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दुनिया मेरे आगे

भटकाव का खेल

संदीप जोशी

जनसत्ता 19 अगस्त, 2014 : जिस देश में कुल सात सौ तिरानवे सांसद हों, मगर मीडिया और सत्ता पक्ष केवल दो मनोनीत

 

उम्मीद की फसल

निवेदिता

जनसत्ता 18 अगस्त, 2014 : किसान खेत, जंगल और नदी के साथ जीते हैं। शहरी जीवन में खेतों, नदियों,

 

सपने के सामने

सुमेर चंद

जनसत्ता 15 अगस्त, 2014 : अपने स्कूल के दिनों में मैंने भी सीना तान कर

 

एक हादसा कर्ई सवाल

पूर्णिमा अरुण

जनसत्ता 13 अगस्त, 2014 : 

 

बाजार में संवेदना

दीपक मशाल

जनसत्ता 11 अगस्त, 2014 : अवसर का लाभ उठाना हमेशा से सफल व्यक्तियों के जीवन का मंत्र रहा है और अवसर के अकाल के

 

स्मृतियों में प्राण

प्रदीप कुमार

जनसत्ता 8 अगस्त, 2014 : हम जैसों का वास्ता दो ही प्राण से पड़ा। एक तो बेहद डराने वाले बॉलीवुड के कलाकार

 

पहचान की परतें

प्रेमपाल शर्मा

जनसत्ता 16 अगस्त, 2014 : मेघनाथ साहा का नाम देश के महान

 

विज्ञापन का जादू

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

जनसत्ता 14 अगस्त, 2014 : विज्ञापनों की अपनी दुनिया है। वह दुनिया सृजनात्मक, कल्पनाशील,

 

हमारे हिस्से का कोना

रूबल

जनसत्ता 12 अगस्त, 2014 : पिछले दिनों मित्रों के साथ दिल्ली मेट्रो में सफर करते हुए एक ऐसे अनुभव से रूबरू होना

 

अध्यात्म और तानाशाही

संदीप जोशी

जनसत्ता 9 अगस्त, 2014 : शुरुआती शिक्षा का लेना-देना तानाशाह रवैए से कैसे हो सकता है? और आध्यात्मिक शिक्षा

 

आधे अधूरे

राजेंद्र उपाध्याय

जनसत्ता 7 अगस्त, 2014 : अपने किशोर दिनों में मैंने कई फिल्में आधी देख कर छोड़ दी हैं। कई बार देर से

 
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सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?