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दुनिया मेरे आगे

शहर और सपना

विनोद कुमार

जनसत्ता 3 सितंबर, 2014: आपातकाल की घोषणा के बाद मैं पहली बार दिल्ली गया था। उस दौरान एक

 

संयम और क्षमा

शुभू पटवा

जनसत्ता 2 सितंबर, 2014: सदा ही इनकी आवश्यकता रही है और आज तो ये अपरिहार्य हैं। लेकिन हम इन्हीं

 

कोलाबा

प्रयाग शुक्ल

जनसत्ता 29 अगस्त, 2014 : मेरे झोले की एक चेन खराब हो गई है। चेन या जिप, जो भी कहिए, उसके बाहरी हिस्से में जो

 

संवेदना का परदा

नीकी नैनसी

जनसत्ता 27 अगस्त, 2014 : जब अपने अनुभव आपको किसी प्रगतिशील विचारधारा का ढिंढोरा पीटने वालों के बारे में

 

वे उनचास दिन

अजेय कुमार

जनसत्ता 25 अगस्त, 2014 : दिल्ली के चांदनी चौक में अक्सर बहुत भीड़ होती है। वहां जाने के लिए आमतौर पर ऑटो

 

भाव अभाव

संजीव चंदन

जनसत्ता 21 अगस्त, 2014 : उन्नीसवीं सदी में बंगाली भद्रलोक ने अपनी महिलाओं के ‘भदेस महिलाओं’, यानी

 

जल जतन

श्रीभगवान सिंह

जनसत्ता 1 सितंबर, 2014: इस साल गरमी की छुट्टियों में अपने गांव गया तो सबसे सुखद अनुभव

 

स्क्रीन से बाहर

संज्ञा उपाध्याय

जनसत्ता 28 अगस्त, 2014 : उसका पूरा ध्यान मोबाइल में था। आसपास से एकदम बेखबर। आंखें भावहीन, पथराई-सी।

 

सस्ती चीज नहीं मांगता

विष्णु नागर

जनसत्ता 26 अगस्त, 2014 : यों इसकी चर्चा पहले से ही है, मगर हाल ही में टाटा मोटर्स के एक वरिष्ठ अधिकारी

 

जोखिम में बचपन

लक्ष्मीकांता चावला

जनसत्ता 22 अगस्त, 2014 : हमारे देश के सभी प्रांतों की सरकारें बच्चों के भविष्य, उनके पोषण और

 

पड़ोस में चाबी

पल्लव

जनसत्ता 20 अगस्त, 2014 : हमारी सोसायटी के कुछ पड़ोसी धीरे-धीरे हम पर भरोसा करने लगे हैं और उनके घरों की चाबियां

 
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सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?