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रविवारीय कॉलम
 दक्षिणावर्त: जन मन का धन

तरुण विजय

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: येसे दरजे थोंगशी अरुणाचल प्रदेश के लेखक हैं। वहां की मूल संस्कृति, सामाजिक चेतना और प्रकृति उपासना में रत लाखों अरुणाचलवासियों को बचाने

 
समांतर संसार: खुद को मारता समाज

समांतर संसार: खुद को मारता समाज

सय्यद मुबीन ज़ेहरा

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: भारत को आत्महत्या की राजधानी का खिताब मिला है। यह हमारे लिए गर्व की नहीं, शर्म की बात है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार

 

संवाद: भाषा की जमीन

लक्ष्मीधर मालवीय

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: कुलदीप कुमार के स्तंभ में ‘हिंदी बनाम उर्दू’ (7 सितंबर) पढ़ने तक मुझे यह जानकारी न थी कि सन् 74 में जेएनयू में हिंदी उर्दू विद्यार्थियों के लिए ये दोनों भाषाएं

 

संवाद: भाषा विवाद और राजनीति

गणपत तेली

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: कुलदीप कुमार ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार के उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा बनाए जाने के फैसले को वैध करार देने पर ‘हिंदी बनाम उर्दू’ शीर्षक से (7

 

प्रसंग: क्रांति के कपड़े

अर्चना वर्मा

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला-2007 के समय ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें अठारह दिसंबर, दो हजार पांच के

 
कभी-कभार: अजमेर साहित्य समारोह

कभी-कभार: अजमेर साहित्य समारोह

अशोक वाजपेयी

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: अजमेर को शिक्षा, धर्म, पुरातत्त्व आदि से जोड़ा जाता रहा है। पर उसे एक साहित्य केंद्र के रूप में पहले जाना-समझा न था। दो-एक बार वहां कुछ लेखक बंधुओं के आग्रह पर गया

 

पुस्तकायन: वैश्विक चिंता का वितान

ओम निश्चल

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: कविताओं में प्राय: प्रेम की पुलकित वसुंधरा का आख्यान रचने वाली पुष्पिता अवस्थी हिंदी की सुपरिचित कवयित्री हैं। उन्होंने प्रवास में रहते हुए भी भारतीय मन की संवेदना और वैश्विक

 

पुस्तकायन: आलोचना में अनुसंधान

अनंत विजय पालीवाल

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: आज की बाजारीकृत व्यवस्था में नएपन के नाम पर मनगढ़ंत लिखने की मानो होड़-सी लगी है। सर्वेक्षण और साक्ष्यों के जरिए साहित्य को समृद्ध करने वाली पुस्तकें कम ही

 
निनाद: हिंदी बनाम उर्दू

निनाद: हिंदी बनाम उर्दू

कुलदीप कुमार

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ का फैसला आ गया है कि उत्तर प्रदेश सरकारी भाषा (संशोधन) कानून 1989 संविधानसम्मत है और राज्य में उर्दू को सरकारी कामकाज

 
अप्रासंगिक: सोचने की जिम्मेदारी

अप्रासंगिक: सोचने की जिम्मेदारी

अपूर्वानंद

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: ‘‘यह एक दिलचस्प संयोग है कि स्थापित व्यवस्था के प्राय: सभी पक्षों में सोचने का फिजूलपन एक तरह से मूल प्रतिज्ञा है। जातिप्रथा, नौकरशाही,

 

प्रसंग: काजर की कोठरी में धवल सयाने

सुधीर चंद्र

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: हम अपनी कहानी कैसे कहते हैं वह हमारे बारे में बहुत कुछ बता देता है। उससे बहुत ज्यादा जो हम समझते हैं हम बता रहे हैं, और उससे बहुत अलग भी जो हम बताना चाह रहे हैं। बड़ा जोखिम का काम

 
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