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खिड़की में फाख्ता

कविता रावत 
जनसत्ता 4 जुलाई, 2013: कभी जब घर-आंगन, खेत-खलिहान, धूल भरी राहों और जंगल की पगडंडियों में भोली-भाली शांत

 

बचपन का पर्यावरण

अविनाश वाचस्पति
जनसत्ता 10 जून, 2013: बालमन के पर्यावरण की निश्छलता देश-काल की सीमाओं से बाहर अपने अक्षितिजीय

 

वाह बीकाणा वाह

राहुल गौर
जनसत्ता 8 जून, 2013: बीकानेर उत्तर-पश्चिमी राजस्थान में एक छोटा-सा शहर है, ऊंघता हुआ-सा। कीकर के पेड़ों,

 

लहरों के संग

गौतम राजरिशी 
जनसत्ता 7 जून, 2013:  अपनी ही लिखी कविताओं के मोह में उलझे महाकवियों के वर्तमान दौर में कायम उनके

 

गांव में वे दिन

अरविंद दास
जनसत्ता 5 जून, 2013: तब हम बच्चे थे। मां के पेट पर चिपके रहते। गर्मियों में बाहर जाने से रोकते हुए मां हमें

 

बहादुरी का सच

कृति श्री
जनसत्ता 4 जून, 2013: विगत दिनों पूरी दुनिया के मीडिया में एक जबर्दस्त हल्ला सुनने को मिला कि हॉलीवुड

 

सुविधा की चुप्पी

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
जनसत्ता 3 जून, 2013: आर्थिक अराजकता, राजनीति और सेक्स के अद्भुत कॉकटेल में सराबोर और

 

मुक्ति की राह

कविता विकास
जनसत्ता 1 जून, 2013: कल्पना कीजिए कि पिंजरे में बंद पक्षी पंख फड़फड़ा कर अपनी वेदना जाहिर करते-करते या तो

 

हिंसा का दुश्चक्र

अकबर महफ़ूज आलम रिज़वी
जनसत्ता 31 मई, 2013: हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसमें कुछ भी असंदिग्ध नहीं है। यह आम धारणा है कि

 

कलम की विनम्रता

मनोज कुमार
जनसत्ता 30 मई, 2013: तीस मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं। यह दिवस बेहद अर्थवान है, खासकर पत्रकारिता

 

न आए ऐसी बारात

वर्षा
जनसत्ता 29 मई, 2013: सचमुच हमारी दुनिया तेजी से बदल रही है। हमारी दुनिया, मतलब हम लड़कियों की दुनिया।

 
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