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आप की जमीन और आसमान Print
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Monday, 06 January 2014 11:39

अरुण कुमार त्रिपाठी

जनसत्ता 6 जनवरी, 2014 : दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जब विश्वास-मत ग्रहण कर रहे थे

तो सारे देश की निगाहें उन पर थीं। तमाम टीवी चैनल अपने राष्ट्रीय नेटवर्क पर दिल्ली विधानसभा की उस संक्षिप्त लेकिन जरूरी बहस को प्रसारित कर रहे थे और तमाम विश्लेषक उस बहस के एक-एक शब्द को ध्यान से सुन रहे थे। ऐसा देश की राजनीति में कम ही हुआ है जब किसी विधानसभा के विश्वास-मत को पूरे देश ने इतनी शिद््दत के साथ दिल थाम कर देखा, जैसे उसकी बहसों और परिणामों पर देश की भावी राजनीति की दिशा निर्धारित होने वाली हो। निश्चित तौर पर ऐसा 1993 में उस समय हुआ था जब उत्तर प्रदेश विधानसभा में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की गठबंधन सरकार बनी थी। उसकी तरफ पूरा देश इस उम्मीद से देख रहा था कि क्या दलित और पिछड़ा क्रांति के तौर पर उभरा यह गठबंधन पहले उत्तर प्रदेश और फिर पूरे देश में हिंदुत्व के फासीवादी अभियान को रोक पाएगा? भले वह गठबंधन अल्पजीवी रहा लेकिन फिलहाल उसने भारतीय जनता पार्टी की जमीन पकड़ती जड़ों को हिला दिया था।

 

कुछ वैसी ही उम्मीद और विमर्श के साथ आप की सरकार और उसे बाहर से मिले कांग्रेस समर्थन को देखा जा रहा है। यही वजह है कि यह सरकार सबसे ज्यादा भारतीय जनता पार्टी की आंखों की किरकिरी बन गई है और तभी उसके नेता हर्षवर्धन ने न सिर्फ उसकी ईमानदारी के दावे को खोखला बताया बल्कि उसकी देशभक्तिपर भी संदेह करते हुए अपने प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी का प्रचार करने से नहीं चूके। उन्होंने विधानसभा के विश्वास-मत की बहस में नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को इस तरह से पेश किया जैसे कि उन्हें इसी विधानसभा से प्रधानमंत्री बनना है और यहीं बैठना है!

हालांकि समर्थन देते हुए कांग्रेस ने आप की बिजली और पानी की नीतियों पर अफसरों से गुमराह होने और अव्यावहारिक होने का आरोप लगाया और पांच साल तक समर्थन देने की अतिशयोक्तिपूर्णबात कहते हुए उसे परोक्ष रूप से यह धमकी भी दी कि यह समर्थन तभी तक रहेगा जब तक वे जनहित में कदम उठाते रहेंगे और जनहित की उसकी अपनी व्याख्या है।

अरविंद केजरीवाल की इस बात की तारीफ भी करनी होगी और उन पर संदेह भी जताना होगा कि उन्होंने तमाम सवालों के जवाब न देते हुए या उनके चक्रव्यूह में न फंसते हुए अपनी जमीन और आसमान का एक खाका खींचने की कोशिश की। वे भाजपा की तरफ से उठाए गए हिंदू राष्ट्रवाद या उग्र राष्ट्रवाद की बहस में नहीं उतरे, न ही उन्होंने फोर्ड फाउंडेशन जैसी संस्थाओं से विदेशी चंदे लिए जाने और फिर एनजीओ से राजनीतिक दल में बदलने के सवाल को अहमियत दी। उन्होंने भ्रष्टाचार पर सामान्य बात की, लेकिन कांग्रेस के धड़ाधड़ उभरते और इस राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कांग्रेसी शासन में हुए भ्रष्टाचार पर पहले जैसी सख्त बातें नहीं कीं। संभव है उन्होंने ‘हार में उद्धत और जीत में विनम्र’ होने के पारंपरिक भारतीय सूत्र का पालन किया हो और इसीलिए न तो भाजपा के राष्ट्रवाद का जवाब दिया न ही कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर आक्रामक हुए।

