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नीरो के मेहमान

कृति श्री

जनसत्ता 24 जुलाई, 2014 : ‘रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था।’ इतना शायद हम सब जानते हैं।

 

अविश्वास की आंखें

मनोज कुमार

जनसत्ता 23 जुलाई, 2014 : अपने मित्र से

 

मशीनी मानव

विकेश कुमार बडोला

जनसत्ता 22 जुलाई, 2014 : पारंपरिक तरीके से विचलित दुनिया में आधुनिक सुविधाएं और सुरक्षा बहुत बड़ी

 

सभ्यता के विद्रूप

पवन रेखा

जनसत्ता 21 जुलाई, 2014 : यौन हिंसा के सबसे ज्यादा जघन्य और घृणित रूप सामूहिक बलात्कार की एक और घटना ने एक बार फिर मेरे अंतस

 

मनीऑर्डर का इंतजार

अविनाश कुमार चंचल

जनसत्ता 19 जुलाई, 2014 : लगता है, इस हफ्ते भी घर पर पैसे नहीं भेजा पाऊंगा। दो दिन बचे हैं और काम

 

भाषा से आगे

कुमारेंद्र सिंह सेंगर

जनसत्ता 18 जुलाई, 2014 : संघ लोक सेवा आयोग की सिविल

 

धरती की सीमा

रामप्रकाश कुशवाहा

जनसत्ता 17 जुलाई, 2014 : देखा जाए तो एक सियार का काम एक मांद से चल सकता है। लेकिन आदमी को रहने की

 

संबंधों का संघर्ष

मोनिका शर्मा

जनसत्ता 16 जुलाई, 2014 :

 

हिंसा का दुश्चक्र

शिव दास

जनसत्ता 15 जुलाई, 2014 : पिछले दिनों

 

दमन का पाठ

नीलिमा चौहान

जनसत्ता 14 जुलाई, 2014 : यह सारा मामला ‘ग्रैंड-डिजाइन’ का है! चाहे हमारे विश्वविद्यालयों

 

चिराग तले

निवेदिता

जनसत्ता 12 जुलाई, 2014 : 

 
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