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जम्मू-कश्मीर: आपदा के दौर में कहां बिला गए ‘आजादी’ के झंडाबरदार Print
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Friday, 12 September 2014 09:05



 के. विक्रम राव

कश्मीर के बाढ़ राहत काम में अलगाववादी नेताओं के नदारद रहने पर चर्चा गरम है। कुदरती कहर के वक्त मददगार खुद-ब-खुद उमड़ पड़ते हैं। दावतनामे की प्रतीक्षा नहीं करते। मसला है कि मानवाधिकारों के इन जुझारुओं को अपने हमवतनों के जीवन के अधिकार की फिक्र दिखाई नहीं देती। जब कुछ पत्रकारों ने जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के अगुवा मोहम्मद यासीन मलिक का ठौर जानना चाहा तो उनके एक अलमबरदार ने बताया कि उन्हें राहत काम का अनुभव नहीं है, क्योंकि पिछली बाढ़ 1964 में आई थी। तब मलिक सिर्फ एक वर्ष के थे।

 डल झील के शिकारा मालिक मोहम्मद शाहिद खां ने बताया कि वह दिल्ली में मलिक से नौ सितंबर को मिला था। तब श्रीनगर डूब चुका था। फिर भी विख्यात फिल्मकार अशोक पंडित तो मलिक को खोज रहे थे ताकि राहत सामग्री वादी में बांटी जा सके। बाकी धुरंधर नेताओं की भी तलाश जनता कर कर रही थी। आम तौर पर श्रीनगर की सड़कों पर प्रदर्शन करने वाले मीर वाइज उमर फारूक, सैय्यद अहमद गिलानी और उनके चेले अब कहीं नजर नहीं आए। उन्हें कश्मीर बंद का एलान नहीं करना पड़ा क्योंकि सैलाब ने ही उनका काम कर दिया था। घाटी बंद कर दी थी।

कश्मीर का राजनैतिक नेतृत्व, विशेषकर मुख्यमंत्री और उनकी काबीना के सदस्य जरूर गुनहगार माने जाएंगे क्योंकि पिछले पांच दशकों से आपदा प्रबंधन की कोई भी योजना बनाई ही नहीं गई। हालांकि भारतीय करदाताओं और जनता का खरबों रुपया कश्मीर पर खर्च होता रहा। राजीव गांधी की बात भारतीय प्रदेशों पर लागू थी कि केंद्रीय सहायता के एक रुपए में केवल पंद्रह पैसा ही खर्च होता है। मगर कश्मीर की बाबत अनुमान है कि वहां पंद्रह पैसों से भी कम ही व्यय किया जाता रहा। केवल राज्यपाल जगमोहन के दौर को छोड़कर। इस वक्त आमजन का कल्याण इतना हुआ था कि एक कहावत चल निकली थी- चुनाव में तीन डब्बे रखे जाएं, कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और राज्यपाल के नाम तो जगमोहन की जीत बंपर वोटों से होगी।

इन्हीं जगमोहन की बढ़ती लोकप्रियता से आतंकित होकर बेनजीर भुट्टो ने कहा था कि पाकिस्तानी सेना इस राज्यपाल को ‘भागमोहन’ बनाकर घाटी के उस पार फेंक देगी। यह बात सिद्ध भी हो जाती है, अगर रजौरी की बाढ़ की स्थिति पर नजर डालें। वहां झमीरा नाला है जो सूखा पड़ा रहता है। उसकी सफाई, खुदाई या विस्तृतीकरण कई वर्षों से नहीं हुआ। मगर बजट में खर्चा जरूर दिखाया जाता रहा। जब बीते दिनों एक पूरी बस उसमें गिर गई और 64 सवारियां मर गई तो प्रशासन जगा। इस सिख बहुल क्षेत्र की उमर अब्दुल्ला सरकार निरंतर उपेक्षा करती रही है। 

नियंत्रण रेखा से सटे इस राजौरी क्षेत्र में कश्मीर के भारत में विलय (1947) से अब तक विकास का दीदार ही नहीं हुआ। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला और उनके उत्तराधिकारी बख्शी गुलाम मोहम्मद ने केंद्रीय बजट से मिली राशि का ब्योरा खुद तक सीमित रखा। वामपंथी गुलाम मोहम्मद सादिक के राज में जरूर कुछ जनहितकारी योजनाएं बनीं। पर अधिकतर राशि प्रशासकीय चलनी से ही चूती रही, लुटती रही।

कश्मीर में आज की प्राकृतिक आपदा को पृथक पहलू मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। एक समग्र दृष्टि हो। मसलन राज्य का प्रशासन तंत्र, उसकी क्षमता, फुर्ती और पारदर्शिता। ओस और हिमपात से ही जहां की धरती खुद सिंच जाती हो,


