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भंवर में भारत की विदेश नीति Print
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Tuesday, 08 April 2014 11:58

पुष्परंजन

जनसत्ता 8 अप्रैल, 2014 : भारत में चुनाव के सप्ताह भर पहले अमेरिकी राजदूत नैंसी जे पावेल का जाना,

इस तरह का समाचार बन गया, जैसे उसके पीछे नरेंद्र मोदी कारण रहे हों, या फिर देवयानी खोबरागड़े। लेकिन अमेरिकी दूतावास की वेबसाइट देखिए तो लगता है कि दोनों में से कोई भी नैंसी पावेल के अवकाश ग्रहण की वजह नहीं है। ‘एंबेसेडर पावेल की घोषणा’ शीर्षक वाली विज्ञप्ति में साफ लिखा है, ‘यह कुछ समय से योजना थी कि मई के अंत में वह सेवानिवृत्त होकर अपने घर डेलवेयर जाएंगी।’ विज्ञप्ति में यह भी टंकित है कि छियासठ साल की नैंसी पावेल, सैंतीस साल की सेवा पूरी कर चुकी हैं। इस घोषणा के बाद तुक्के को तीर साबित करने की कहानी शुरू हो गई, जिसे विराम लगाने के लिए अमेरिकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिय हर्फ ने स्पष्ट किया कि नैंसी पावेल पूर्व निर्धारित योजना के अनुरूप अवकाश ले रही हैं। उनका हाल में हुए किसी तनाव से कोई लेना-देना नहीं है।

 

नरेंद्र मोदी और नैंसी की हालिया मुलाकात के हवाले से बात करें तो लगता है कि अमेरिकी प्रवक्ता हर्फ ने जो कुछ कहा उसमें दम है। बल्कि यों कहें कि तेरह फरवरी को गांधीनगर जाकर नैंसी ने भावी कूटनीति के उन बंद दरवाजों को खोला है, जिन पर अमेरिका ने 2005 से ताला लगा रखा था। गुजरात दंगों के कारण अमेरिका ने नरेंद्र मोदी को कूटनीतिक वीजा देने से मना कर दिया था। मार्च, 2013 से पहले जो नरेंद्र मोदी यूरोपीय संघ और ब्रिटेन की आंख की किरकिरी थे, अचानक उनकी आंखों का नूर बन गए। ‘ब्रिक्स रिपोर्ट’ के लेखक और ब्रिटिश अर्थशास्त्री जिम ओ नील को नरेंद्र भाई मोदी ‘अच्छे अर्थशास्त्री’ नजर आने लगे। वित्तीय मामलों के एक अन्य विश्लेषक क्रिस वुड ने ‘ग्रीड ऐंड फीयर’ साप्ताहिक में टिप्पणी की कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी भारतीय शेयर बाजार की सबसे बड़ी उम्मीद बन कर उभरे हैं। पश्चिम वाले कितनी तेजी से ‘जैसी बही बयार, पीठ तब तैसी कीजिए’ की भंगिमा में आ जाते हैं, इसका ताजा उदाहरण ‘मनमोहनॉमिक्स’ से ‘मोदीनॉमिक्स’ में हुआ उनका विचार परिवर्तन है।

मार्च 2013 में यूरोपीय संघ ने मोदी का बहिष्कार समाप्त करने की घोषणा की। इसके साथ यह भी स्पष्ट कर दिया कि मानवाधिकार रक्षा और महिलाओं का अधिकार अलहदा मुद््दा है। मुराद यह कि 2002 का गुजरात जनसंहार अब यूरोप वालों के लिए नैतिकता का विषय नहीं रहा, इसलिए मानवाधिकार और 2002 के दंगों के सवाल को उन्होंने हाशिये पर रख दिया है। अमेरिका ने नैंसी पावेल को फरवरी में गांधीनगर भेज कर मोदी को ‘कूटनीतिक क्लीनचिट’ ही दी थी। ऐसे में जो लोग सोचते हैं कि नरेंद्र मोदी के कारण नैंसी नप गर्इं, यह उनकी भूल है।

नैंसी पावेल के गुजरात से लौटने के बाद, अमेरिकी विदेश राज्यमंत्री निशा देसाई विस्वाल ने नरेंद्र मोदी के संदर्भ में पूछे सवाल पर कहा कि लोकतांत्रिक रूप से चुना गया भारतीय नेता, अमेरिका का ‘वेलकम पार्टनर’ यानी स्वागतयोग्य सहयोगी है। क्या गुजराती मूल की निशा देसाई विस्वाल को अमेरिकी विदेश राज्यमंत्री और दक्षिण एशिया मामलों की प्रभारी बनाए जाने के पीछे वाइट हाउस की कोई दूरगामी योजना रही है? पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अमेरिका को अपना ‘स्वाभाविक मित्र’ मानते थे। शायद इसलिए ओबामा प्रशासन, मोदी में वाजपेयी युग का विस्तार देखता है।