लेकिन इस खामोशी के बावजूद अरविंद केजरीवाल ने जो कहा वह एकदम ताजगी भरा राजनीतिक वक्तव्य था, उसमें देश का दिल छूने की क्षमता है। केजरीवाल के भाषण के दो अंश थे, जिनमें एक तो दिल्ली के विकास के मॉडल पर चर्चा करने वाला और उसे अपनी प्रयोगशाला बनाने वाला था। जिसमें बिजली कंपनियों का ऑडिट, मीटरों की जांच, झुग्गियों को नई जगह बसाने का वादा, दिल्ली के किसानों को सबसिडी, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा, लाल डोरा का विस्तार और शिक्षा स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रम शामिल हैं।

ये दिल्ली के स्थानीय मामले हैं और देश के अन्य राज्यों की स्थिति दिल्ली से अलग है इसलिए उनके इस मॉडल को उन पर हूबहू लागू नहीं किया जा सकता। उनकी ये योजनाएं ज्यादा से ज्यादा महानगरों और उनके आसपास बसते शहरी क्षेत्रों पर लागू हो सकती हैं। चूंकि यह उनकी जमीन है इसलिए उन्हें एक तरफ इस जमीन को बनाए रखना है लेकिन दूसरी तरफ अगर उन्हें पूरे देश के आसमान पर छा जाना है तो नई किस्म की जमीन भी तलाशनी होगी।

छोटा ही सही, लेकिन केजरीवाल के भाषण का एक अंश ज्यादा दार्शनिक और व्यापक महत्त्व का है और शायद देश के ज्यादातर लोगों की निगाह उसी पर थी। वे उसी पर चर्चा करना चाहते हैं और उसी में नए भारत की तस्वीर देखना चाहते हैं। केजरीवाल ने अपने भाषण में एक तरफ आम आदमी की व्याख्या की और दूसरी तरफ पूरे देश से वीआइपी संस्कृति खत्म करने की बात की। इसी को उन्होंने स्वराज की संज्ञा दी है।

उनकी आम आदमी की व्याख्या से संभव है कि समाजवादी और वामपंथी विमर्श असहमत हो और सवाल खड़ा कर दे कि दिल्ली के ग्रेटर कैलाश और वसंत विहार में रहने वाला कैसे आम आदमी हो सकता है। वह यह भी सवाल खड़ा कर सकता है कि बंगलुरु, गुड़गांव और नोएडा की


बहुराष्ट्रीय कंपनियों में लाखों रुपए महीने की तनख्वाह पाने वाला प्रोफेशनल आम आदमी की परिभाषा में कैसे आ सकता है।

कहां एक तरफ झुग्गी में रहने वाला मजदूर और दूसरी तरफ खेतों में घाटा उठा कर काम करने वाला किसान और कहां लंबी गाड़ियों में चलने वाले लोग? निश्चित तौर पर उनकी आम आदमी की परिभाषा बेहद विडंबनापूर्ण लगती है अगर हम उसे शास्त्रीय किस्म की वर्गीय अवधारणा से देखें। लेकिन अगर हम उसे केजरीवाल की सादगी और ईमानदारी की कसौटी पर कस कर देखें तो वह जहां वर्गीय सहयोग की अवधारणा है वहीं वह वर्गांतरण (यानी डिक्लास) होने की अवधारणा भी है। आखिर जब कोई साधन-संपन्न और सत्ता-संपन्न व्यक्तिन लालबत्ती लगा कर चलेगा न ही सुरक्षा लेगा, न ही बड़े बंगले में रहेगा और भेदभाव से रहित होकर सबसे गरिमापूर्ण व्यवहार करेगा तो इससे एक प्रकार समतामूलक समाज की दिशा में देश बढ़ेगा ही। वही समतामूलक समाज की अवधारणा, जिसे सामाजिक न्याय के तमाम प्रयासों और लोककल्याणकारी योजनाओं के बावजूद भारतीय राजनीति ने धूल-धूसरित कर दिया है।

यह वही राजनीति है जो कभी लोहिया, तो कभी जेपी तो कभी चरण सिंह का दामन पकड़ कर और परिवारवाद और जातिवाद और पूंजीवाद के खिलाफ खड़ी होने का दावा करते हुए सत्ता में आई। लेकिन वह राजनीति जब सत्ता में आ गई तो एक तरफ सांप्रदायिकता का मुकाबला करने के लिए अतीक अहमद जैसे आपराधिक चरित्र के व्यक्ति को सांसद बनाने लगी, मुजफ्फरनगर में दंगा हो जाने देने के बाद भारी ठंड में लोगों को राहत शिविरों से भगाने लगी और दूसरी तरफ कभी सैफई तो कभी लखनऊ में जश्न मनाने लगी।

