रविवारीय स्तम्भ


दक्षिणावर्त: जन मन का धन PDF Print E-mail
Monday, 15 September 2014 17:39

तरुण विजय

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: येसे दरजे थोंगशी अरुणाचल प्रदेश के लेखक हैं। वहां की मूल संस्कृति, सामाजिक चेतना और प्रकृति उपासना में रत लाखों अरुणाचलवासियों को बचाने के लिए दिल्ली में मंत्रियों से मिलने का समय मांगते रहे। उनके साथ अरुणाचल की मूल आस्था और संस्कृति समिति के वरिष्ठ नेता गिचिक ताझा भी थे। थोंगशी अरुणाचल प्रदेश में वरिष्ठ अधिकारी और सचिव भी रह चुके हैं। कई उपन्यास लिखे हैं, जिनमें से दो का अनुवाद वाणी प्रकाशन ने छापा है, यह आश्चर्य की बात है। अरुणाचल हो या पूर्वांचल के किसी भी हिस्से का व्यक्ति। वह पढ़ा-लिखा होगा यह माना जा सकता है, लेकिन उसकी किसी कृति का हिंदी में प्रकाशन, असमिया या बांग्ला के अलावा, कम ही देखा-सुना जाता है। 

थोंगशी का एक उपन्यास है सोनम, जो हिंदी में छपा और दूसरा है शव काटने वाला आदमी। बड़ा भयानक शीर्षक है। मंत्रियों से बड़ी मुश्किल से भेंट के बाद अपनी ये दोनों पुस्तकें देने घर आए, तो मैंने यही पूछा कि इतना कठोर शीर्षक क्यों रखा? बोले 1962 के समय की कथा है, आसान कैसे हो सकता था। 

अरुणाचल में अब कुछ भी आसान नहीं है। उनका धर्म, आस्था, संस्कृति, परंपरा, लोक इतिहास और कथाएं ईसाइयत के तीव्र प्रवाह में दब रही है, बदल रही है, जमीन गांव और मानस से पुस्तकों में बंद हो रही हैं। कोई उनकी सुनेगा नहीं। पार्टी कोई भी हो- हम सब अपने-अपने विनाश और लुप्त होते जाने के वृत्तांत लिखने में सिद्धहस्त हो गए हैं। अगर इन परंपराओं की मूल सुगंध बचाने के लिए कुछ कहा जाए तो आक्रामक उदारवादी कहते हैं कि हिंदूकरण किया जा रहा है। हिंदुस्तान में हिंदूकरण से बढ़ कर अपराध और कुछ हो नहीं सकता। हम लोग मिमिया कर या अर्थहीन मोहल्ला स्तर की बहादुरी दिखा कर रजाई ओढ़ लेते हैं। फिर एक किताब छाप देंगे, जो पुस्तकालयों को कमीशन देकर बेच दी जाएगी, पढ़ने-पढ़ाने के काम शायद कम ही आएगी। सेक्युलर उदारवाद और अनुशासित बहुलतावाद का संवैधानिक सहमति जताते हुए पक्ष सिर्फ एक ही है कि जनजातियों में डच, जर्मन, स्वीडिश, ब्रिटिश और खासतौर पर अमेरिकी वैप्टिस्टों का अपार धन निर्बाध आता रहे। 

अब अरुणाचल के अनेक पूर्व मुख्यमंत्री (एक भी भाजपा से नहीं), लेखक वरिष्ठ अधिकारी दिल्ली से एक ही बात पूछते हैं कि क्या उन्हें अपनी आस्था और उपासना-पद्धति बचाने का अधिकार है? उनके यहां डोनी पोलो संप्रदाय, रंगफ्रा, नानीइंटा पंथ, अमिकमाटा पंथ जैसे सैकड़ों मत हैं। आपस में कभी द्वंद्व हुआ, न झगड़ा। दिल्ली या उत्तर भारत कभी इस बात में दिलचस्पी ही नहीं लेते रहे कि इनके मंदिर, उपासना घर या नामघर कैसे होते हैं, इनका देवपूजन कैसे संपन्न होता है, इनकी आस्था के आधार और उपासना संसार क्या है। कभी उनको आदर और सम्मान के साथ लिपिबद्ध कर श्रद्धा और विश्वास बचाते हुए किसी को बताने-पढ़ाने या समझाने की जरूरत महसूस नहीं की गई। 

