मुखपृष्ठ रविवारीय स्तम्भ
रविवारीय कॉलम

मतांतर: परिधान और मर्दवादी नजरिया

उज्ज्वल भट्टाचार्य

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक बांग्ला समाचार-पत्रों को अगर

 

भाषा: चटकीले जुमलों की जादूगरी

प्रभु जोशी

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: यह बात इस समय खासतौर पर ध्यान देने योग्य है कि जब जवाहरलाल नेहरू या सरदार पटेल देश

 
कभी-कभार: ‘उस शिखर-कगार पर...’

कभी-कभार: ‘उस शिखर-कगार पर...’

अशोक वाजपेयी

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: गजानन माधव मुक्तिबोध आधुनिक हिंदी साहित्य के सबसे अनोखे आश्चर्य

 

पुस्तकायन: स्त्री की उलझनें

अजितकुमार

जनसत्ता 7 सितंबर, 2014: प्रचंड स्त्री-विमर्श के इस युग में जहां ‘स्त्री-सुबोधिनी’ की मानसिकता को नकारने

 

पुस्तकायन: जीवन के विरोधाभास

शुचि पाण्डेय

जनसत्ता 7 सितंबर, 2014: हृदयेश के उपन्यास शब्द भी हत्या करते हैं में एक संवेदनशील मनुष्य, जो रचनाकार भी

 
स्मरण: अनंतमूर्ति का जाना

स्मरण: अनंतमूर्ति का जाना

कृष्णनाथ

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: अनंतमूर्ति से मेरा साथ प्राय: पचास वर्षों से

 
दक्षिणावर्त: न दरिया रुका न पर्वत झुके

दक्षिणावर्त: न दरिया रुका न पर्वत झुके

तरुण विजय

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: गुरु गोविंद सिंहजी भारतीय इतिहास के ऐसे महान राष्ट्रीय नायक हैं, जिनका जीवन चरित

 
समांतर संसार: बहादुर बनाम मर्दानी

समांतर संसार: बहादुर बनाम मर्दानी

सय्यद मुबीन ज़ेहरा

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: पिछले दिनों दिल्ली की एक महिला पत्रकार से चर्चा में यह बात उठी

 

प्रसंग: निश्शब्द लोकतंत्र में

शंभुनाथ

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: महाभारत युद्ध में विजय के बाद पांडवों ने शत्रु शिविर के टूटे रथ, शव और घायल लोग देखे।

 

कभी-कभार: सघन चिंतन निर्मल गद्य

अशोक वाजपेयी 

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: हिंदी में, दुर्भाग्य से, चिंतन कम ही होता है, उसे उससे भी कम

 

पुस्तकायन: आपबीती जगबीती

रमेश प्रजापति

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: रामकुमार कृषक की किताब दास्ताने-दिले-नादां एक ऐसा वृत्तचित्र है, जो देश के

 
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