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इस डर को क्या नाम दें Print
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Wednesday, 30 April 2014 11:36

अरुण माहेश्वरी

जनसत्ता 30 अप्रैल, 2014 : नरेंद्र मोदी कॉरपोरेट और राजनीति के मेल की उपज हैं। पूंजी की निर्मम ढंग से सेवा के सिवाय

इस मेल का न कोई धर्म है न संप्रदाय। हर बीतते दिन के साथ यह बात साफ होती जा रही है। मोदी की अब तक की राजनीति का यही सार-तत्त्व है। भाजपा का पूरा प्रचार, इस पर खर्च किया जा रहा अरबों रुपया, उसके पीछे खड़े भारत के सभी बड़े-बड़े इजारेदार घराने इसी बात के प्रमाण हैं। मोदित्व अर्थात मुसोलिनी का फासीवाद अर्थात कॉरपोरेटवाद।

हिटलर का एक मूल मंत्र था कि सत्ता में आने के लिए समाज के हर तबके से उसकी हर समस्या के समाधान का वादा करो, क्योंकि विजयी से बाद में कभी कोई जवाब मांगने की हिम्मत नहीं करता। वह पार्लियामेंट में गया था बहस करने के लिए नहीं, बहस को ही खत्म कर देने के लिए; संसदीय प्रणाली का सम्मान करने के लिए नहीं, संसद को ही नष्ट कर देने के लिए। उसने युद्ध शुरू करने के पहले अपने सहयोगियों से कहा था-युद्ध के प्रारंभ के लिए मैं एक प्रचारमूलक तर्क तैयार करूंगा। यह कभी मत सोचो कि वह सच है या नहीं, विजेता से बाद में कोई नहीं पूछेगा कि उसने सच कहा था या नहीं। युद्ध छेड़ने और चलाने में ‘सहीपन’ का कोई मतलब नहीं है, सिर्फ जीत का मतलब होता है।

बाहुबलियों द्वारा चुनाव लूटने की सचाई को हम पिछले चालीस सालों से देश के विभिन्न हिस्सों में देखते आए हैं। इस बार धनबलियों ने पूरे देश का चुनाव लूटने की योजना तैयार की है। मोदी की चुनावी सभाओं में कैमरों की मदद से भीड़ को कई गुना बढ़ा कर तो दिखाया ही जाता है, भीड़ का भारी शोर भी पहले से डब किया हुआ होता है। धनबलियों द्वारा लोगों के मतों पर डाका ही फासीवादी कॉरपोरेटवाद है और मोदी उसी के प्रतिनिधि हैं। यह भारत के जनतंत्र को कॉरपोरेट घरानों की खुली चुनौती है। 

‘इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका के एक ताजा अंक के मुखपृष्ठ पर मोदी की तस्वीर है और यह सवाल किया गया है कि ‘क्या नरेंद्र मोदी को कोई रोक सकता है?’ आगे, अंक में भारत के चुनाव पर दो पन्नों के लेख में इसी सवाल के उत्तर की तलाश की गई है। इस लेख में कांग्रेस सरकार की विफलताओं और उसके शासन में फैले राजनीतिक भ्रष्टाचार का विश्लेषण किया गया है। मोदी के राजनीतिक इतिहास, आरएसएस से उनके संबंध, उनके अंदर भरा हुए मुसलिम-विद्वेष और गुजरात के दंगों के समय उनकी भूमिका का भी उल्लेख है। साफ कहा गया है कि उन दंगों में मोदी के खिलाफ सबूत इसलिए नहीं मिल पाए हैं क्योंकि सबूतों को बाकायदा नष्ट कर दिया गया है।

इन सभी स्थितियों का आकलन करते हुए ‘इकोनॉमिस्ट’ की साफ राय है कि मोदी भारत के समाज में एक भारी विभाजनकारी तत्त्व साबित होंगे। इसीलिए पत्रिका का कहना है कि गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनने के आसार न दिखने के बावजूद ‘हम भारत के लोगों से अपेक्षाकृत कम बुरे विकल्प की सिफारिश करेंगे।’

