Bookmark and Share
विषमता के शेष प्रश्न Print
User Rating: / 4
PoorBest 
Wednesday, 05 February 2014 11:48

अजेय कुमार

जनसत्ता 5 फरवरी, 2014 : यह मंडेला के व्यक्तित्व का करिश्मा था कि आज दक्षिण अफ्रीका में

सात सौ सार्वजनिक स्थल उनके नाम पर हैं। दस दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मंडेला स्मृति दिवस के मौके पर बुश, ओबामा, कैमरन, टोनी ब्लेयर और फ्रांस, जर्मनी, जापान और अन्य कई देशों के प्रतिनिधियों ने मंडेला को शांति का मसीहा मानते हुए उन्हें दक्षिण अफ्रीका का गांधी कहा। पर अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन में मंडेला ने उन तमाम स्वतंत्रता सेनानियों और देशभक्तों से दोस्ती रखी जिन्हें ये देश और उनकी विशाल प्रचार मशीनरी आतंकवादी कह चुकी है- आयरिश रिपब्लिकन आर्मी, पीएलओ के यासर अरफात, लीबिया के गद्दाफी, क्यूबा के फिदेल कास्त्रो, जिम्बाब्वे के रॉबर्ट मुगाबे आदि। 1989 तक खुद मंडेला अमेरिका की ‘आतंकवादी सूची’ में शामिल थे।

 

अमेरिका ने 1990 में उनका नाम इस सूची से हटाया ताकि वे अमेरिका की यात्रा पर जा सकें। यहां एजाज अहमद का मत भिन्न है। ‘फ्रंटलाइन’ में छपे उनके लेख के अनुसार मंडेला का नाम आतंकवादियों की अमेरिकी सूची से 2008 में निकाला गया। यह अजीब बात है और एजाज अहमद भी अचरज प्रकट करते हैं कि इस सूची में मंडेला का नाम होते हुए भी 2002 में उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया। यह मंडेला के व्यक्तित्व को ही दर्शाता है कि इससे पहले उन्हें सोवियत संघ के जमाने में ‘आर्डर ऑफ लेनिन’ का पुरस्कार भी मिला था।

सोवियत संघ के विघटन ने मंडेला पर गहरा असर डाला। दरअसल, मंडेला के राजनीतिक विचारों में दो धाराएं देखी जा सकती हैं। जब 1962 में वे जेल गए, तो साम्राज्यवाद-विरोधी और क्रांतिकारी आंदोलन पहले से ही उभार पर थे। चीन और क्यूबा के बाद विएतनाम, कोरिया, अल्जीरिया और अन्य कई देशों में समाजवादी शक्तियां विश्व-स्तर पर अपना प्रभुत्व जमा चुकी थीं। मध्य-पूर्व क्षेत्र में धर्मनिरपेक्ष साम्राज्यवाद-विरोधी ताकतों का असर था। पर सत्ताईस वर्षों की जेल के बाद 1990 में स्थितियां उलट चुकी थीं। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप टूटने के कगार पर थे। चीन में देंग शियाओ पेंग अपने देश में ‘अमीर होना बुरा नहीं’ का पाठ पढ़ा रहे थे।

निजीकरण की नीतियां विएतनाम और चीन में लागू की जा रही थीं। इन तमाम बदलावों ने मंडेला के निजीकरण संबंधी विचारों को बदल दिया। अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस ने उपजाऊ जमीन, खानों, वित्तीय संस्थाओं और औद्योगिक कारखानों पर गोरों का प्रभुत्व कायम रहने दिया। अमेरिका ने अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (एएनसी) के अर्थशास्त्रियों को प्रशिक्षण दिया, जिन्होंने विश्व बैंक के अधिकारियों के साथ मिल कर अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के ऋण की मदद से दक्षिण अफ्रीका का आर्थिक नक्शा बदल डाला। इस सब के साथ-साथ एएनसी के नेता भ्रष्टाचार के दलदल में धंसते चले गए। जब दक्षिण अफ्रीका के कालों के लिए आवास योजनाओं में कटौती की जा रही थी, राष्ट्रपति जेकब जूमा के घर के सौंदर्यीकरण पर एक सौ बीस करोड़ रुपए खर्च किए गए। सुरक्षा के नाम पर उनके घर में हैलीपैड, एक क्लीनिक और एक भूमिगत बंकर बनाया गया।

वैसे तो दुनिया के तमाम राष्ट्राध्यक्षों ने मंडेला को अपने-अपने ढंग से श्रद्धांजलि दी है, पर दक्षिण अफ्रीका के रंगभेदी निजाम के आखिरी राष्ट्रपति एफडब्ल्यू डी कलार्क ने जो कहा, वह सत्ता-प्राप्ति के बाद मंडेला के व्यक्तित्व में आए बदलाव की ओर भी संकेत करता है। उन्होंने कहा ‘उनकी सबसे बड़ी विरासत है कि उन्होंने पहले के संघर्ष और आज की शांति के बीच पुल का काम किया...उनमें कड़वापन नाममात्र को था।’ बड़ी-बड़ी जागीरों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों के प्रति बेहद नरम रवैये का ही नतीजा था कि अमेरिका और इंग्लैंड की शासक पार्टियों ने हमेशा मंडेला का महिमामंडन किया।