सवाल उठता है कि जब आप अपने समाज में कटुता फैलाने, किसी को दबाने-कुचलने और संसाधनों की लूट करने की राजनीति करेंगे ही नहीं तो आप को किससे सुरक्षा की जरूरत होगी। या, आप को किससे खतरा होगा? आप को क्यों चाहिए जेड प्लस और दूसरी तरह की सुरक्षा के कमांडो। आप को वीआइपी सुरक्षा के लिए क्यों दलाली खाकर खरीदे गए हेलिकॉप्टर चाहिए, अगर आप अपने देशवासियों से प्रेम करते हैं और उनके दिलों में आप ने नफरत के बजाय प्रेम और समता का भाव भरा है।

संभवत: वीआइपी सुरक्षा उसी को चाहिए जिसने कहीं दंगा कराकर समाज के किसी तबके को अपना शत्रु बना लिया है, कहीं संसाधनों को लूट कर आम जनता को कंगाल किया है या अपने प्रतिद्वंद्वी को लोकतांत्रिक तरीके से हराने के बजाय धनबल और बाहुबल से परास्त किया है।

इस मामले में हमें केजरीवाल के साहस की प्रशंसा करनी चाहिए कि उन्होंने अपनी सुरक्षा ईश्वर के हवाले छोड़ दी है। महात्मा गांधी की तरह दिखाया जाने वाला यह राजनीतिक साहस अपने आप में एक नए और श्रेष्ठ समाज की दिशा में उठाया जाने वाला एक बड़ा कदम है। विडंबना देखिए कि इस तरह का साहस न तो वह कांग्रेस पार्टी दिखा पा रही है जिसके सबसे बड़े नेता महात्मा गांधी थे और न ही वह भारतीय जनता पार्टी, जिसने राम का नाम लेकर पूरे देश में आग लगी दी लेकिन उसके किसी नेता ने कभी यह नहीं कहा कि हमें राम पर भरोसा है और कोई सुरक्षा नहीं चाहिए।

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की सुरक्षा को एक राष्ट्रीय विषय बनाने का कोई मौका भाजपा हाथ से जाने नहीं देना चाहती। वे भी अपने भयभीत व्यक्तित्व से न सिर्फ दूसरे क्षेत्रों की सुरक्षा को खतरे में डालते हैं बल्कि सुरक्षा का मजबूत घेरा खड़ा कर लंबे और तथ्यहीन भाषणों से अदम्य राजनीतिक साहस दिखाने की कोशिश करते हैं।

जातिवादी, भ्रष्ट और सांप्रदायिक राजनीति करने वाले दलों ने पिछले तीस सालों में वीआइपी सुरक्षा घेरों के लिए नए तरह का राजनीतिक और आर्थिक विमर्श सृजित किया है। उनका उपभोक्तावाद, उनकी तानाशाही, उनका आपराधिक चरित्र और उनका परिवारवाद इसी वीआइपी संस्कृति में सुरक्षित महसूस करता है और इसीलिए जब अरविंद केजरीवाल उसे खत्म करने की बात करते हैं तो न सिर्फ वे कांपने लगते हैं बल्कि उन्हें अराजकता का खतरा दिखाई पड़ता है। सचमुच इस भय और आडंबर से बाहर निकलने की जरूरत है और अगर इस दिशा में प्रयास को स्वराज का नाम दिया जा रहा है तो अनुचित नहीं है।

लेकिन दिल्ली में सरकार बनाने के बाद पूरे देश में अपनी बात मनवाना और अपने आदर्शों के अनुरूप इस तरह जीना कि देश उस पर चले, आसान नहीं है। यह काम सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार और लूट पर टिकी राजनीति के सवालों पर न तो बहुत बहस करने से बनेगा न ही चुप्पी साधने से। विकल्प का निर्माण वाणी और कर्म के समन्वय से करना होगा। आम आदमी पार्टी ने अभी भ्रष्ट, सांप्रदायिक और जातिवादी हो चुकी राजनीति के चक्रव्यूह का पहला द्वार तोड़ा है। उसे अभी कई द्वार तोड़ने हैं।

 

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