यों पिछले साल जुलाई से ही इसकी भूमिका बननी आरंभ हो गई थी, जब भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अमेरिका जाकर मोदी के लिए वीजा देने की अपील की। उसके प्रकारांतर पैंसठ संसद सदस्यों के हस्ताक्षर वाला पत्र ओबामा को भेजा गया, जिसमें मोदी को वीजा जारी करने का आग्रह किया गया था। इस विवादित पत्र पर जब बवाल मचा, तब माकपा सांसद सीताराम येचुरी ने इनकार किया कि ऐसे किसी प्रतिवेदन पर उन्होंने हस्ताक्षर किया था।

कुल मिलाकर, चुनाव से पहले अमेरिका और उसके पश्चिमी मित्रों ने मोदी का कूटनीतिक यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया है। इसलिए अब मान लेना चाहिए कि अमेरिका और उसके यूरोपीय मित्र कूटनीति की ऐसी वाशिंग मशीन हैं, जिससे धुल कर निकलने वाला बेदाग हो जाता है।

लेकिन कूटनीति की इस वाशिंग मशीन में धुलने से पहले मोदी ने जापान, चीन, सिंगापुर, हांगकांग, रूस, इजराइल, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, युगांडा, केन्या, आस्ट्रेलिया की यात्राएं लगातार की थीं और गुजरात में निवेश के लिए इन देशों को आमंत्रित किया था। मोदी की इन यात्राओं के लिए माहौल बनाने में प्रवासी गुजरातियों की अहम भूमिका रही, इस पहलू को ध्यान में रखना आवश्यक है। विदेशी निवेशक, दंगे के दाग को एक तरफ रखते हुए गुजरात में निवेश के लिए आकर्षित हुए। चीन ने दस अरब डॉलर का निवेश गुजरात में करने की इच्छा जताई थी। यह मोदी से मधुर संबंध के बिना संभव नहीं था।

चीनी नेतृत्व इस समय चुप होकर भारतीय राजनीति में तेल और तेल की धार को देख रहा है। चीन से सीमा विवाद का समाधान सबसे बड़ा यक्षप्रश्न है। अफगानिस्तान में भारत 2014 के बाद किस भूमिका में होगा, क्रीमिया पर समर्थन के बाद रूस से संबंध की दिशा क्या होगी, श्रीलंका से संबंध कैसे बेहतर होंगे? ये तमाम सवाल हैं।

भावी सरकार के संदर्भ में सबसे अधिक भ्रम पाकिस्तान-भारत संबंध को लेकर है। पाकिस्तानी थिंक टैंक का एक बड़ा खेमा (जिसमें नजम सेठी, सैयद तारिक पीरजादा शामिल हैं) महसूस करता है कि मोदी के सत्ता में आते ही तालिबान, जमात-ए-इस्लामी और उसके हममिजाज कठोरपंथियों का भारत विरोधी एजेंडा


और मजबूती के साथ सामने आएगा। अगर ऐसा होता है, तो कश्मीर का जिन्न और भी बड़े आकार में बोतल से बाहर निकलेगा। यह भी संभव है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमा, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका तक के कठोरपंथी मोदी की विदेश नीति के विरुद्ध लामबंद हों।

पाकिस्तानी सत्तातंत्र का एक बड़ा हिस्सा मानता है कि भारत में नरम और कमजोर प्रधानमंत्री होने से उसके हित सधते हैं। इसलिए नवाज शरीफ भी नहीं चाहेंगे कि दक्षिण एशिया के जंगल में उनसे भी बड़ा शेर, दहाड़ने के लिए आ जाए। मगर कूटनीति में जो बाहर दिखता है, वही हो यह जरूरी नहीं। यह भी मुमकिन है कि मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी की तरह ‘मीनार ए पाकिस्तान’ जाएं, और शांति वार्ता करें। क्या इसके लिए संघ की सहमति मिल जाएगी? संघ की सहमति नहीं मिलती, तो शायद वाजपेयी भी पाकिस्तान नहीं जाते। मोदी, नवाज शरीफ के साथ मिल कर आतंकवाद के विरुद्ध साझा अभियान छेड़ें, या सरक्रीक विवाद को सुलझाएं, इसकी संभावना तो बनती है।

पाकिस्तान के प्रति मोदी क्यों नरम हो सकते हैं, इसके लिए 2011 का उदाहरण दिया जा सकता है। तब कराची उद्योग-वाणिज्य संघ ने गुजरात के विकास से प्रभावित होकर मोदी को पाकिस्तान आमंत्रित किया था, ताकि वे वहां के कारोबारी अगुआओं को संबोधित करें। कराची उद्योग-वाणिज्य संघ ने कराची-अमदाबाद के बीच सीधी उड़ान की मांग मोदी से की थी। उस समय मुख्यमंत्री मोदी, पाकिस्तान के लिए इतना पिघल चुके थे कि सिंध के दूसरे इलाकों में जारी विद्युत संकट के समाधान के लिए खंभात की खाड़ी में बनी कल्पासार परियोजना और गुजरात सौर ऊर्जा जैसी योजनाएं बनाने में मदद की पेशकश कर दी थी। क्या एक मुख्यमंत्री को ऐसी बातचीत के लिए केंद्र की सहमति की जरूरत नहीं ेथी?