लंदन पार्लियामेंट चौक पर मंडेला की प्रतिमा लगाई गई और लीड्स में एक पार्क का नाम ‘मंडेला गार्डन’ रखा गया है। लगभग एक वर्ष पहले चावेज की मृत्यु पर सभी साम्राज्यवादी देशों के नेताओं की चुप्पी मंडेला और चावेज की राजनीति में फर्क को दर्शाती है।

यह एक कटु हकीकत है कि सत्ता प्राप्ति के बाद मंडेला की नीतियां ऐसी रहीं कि गोरे मालिकों को लगभग कोई तकलीफ नहीं हुई। शासक पार्टी अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस उनके नाम का इस्तेमाल करती रही और आम जनता रंगभेद व्यवस्था की समाप्ति के बाद अपने कष्टों के निवारण के लिए सत्ताधारियों का मुंह देखती रही, पर हर बार उसे निराशा ही हाथ लगी। रंगभेद व्यवस्था को खत्म करने के उद््देश्य से जब मंडेला ने अपना संघर्ष शुरू किया था, तो पहले उन्होंने 1955 में अपने भावी कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की थी जिसे नाम दिया गया ‘फ्रीडम चार्टर’। इस घोषणापत्र में कहा गया था, ‘दक्षिण अफ्रीका की तमाम खनिज संपदा, बैंक और इजारेदार उद्योगों का स्वामित्व जनता के हाथों में दिया जाएगा।’ मगर सत्ता-प्राप्ति के बाद ऐसा कुछ नहीं किया गया।

रंगभेद निजाम खत्म होने के बाद बेशक राजनीतिक तौर पर दक्षिण अफ्रीका ने बहुत कुछ हासिल किया, पर साधारण जनता के आर्थिक स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ। अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस बीस वर्षों से अधिक समय से सत्ता में है और इस दौरान काले लोगों की आर्थिक दशा बद से बदतर हुई है।

देश की पचासी फीसद भूमि आज भी पंद्रह फीसद गोरों के हाथ में है। कालों में तीस फीसद बेरोजगार हैं और अगर इनमें खेतिहर मजदूरों को भी जोड़ दिया जाए तो यह बेरोजगारी पैंतालीस फीसद होगी। आज भी पंद्रह लाख काले लोगों के पास


शौचालय की सुविधा व्यवस्था नहीं है, सत्रह लाख लोगों के पास कपड़े धोने या खाना बनाने की व्यवस्था नहीं है, चौदह लाख अफ्रीकी बच्चे ऐसे घरों में रहते हैं जहां पेयजल उपलब्ध नहीं है, पच्चीस प्रतिशत काले लोग गरीबी की रेखा से नीचे हैं। जनसंख्या के ऊपरी पांच प्रतिशत लोग निचले पांच प्रतिशत लोगों की तुलना में तीस गुना अधिक वेतन पाते हैं।

वर्ष 2007 के सर्वेक्षण के अनुसार एक गोरा काले की तुलना में औसतन सात गुना अधिक कमाता है। यह शर्म की बात है, पर सच है कि यह असमानता रंगभेदी शासन के समय से भी अधिक है। आज दक्षिण अफ्रीका में पचास लाख लोग एचआइवी/एड्स रोग से प्रभावित हैं। 2009 के आंकड़े बताते हैं कि वहां एक गोरे व्यक्ति की संभावित आयु इकहत्तर वर्ष है जबकि काले व्यक्ति की सिर्फ अड़तालीस वर्ष। हीरे और सोने की खानें गोरों के पास ही हैं। वे बड़े-बड़े घरों में रहते हैं और कई जगह उनके घरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी ब्रिटिश सुरक्षा एजेंसियों के पास है। उन्हें कालों पर आज भी विश्वास नहीं है।

पिछले साल के आखिर में मुझे जोहानिसबर्ग जाने का मौका मिला था। वहां के पॉश इलाकों में आज भी पांच-सितारा होटलों का स्वामित्व गोरों के पास है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां आज भी खनिज संपदा की लूट जारी रखे हुए हैं। निजीकरण का आलम यह है कि सरकारी पैसे से बनी हुई सड़कों पर टोल टैक्स प्राइवेट एजेंसियां वसूल करती हैं। सभी अच्छे स्कूल प्राइवेट हैं, जिनकी फीस इतनी अधिक है कि केवल गोरों के बच्चे वहां दाखिला ले सकते हैं।

