकास के नए मॉडल और एक नई सभ्यता की कल्पना करें।... सिर्फ राजनीतिक विकल्प का नहीं, वैकल्पिक राजनीति का जो मामला है वह अनिवार्य रूप से नए समाजवाद की कल्पना और उसके विचार से जुड़ा है।’’ 

निस्संदेह, नए समाजवाद का यह सपना वैकल्पिक राजनीति की अगली चुनौती रहेगा। अलविदा सुनील भाई! 


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