मोदी ने उस मिथक को तोड़ा है कि एक मुख्यमंत्री को उसके प्रदेश तक महदूद रहना चाहिए। विदेशी मामलों के विश्लेषक मानते हैं कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो शायद राज्यों को बाहर के देशों से संबंध बढ़ाने के लिए विशेष अधिकार मिले। लेकिन क्या राज्यों के मुख्यमंत्री इतने मजबूत हो जाएंगे कि ममता बनर्जी की तरह बांग्लादेश से तीस्ता समझौता न होने दें, या फिर जयललिता की तरह हो जाएं, जिनका हर कदम श्रीलंका के विरुद्ध हो?

विदेश नीति के कई रणनीतिकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री पद के लिए वैश्विक दृष्टि वाला व्यक्ति होना चाहिए, जिसका अखिल भारतीय कद हो। लेकिन ऐसा कहते समय वे यह भूल जाते हैं कि इस देश में चार ऐसे प्रधानमंत्री हुए हैं, जो मुख्यमंत्री पद को सुशोभित कर चुके थे। पांचवें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और सातवें प्रधानमंत्री वीपी सिंह उत्तर प्रदेश, नौवें प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव आंध्र प्रदेश के और ग्यारहवें प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके थे।

क्या भारतीय कूटनीति डोनाल्ड रम्सफेल्ड के चर्चित फिकरे ‘ज्ञात-अज्ञात’ (नोन-अननोन) के आधार पर चल रही है? यह सवाल पूर्व विदेश सचिव ललित मान सिंह ने विश्व मामलों की भारतीय परिषद के मंच से उठाया है। उन्होंने कहा कि जो ज्ञात है, वह यह कि चुनाव बाद देश में एक गठबंधन सरकार होगी, जिसके मुखिया या तो मोदी होंगे, या राहुल गांधी। और जो अज्ञात है, वह यह कि एक अपरंपरागत सरकार (मैवरिक गवर्नमेंट) होगी, या मैवरिक पीएम होगा। ललित मान सिंह खुल कर नहीं कहना चाहते थे कि भावी मोदी सरकार की विदेश नीति नागपुर से तय हुआ करेगी, या बड़े उद्योग घरानों के निर्देश पर ‘गुंजायमान भारत’ (वाइब्रेंट इंडिया) का मार्ग प्रशस्त होगा।

देवयानी खोबरागड़े प्रकरण में अमेरिका का विरोध, क्रीमिया पर रूस का समर्थन और श्रीलंका मेंमानवाधिकार हनन की बाहरी देशों द्वारा जांच के प्रस्ताव का विरोध कर भारत ने एक मजबूत विदेश नीति का परिचय दिया है। लेकिन विश्वास नहीं होता कि यही मनमोहन सिंह, ममता बनर्जी के दबाव में तीस्ता समझौता न कर, अपनी कमजोरी दुनिया को दिखा गए। जबकि एचडी देवगौड़ा ने एक अल्पमत सरकार के प्रधानमंत्री रहते बांग्लादेश से गंगा जल समझौता किया था। आठ माह के शासन वाले चंद्रशेखर ने इराक युद्ध के दौरान अमेरिकी युद्धक विमानों को मुंबई में तेल भरने की अनुमति दी थी। इसके उलट, भारतीय सैनिकों के सिर काटने की घटना पर हम बेबस थे। सीमा पर फायरिंग, श्रीलंका, मालदीव से छत्तीस के आंकड़े, चीनी घुसपैठ, हमारे मछुआरों को मारने वाले इतालवी नौसैनिकों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की लाचारी, हमारी विदेश नीति की कमजोर नसें हैं।

नेहरू ने भले ही भारतीय विदेश नीति की बुनियाद रखी थी, लेकिन इंदिरा गांधी के आते-आते पंचशील की पहचान बदल चुकी थी। अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में विदेश नीति में बदलाव का दूसरा दौर आरंभ हुआ। वाजपेयी ऐसे पहले नेता थे, जिन्होंने विदेशमंत्री रहते संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में अभिभाषण किया था। मनमोहन सिंह आर्थिक राजनय को विस्तार देते रहे और पीवी नरसिंह राव की पूरब की ओर देखो नीति को बढ़ाते रहे। क्या यूपीए-एक से यूपीए-दो तक के शासन में हमारा विदेश मंत्रालय व्यापार-प्रोत्साहन परिषद के रूप में परिवर्तित हो गया है?

 

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