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लंगूर न्याय Print
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Tuesday, 09 September 2014 11:38

प्रमोद द्विवेदी

जनसत्ता 9 सितंबर, 2014: बड़े जतन और लंबी खोज के बाद वह मिला। बात पांच हजार रुपए पर तय हुई और करार हुआ कि रैंचो माह में पांच छुट्टियां करेगा। इमरजंसी पर बुलाया गया तो भुगतान अलग से। हम दो माह पुराने कपिपीड़ित नागरिक थे, इसलिए मौका जाने नहीं दिया क्योंकि जानकारी मिल चुकी थी कि रैंचो के और साथी दस से बीस हजार में जनता की सेवा कर रहे हैं। दूर-दूर तक। रैंचो के रोबीले श्याममुख और सुदीर्घ पूंछ की ओर कृतार्थ भाव से देखते हुए हमने सेवा-शर्तें मान लीं और तत्काल प्रभाव सेउसकी नियुक्ति हो गई। तय हुआ कि रैंचो सुबह नौ बजे सोसाइटी में दाखिल होगा। एक घंटे हमारी कॉलोनी के फेरे लगाएगा और नटखट वानरों को सजा देकर या बेदखल करके निकल जाएगा। बात-बात में रैंचो के मालिक कमल ने बताया कि रैंचो की संगिनी रजनी दूसरी कॉलोनी में तैनात है और अब उनका बच्चा भी पुश्तैनी सेवा के लिए तैयार हो रहा है। 

जैसी कि उम्मीद थी। पहले दिन रैंचो के प्रगट होते ही खल वानरदल खलबला गया। नीम और जामुन के पेड़ों की डालियों पर कोहराम मचा और कुछ बंदर तो बदहवासी में नीचे टपक पड़े। साबित हो गया कि एक अकेला सूरमा लंगूर विराट वानर-दस्ते का दलन कर सकता है। हमारे लंगूर रैंचो के विचरते ही कानून-व्यवस्था कायम हो गई। प्रचारित हो गया कि बंदरों के दिन लदने वाले हैं। बच्चे चैन से खेलेंगे और हमारे टोले में राज करेगा रैंचो। रैंचो बिना नागा किए कुछ दिन आया और लंगूर-न्याय की नजीर स्थापित कर दी। पर अचानक एक दिन उसका मालिक एकदम से गायब हो गया। कोई संवाद नहीं, मोबाइल भी बंद। सोसाइटी में अच्छे दिनों की आस लगाए लोगों में चिंता व्याप्त हुई कि रैंचो और उसका मालिक कहां चला गया। कई सूत्रों से पड़ताल हुई। पता लगा कि गाजियाबाद की एक सोसाइटी में अपने अभियान के दौरान मालिक चुटहिल हो गया है। रैंचो की सेवा फिलहाल मुल्तवी कर दी गई है। अब रैंचो नहीं है तो हम अस्थायी तौर पर अपने-अपने मानवीय साधनों से वानर-मुक्ति मुहिम में लगे हैं। लेकिन वाकई उसकी कमी खल रही है। 

बजाहिर, हमारे मेनकावादी शुभचिंतक या पशुपरस्त मित्र सवाल उठा सकते हैं कि वानरों को भगाने के लिए हमें दूसरीप्रजाति वाले वानर की जरूरत क्यों पड़ी? तो अपनी सफाई में बता दें कि कुछ माह पहले तक हमारा टोला बंदरों से एकदम मुक्त था। थोड़ा-बहुत आतंक आवारा कुत्तों का था। पर चूंकि कुत्ते काबू में करने लायक जंतु होते हैं, इसलिए कुछ जोर लगा कर, भोजन-जूठन से वंचित कर उन्हें विमुख किया गया। कुत्तों ने भी सोचा होगा कि उन गलियों में क्या विचरना, जहां इंसान


ने अपने सबसे पुराने कुदरती दोस्त को नागवार समझ लिया है। खैर, भूमिचर श्वानों को भगाना तो आसान था, पर छलांग और कलाबाजी से लैस जीवों से कैसे निपटा जाता।कभी आसपास के इलाकों में ललमुंहे बंदरों का उत्पात देख हम लोग खैर मनाते थे कि हमारी तरफ इन्होंने नजर नहीं डाली है। लगता है हमारी खुशफहमी को किसी की बुरी नजर लग गई और एक दिन सारा इलाका बंदरमय हो गया। 

हमारी आरडब्लूए के सामने शिकायतें आने लगीं कि बंदर ने एक बच्चे को नोच लिया, किसी महिला से सामान छीन कर भाग गया या किसी की दुलारी वाटिका उजाड़ दी। आखिरकार हमारी इंतजामिया इजलास में तय हुआ कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए वानराधिकारों पर हमला बोला जाए। हमें लंगूर की खोज के लिए निकलना पड़ा। गाजियाबाद के वसंधुरा, वैशाली से लेकर साहिबाबाद, झंडापुर तक दौड़ लगाई। 

इस अन्वेषण में पहली बार पता लगा कि लंगूर ने नए समाज में नई हैसियत प्राप्त कर ली है। हमारे पड़ोसी वकील साहब और बार एसोसिएशन के आला पदाधिकारी डीडी शर्मा ने बताया कि वे तो अपनी अदालत-परिसर के लिए बीस हजार में लंगूर-सेवा ले रहे हैं। दिल्ली के दफ्तरों में मुस्तकिल तौर पर नियुक्त लंगूरों के ठाठ भी पता चले। एक प्रोफेशनल लंगूर वाले ने बताया कि उसने बाकायदा स्टाफ रखा है और उसके लंगूर गाजियाबाद, नोएडा से लेकर दिल्ली तकसेवा दे रहे हैं। उनकी खुराक का खास खयाल रखा जाता है। 

बहरवक्त इतने शाही लंगूर हमारे बस के नहीं थे। इसलिए हमारी खोज आगे बढ़ी और अंत में रैंचो पर टिकी। रैंचो सस्ता और टिकाऊ लगा। पर हाय री हमारी किस्मत! रैंचो चंद दिन ही सेवा दे पाया औरमालिक बिस्तर पर है। रोज मेरे पास फोन आते हैं- भाई साहब, रैंचो कब आएगा, बंदर आ रहे हैं। हमारा एक ही जवाब है: रैंचो नहीं तो कोई और आएगा। पर जल्दी आएगा और बंदरों से मुिक्त दिलाएगा। जय कपीश, जय लंगूर!


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