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सुंदरता का दुख

सुंदरता का दुख

सय्यद मुबीन ज़ेहरा
जनसत्ता 9 जून, 2013: गर्मिए-हसरते नाकाम से डर जाते हैं/ हम चिरागों की तरह शाम से जल जाते हैं/ शम्मा

 
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