‘इकोनॉमिस्ट’ का यह भी कहना है कि मोदी में आधुनिकता, ईमानदारी या न्यायप्रियता जैसा कुछ भी नहीं है। भारत को इससे बेहतर मिलना चाहिए। इस लेख में ‘इकोनॉमिस्ट’ ने राजग के घटकों से यह अपील भी की है कि उन्हें मोदी के बजाय किसी दूसरे को अपना प्रधानमंत्री चुनना चाहिए। ‘इकोनॉमिस्ट’ का कहना है कि मोदी प्रधानमंत्री बन सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे इसके लायक हैं।

हम भी उन लोगों में नहीं हैं जो कांग्रेस और भाजपा को एक ही तराजू पर तौलते हैं। कांग्रेस का नव-उदारवाद देश की अनेक बीमारियों की जड़ में होने के बावजूद वह अब भी जन-दबावों के सामने खुली है। इसके विपरीत, मोदी के नेतृत्व की भाजपा नव-उदारवादी नीतियों को पूरी निष्ठुरता और निर्दयता के साथ लागू करने वाली पार्टी है। उसने गुजरात में इसका परिचय दिया है। अब तो भारतीय जनता पार्टी अतीत की कोई विस्मृत हो चुकी पार्टी है। जो सामने है, वह तो मोदी-पार्टी है, जिसका लक्ष्य मोदी सरकार का गठन करना है। मोदी के अलावा इसमें दूसरा कोई नेता नहीं है। 

विष-बुझे भाषणों के साथ अब मोदी अपने असली रंग में आ गए हैं। गुजरात का झूठ क्या खुला, मोदीजी का विकास का ढकोसला भी बंद हो गया! पहले मोदी की विकास की रट से कुछ लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ था। कुछ को लगा कि आगे की राजनीति अब सिर्फ विकास पर होगी। लेकिन यह भ्रम इतना अल्पजीवी साबित होगा, यह कम लोगों ने ही सोचा था!

भाजपा-विरोधी दलों को पाकिस्तान का एजेंट घोषित करने के बाद अब मोदी ने राष्ट्र के संविधान की आधारशिला पर आक्रमण करना शुरू कर दिया है। जम्मू के अपने भाषण में उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध फिर उसी धर्मयुद्ध की हुंकार भरी, जो आरएसएस अपने जन्म के समय से ही करता रहा है। अगर इसी प्रकार चलता रहा तो जल्द ही अपनी वीरता का बखान करते हुए वे 2002 पर अपने गर्व-बोध की घोषणा करेंगे। संघी भाषा में वे उसे गुजरात के विभिन्न इलाकों में मुसलिम-बस्तियों के रूप में मौजूद सभी छोटे-छोटे पाकिस्तानों को उजाड़ने को महान ‘देशभक्तिपूर्ण’ काम कहेंगे। उनकी जुबान पर जल्द ही फिर राम जन्मभूमि, काशी, मथुरा की बातें भी आने लगेंगी। आरएसएस के मूलभूत सिद्धांत पर


वे हिंदुओं के सैन्यीकरण की, अल्पसंख्यकों को अराष्ट्रीय मानने और उनके साथ तदनुरूप आचरण करने की बात भी करने लगें तो इस पर अचरज नहीं होना चाहिए। 

नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने से हम जिन खतरों की बात करते हैं, वे अभी से सामने आने लगे हैं। वे अपने असली मंतव्यों को जितना हीछिपाने की कोशिश करते हैं, उतने ही प्रबल रूप में उनका असली चेहरा सामने आ जाता है। आरएसएस की विचारधारा में जो संघ का समर्थक नहीं है, वह हिंदू नहीं है, पाकिस्तान का एजेंट है। नरेंद्र मोदी उसी कट््टरता को दोहरा रहे हैं। इसके पीछे उनका आत्म-विश्वास बोल रहा है या किसी प्रकार की घबराहट है, यह विचार का दूसरा विषय है। किसी भी वजह से क्यों न हो, आज उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को रुपयों और मालिकों की धौंस के बल पर इतनी बुरी तरह से कस कर रख दिया है कि आडवाणी तक इस माध्यम से गायब हैं। प्रेस और माध्यमों की स्वतंत्रता पर यह हमला आपातकाल के दिनों की यादों को ताजा कर देता है। मोदी हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक बड़ा खतरा हैं।