कानून तो बना दिया कि बच्चा गोरा हो या काला, कोई स्कूल उसे दाखिला देने से मना नहीं कर सकता, पर व्यवहार में स्थितियां अब भी ऐसी हैं कि काले बच्चे अच्छी शिक्षा से वंचित हैं। यही स्थिति अस्पतालों की है। एक से एक पांचसितारा अस्पताल मौजूद हैं, जहां आला दर्जे की विशेषज्ञता वाली तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं, पर गरीब कालों के लिए यह संभव नहीं है कि वे वहां जाकर इलाज करवा सकें। मध्यवर्ग के लोगों में कालों की संख्या बहुत कम है। अधिकतर अश्वेत गरीब हैं।

आज चमड़ी का रंग देख कर बेशक भेदभाव नहीं किया जाता, पर वर्गीय असमानता के कारण स्थितियों में कोई खास परिवर्तन दिखाई नहीं देता। जोहानिसबर्ग के संभ्रांत इलाकों में मर्सिडीज, फेरारी जैसी महंगी कारों की प्रतिव्यक्ति संख्या दुनिया भर में सबसे अधिक है। कई कारों के पीछे आपको लिखा मिलता है, ‘मेरी दूसरी कार सोवेटो में है।’ यानी सोवेटो के काले लोगों ने वह कार चोरी की है। इससे पता चलता है कि कालों के प्रति पुरानी घृणा अब भी कायम है।

जोहानिसबर्ग के बाहरी इलाके में, लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर सोवेटो में काले लोगों की बस्तियां हैं। धूल भरे रास्तों से गुजर कर जब वहां पहुंचते हैं तो भयावह परिस्थितियों से रूबरू होते हैं। फुटपाथ पर औरतें लकड़ी जला कर रोटियां सेंक रही होती हैं। गरीब बच्चे नंगे पांव धूल में खेल रहे हैं। पेड़ के नीचे कुछ बेरोजगार लोग बीड़ी-सिगरेट पी रहे हैं। काले लोगों के चिपके हुए गालों और धंसी हुई आंखों में झांक कर आप यह कह सकते हैं कि उनकी एक बड़ी आबादी के साथ लगभग धोखा हुआ है। आज जब भी खानों में काम कर रहे श्रमिक हड़ताल करते हैं तो उन्हें रंगभेदी निजाम की ही तरह पुलिस की गोलियों का निशाना बनाया जाता है।

सोलह अगस्त, 2012 को मारीकाना में खदान मजदूरों पर गोलियां चलाई गर्इं, जो अपने कार्यस्थल पर सुरक्षा-व्यवस्था की मांग कर रहे थे। चौंतीस मजदूर मारे गए और अठहत्तर घायल हुए। मारीकाना की लॉनमिन बहुराष्ट्रीय कंपनी ठेका मजदूरों पर ही निर्भर करती है जिन्हें प्रशिक्षण की व्यवस्था न के बराबर है। कुछ दिहाड़ी मजदूर बाहर से लाए जाते हैं। मजदूरों को इस तरह स्थानीय और बाहरी के बीच बांट कर यूनियनीकरण के रास्ते में अवरोध पैदा किया जाता है।

एक दुखद स्थिति यह भी है कि रंगभेद निजाम के कई श्रमिक-विरोधी कानूनों को हटाया नहीं गया है। उनमें से एक है ‘सामान्य उद््देश्य कानून’। अगर किसी विरोध-प्रदर्शन में पुलिस गोली चलाती है और कुछ मजदूर उस गोलीकांड में मारे जाते हैं तो उनकी मौत की जिम्मेदारी जिंदा बचे मजदूरों पर या उस ट्रेड यूनियन पर डाल दी जाती है जिसने प्रदर्शन का आह्वान किया था। मृत श्रमिकों के परिवारों को मुआवजा इन्हें ही देना पड़ता है। ऐसे कई मजदूर-विरोधी कानूनों को आज तक न हटाए जाने से अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस ने यही संकेत साम्राज्यवादी देशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दिया है कि निजाम जरूर बदला है, पर शासक वर्गों को घबराने की आवश्यकता नहीं है। मंडेला ने 1999 में राष्ट्रपति पद से छुट््टी पा ली थी और इसके कुछ ही वर्षों बाद 2001 में दावोस के आर्थिक फोरम में घोषणा की गई ‘दक्षिण अफ्रीका अंतरराष्ट्रीय पूंजी के कब्जे में है।’

साम्राज्यवादी ताकतें आज मंडेला का गुणगान इसलिए करती हैं ताकि दक्षिण अफ्रीका का भावी नेतृत्व मंडेला का नाम लेकर इन्हीं आर्थिक नीतियों को जारी रखे।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें-    https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें-      https://twitter.com/Jansatta

 

आपके विचार