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दुनिया मेरे आगे

अकाट्य तर्क

अरुणेंद्र नाथ वर्मा

जनसत्ता 3 जून, 2014 : उनके दफ्तर से मेट्रो स्टेशन दूर नहीं था। सुबह तो वे मेट्रो

 

भाईचारे का भरोसा

जगमोहन सिंह राजपूत

जनसत्ता 2 जून, 2014 : कुछ समय पहले एक दिन प्रोफेसर

 

झूठ से शुरुआत

राजकिशोर

जनसत्ता 30 मई, 2014 : ईश्वर से मेरा झगड़ा तब से है जब मैंने हायर सेकेंडरी की परीक्षा पास कर ली थी।

 

एक तुम ही नहीं

विष्णु नागर

जनसत्ता 27 मई, 2014 : मुझे माफ कीजिएगा, हल्की-सी आत्मप्रशंसा के साथ शुरू कर रहा हूं! तब मैं

 

जनतंत्र के सामने

अंजुम शर्मा

जनसत्ता 26 मई, 2014 : रात करीब नौ बजे खाने के बाद अमूमन रोज पार्क में टहलने निकलता हूं। चुनाव

 

गांधी का अंतिम आदमी

केसी त्यागी

जनसत्ता 23 मई, 2014 : सन 2002 में जब बिहार के चंपारण जिले में मुसहर जाति के बाईस लोग भूख से मर गए,

 

सुविधा के सवाल

सर्वप्रिया सांगवान

जनसत्ता 31 मई, 2014 : कई लोगों के लिए यह हैरानी

 

और हमारी चाय

वर्षा

जनसत्ता 29 मई, 2014 : चाय के अड्डे, चाय पीने वालों के साथ-साथ खबरचियों, कवियों, लेखकों, राजनीतिकों

 

कवियों की बाढ़

प्रेमपाल शर्मा

जनसत्ता 28 मई, 2014 : हिंदी पढ़ने-लिखने वालों के बीच एक चालू जुमला

 

स्वार्थ के सोपान

आशुतोष गर्ग

जनसत्ता 24 मई, 2014 : कुछ

 

तो हारा कौन

विनोद कुमार

जनसत्ता 22 मई, 2014 : चुनाव परिणाम आने के बाद से एक वाक्य मुझे परेशान किए हुए है- ‘इंडिया विन्स,’ यानी

 
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सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?