वहां अलग से सिंचाई व्यवस्था पर ध्यान कम ही दिया गया। सिंचाई एक अभिन्न पहलू है बाढ़ नियंत्रण योजना का। आज समूची घाटी की त्रासदी की समीक्षा इसी मुद्दे पर होनी चाहिए। कश्मीर की खेती और सिंचाई पर निर्धारित बजट राशि चंद इने-गिने ठेकेदारों, राजनेताओं और उनके चंपुओं की जेब में ही जाती रही। नतीजतन, बाढ़ की आशंका से सभी अपरिचित रहे।

 बीते पांच दशकों का अनुभव यही रहा। केंद्रीय लेखाजोखा नियामक (सीएजी) की कड़ाई कश्मीर पर लागू नहीं होती। यहां का मुख्यमंत्री खाड़ी देशों के शेखों से कम वैभवशाली नहीं रहता। सरकारी भ्रष्टाचार पाकिस्तानी आतंक और अलगावाद के लिए इस भूमि को उर्वरा बनाता रहा है, वरना श्रीनगर सरीखी मशहूर राजधानी का सैलाब में ऐसा हश्र न होता।

 एक घटना का जिक्र यहां जरूरी है। जेल से रिहा होकर, चुनाव जीतकर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने 1977 में कहा कि जम्मू-कश्मीर के इतिहास में पहली बार निष्पक्ष और सच्चा मतदान हुआ है। इसकी पृष्ठभूमि थी। तब जनता पार्टी के प्रधानमंत्री और निपुण प्रशासक मोरारजी देसाई से कश्मीर के सरकारी अधिकारी मिलने गए। उनसे पूछा कि विधानसभा निर्वाचन के वास्ते कोई विशेष आदेश, यानी क्या जनता पार्टी के पक्ष में मतदान कराया जाए? प्रधानमंत्री ने इन अधिकारियों को डांटा और कहा-चुनाव सही हों।

 परिणामस्वरूप दिल्ली में सत्तारूढ़ जनता पार्टी कश्मीर में चुनाव हार गई। शेख अब्दुल्ला सलाखों से बाहर आकर सत्ता पर सवार हो गए। मगर केंद्र सरकार राज्य प्रशासन को ईमानदार नहीं बना पाई। अत: स्वच्छ तंत्र के अभाव में विकास हाशिए पर रहा। बाढ़ के रोकथाम की कोई भी योजना 1963 से नहीं बनी।

त्रासदी के इस पूरे प्रकरण में भारतीय सेना की भूमिका की चर्चा आवश्यक है। कश्मीरी आवाम के दिमाग को अलगाववादियों ने दूषित कर दिया था कि घाटी को भारतीय सेना जबरन कब्जियाए हुए है। शोषक है। अलगाववादियों और आतंकियों का ही प्रभाव है कि भारतीय जवानों को ‘वापस जाओ’ और ‘कश्मीर छोड़ो’  के नारों को सुनना पड़ता रहा।  मगर बाढ़ ने पूरा परिदृश्य ही बदल डाला। आज इन हरी और खाकी वर्दीधारियों को फरिश्ता कहा जा रहा है। जिस प्राणपण से इन सैनिकों ने खुद को खतरे में डालकर कश्मीरी बच्चों, बूढ़ों, औरतों को सैलाब से बाहर निकाला है और सुरक्षित स्थानों पर लाए  हैं, वह बेमिसाल है। अलगाववादी इन सैनिकों को बलात्कारी और लुटेरे कहते थे। आज कोहरा मिट रहा है। खुद खिचड़ी खाकर इन पीड़ितों को खाना दिया है इन जवानों ने। फौज के एक आला अफसर ने कहा है : ‘आखिरी व्यक्ति को निकाले बिना भारतीय सेना बैरक में नहीं लौटेगी।’ इतने पर भी एक ने कहा कि महिला अस्पताल में 58 गर्भवती स्त्रियों को दो दिन पानी नही मिला। तो सवाल पूछना होगा कि यह सब जानते हुए भी उन ‘आजाद कश्मीर’ के मुजाहिदों ने बिसलेरी बोतल खरीद कर इन स्त्रियों को क्यों नहीं पहुंचाईं? उसे देने से क्या भारतीय जवानों ने रोका था? इस जलप्रलय के बाद सौमनस्य बनाना था। पर पाकिस्तान समर्थक, मजहब के नाम पर अंधे बने जेहादी पहले तो गायब रहे, अब पानी घटते ही प्रगट हो गए। पर मानव त्रासदी के इन तिजारतियों को औसत कश्मीरी गांव जान गया है। पहचान गया है। जवाब दे रहा है।

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