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रविवारीय कॉलम

दिशाहीन बदलाव

श्रीभगवान सिंह
जनसत्ता 30 जून, 2013: जमाना बदलाव का है। हरेक की जबान से ‘बदलाव’ ऊंची उड़ान, तेज रफ्तार आदि के रूप में

 

रिश्तों का ताना-बाना

जनसत्ता 30 जून, 2013: वरिष्ठ कथाकार नासिरा शर्मा का उपन्यास अजनबी जज़ीरा उनके अन्य उपन्यासों की तुलना में सुसंबद्ध, सघन,

 

अनकही रही बातें

जनसत्ता 30 जून, 2013: यहां अकथ वह है, जो कहने से स्थगित होता रहा, कि कह देंगे फिर कभी। हालांकि यह अकथ कभी अकथनीय नहीं रहा! यों भी

 

आपदा और पर्यावरण रक्षक

तवलीन सिंह
जनसत्ता 30 जून, 2013: उत्तराखंड में लोगों को बचाने का काम अभी पूरा नहीं हुआ है लेकिन अभी से सामने आने लग गए

 
कुदरत कुपित क्यों

कुदरत कुपित क्यों

सय्यद मुबीन ज़ेहरा
जनसत्ता 23 जून, 2013: अपने घर में पंखे की ठंडी हवा के बीच आरओ का पानी पीते हुए टीवी पर प्राकृतिक

 

मूल्यांकन या फतवा

रवींद्र त्रिपाठी
जनसत्ता 23 जून, 2013: विष्णु खरे का लेख ‘रवींद्र नोबेल शती को यों मनाने के जोखिम’ (16 जून) अमर्यादित,

 

सौ साल पुरानी आग पर

उज्ज्वल भट्टाचार्य
जनसत्ता 23 जून, 2013: विष्णु खरे ने (जनसत्ता, 16 जून) नोबेल शती के आयोजन के अलावा रवींद्र मूल्यांकन

 

संकट की घड़ी में

तरुण विजय
जनसत्ता 23 जून, 2013: जब संकट आता है तो पैसा और शब्द दोनों बहते हैं। पैसा त्राण पाने के लिए और शब्द संकट

 
कभी-कभार

कभी-कभार

अशोक वाजपेयी
ऊब का एक दर्शन
जनसत्ता 23 जून, 2013: सब लोग देर-सबेर कभी-कभार ऊबते हैं: अपने आसपास से, अपने

 

महाभारत के मोती

जनसत्ता 23 जून, 2013: महाभारत एक क्लासिक रचना है। उसमें से अनेक कथाएं जन्म लेती हैं जो अपने समय, अपनी नियति, अपने मनोराग और

 

भाषा की ऊर्जा

लक्ष्मीधर मालवीय
जनसत्ता 23 जून, 2013: संस्कृत में एक सूक्ति है, ‘अतृणे पतितो वह्नि: स्वयमेवोपशाम्यति’- कंकड़-पत्थर

 
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