आरएसएस का कोई संविधान नहीं था। उसे सरदार पटेल ने जबर्दस्ती उस समय गोलवलकर पर दबाव डाल कर तैयार करवाया था, जब गांधीजी की हत्या के बाद गोलवलकर जेल में थे। संविधान न होने का आरएसएस वालों का तर्क होता था कि हिंदू संयुक्त परिवार का भी क्या कोई संविधान होता है! यह तो एक अलिखित, सदियों की परंपराओं से स्वत: निर्मित संविधान है। परिवार के प्रमुख कर्ता की इच्छा सर्वोपरि होती है, उसे कोई चुनौती नहीं दी जा सकती। हास्यास्पद ढंग से वे संघ के अवतरण को ईश्वरीय काम मानते हुए गीता के श्लोक को भी उद्धृत करते थे: ‘यदा यदा हि धर्मस्य...’

भाजपा ने भी अपना मुखिया चुन लिया है। उसकी इच्छा और कथन ही घोषणापत्र है, क्योंकि उसे कभी चुनौती नहीं दी जा सकती है। ऊपर से, मोदी तो साक्षात ईश्वर भी है- हर हर मोदी! महादेव का नया अवतार! फिर कैसा घोषणापत्र, कैसा संविधान! 

इमाम बुखारी से सोनिया गांधी की यह अपील कि सेक्युलर वोटों में विभाजन नहीं होना चाहिए, आगामी चुनाव के सारे समीकरणों को बदल देने वाला एक ‘मास्टर स्ट्रोक’ साबित हो सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बुखारी के नियंत्रण में कोई वोट है या नहीं। फर्क पड़ता है सोनिया गांधी की इस अपील से। यह मतदाताओं के बड़े हिस्से के मन के तारों को छेड़ सकता है। भाजपा ने नरेंद्र मोदी को सामने लाकर सभी सांप्रदायिक तत्त्वों को इकट्ठा करने का काम शुरू किया था, इसका माकूल जवाब सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों की एकता ही हो सकता है। सोनिया गांधी ने यही आह्वान किया है। जिनको रामदेव जैसे धार्मिक नेताओं का उपयोग करने में जरा भी हिचक नहीं होती, वे इमाम बुखारी से सोनिया गांधी के मिलने और उनसे अपील करने पर इतना भड़क क्यों गए? 

धर्मगुरुओं को लेकर हमेशा से राजनीति करने वाले आरएसएस और भाजपा के नेता जब इमाम बुखारी से सोनिया गांधी के मिलने और उनसे निवेदन करने पर भड़कते हैं तो उनका मिथ्याचार देखते बनता है।

सन 2002 में गुजरात में मारे गए हजारों बेकसूर आज भारत के लोगों से इंसाफ  मांग रहे हैं। हमेशा बढ़-चढ़ कर अपनी डींग हांकने वाले नरेंद्र मोदी 2002 का जिक्र आते ही एकदम मौन हो जाते हैं। मोदी की यह सायास चुप्पी क्या कहती है? यह इस बात का संकेत है कि खुदा न खास्ता इस चुनाव में अगर उनको कुछ अधिक सीटें मिल गर्इं तो वे यह खुल कर दावा करेंगे कि भारत के लोगों ने 2002 के जनसंहार पर मोहर लगा दी है। 

यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आगामी चुनाव में भारत में फासीवाद के खिलाफ एक फैसलाकुन लड़ाई होगी। एबीपी न्यूज वाले भाजपा केनेताओं से पूछ रहे थे कि मोदी की कथित लहर रुक क्यों गई है? चुनाव परिणाम बताएंगे कि लहर तो कोरी मीडिया की माया थी, आंख खुलते ही इसे खत्म होना था। भाजपा का दुर्भाग्य यह है कि वह खुद इस माया का शिकार हो गई। अभी से उसके समर्थन में ज्वार के बजाय भाटे का दौर शुरू हो गया है। यह बात सिर्फ नेताओं के आने-जाने की नहीं है, आम समर्थकों के मोहभंग की है । 

मोदी और भाजपा में बढ़ रही स्पर्श-कातरता (एक प्रकार का छुई-मुईपन)- कहीं किसी भी कोने से उनके विरोध का कोई स्वर सुनाई न देने पाए, इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद के सभी उपायों के प्रयोग के प्रति अति-तत्परता- दरअसल जनतंत्र के बुनियादी उसूलों के खिलाफ  है। लेकिन, यही आगामी चुनाव में उनकी पराजय का भी संकेत है।


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