संभवत: देश की राजनीति में पैसे का सबसे ज्यादा विद्रूप और वीभत्स चलन अगर कहीं है तो पूर्वांचल के इन्हीं राज्यों में देखने को मिलता है। इसके प्रति भी कभी चिंता व्यक्त नहीं की गई। मान लिया जाता है कि ये तो बस ऐसे हैं। चुनाव जीतने के लिए गांव के हर नौजवान को हीरो होंडा की मोटर बाइक और बड़े लोगों को मारुति जिप्सी या होंडा तक बांटना, चुनाव से पहले के दिनों में पूर्वोत्तर के कार विक्रेताओं की बिक्री के आश्चर्यजनक आंकड़ों से समझा जा सकता है। 

तेजू, पापूमपारें, तवांग, वॉलोंग, चुमाथांग जैसे इलाकों से डिब्रूगढ़, गुवाहाटी होते हुए दिल्ली आने का अर्थ यहां मंत्रालय में बैठे अफसर, मंत्री उनके सहायक या सड़कों पर चल रहे वे लोग, जिनसे कभी-कभी अरुणाचल जैसे इलाकों से आने वाले रास्ता पूछ लेते हैं, समझ पाते हैं, यह कहना कठिन है। अरुणाचल के हर गांव में हिंदी बोली जाती है। सब जगह जयहिंद चलता है- नमस्ते से भी ज्यादा। लेकिन उनकी हिंदी का उच्चारण अरुणाचल के हिसाब से होता है। कई बार समझने के लिए प्रयास करना पड़ता है। उनके नाम यहां के भारतीय महानुभाव कम समझते हैं। दलालों और संपर्क सूत्रों से भरी काम-काज कराने और सुविधाएं जुटाने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं की संवेदनहीन राजधानी में अक्सर इनका तिरस्कार भी होता है। पर फर्क क्या पड़ता है?  कितने वोट हैं, कितनी लोकसभा सीटें? साउथ पर जोर दो, रणनीति के हिसाब से इंपॉर्टेंट है या कऊबेल्ट के बनिया, ठाकुर, अनुसूचित जाति वाले हिस्सों को राजनीतिक पकड़ में लो। नॉर्थ ईस्ट का मामला थोड़ा-बहुत फाइल-वाइल घुमा कर सुलटाया जा सकता है। 

घर के छज्जे और कंगूरे जब कमजोर होकर दरदराने लगें, तो बैठक में उसकी कंपकंपाहट सुनाई देनी चाहिए। अरुणाचल, मणिपुर, त्रिपुरा, नगालैंड जैसे इलाकों में दिल्ली के बड़े लोगों को जाने का वक्त मिलता नहीं है। तावाहारे या येसे दरजे थोंगशी के धीरे-धीरे अपनी पीढ़ी खत्म होते जाने की वेदना किसे समझ में आएगी? यह कहना अपराध हो गया है कि हमें विदेशी धन और विदेशी मन लेकर आ रहे आक्रामक परावर्तन वादियों से बचाया जाए। पिछले दिनों उन्हें गृहमंत्री से मिलने का मौका मिला। गृह राज्य मंत्री तो अरुणाचल से हैं। 

अरुणाचल के बौद्ध परेशान हैं। उन्हें कौन रक्षा कवच देगा। वहां जनजातियों का लाभ देने के साथ अल्पसंख्यक होने का लाभ भी उन्हें मिल रहा है, जो अपना मत या आस्था बदल रहे हैं। वे पूछते हैं कि क्या दोहरा लाभ संविधान के अंतर्गत है? अब सरकार भी मूल आस्थावादियों के नौजवानों को धर्म परिवर्तन करने के लिए प्रोत्साहन दे रही है। जब तक तुम अपनी आस्था पर कायम रहोगे, तो केवल जनजातीय के रूप में इकहरा लाभ मिलेगा। जब आस्था बदल लोगे तो भारत के संविधान का दुरुपयोग करते हुए दोहरा लाभ मिलेगा। विदेश जाकर पढ़ाई का मौका मिलेगा। 

सिर्फ इतना नहीं हो रहा है, सैकड़ों वर्षों से अरुणाचल की जनजातियां परशुराम कुंड, जो लोहित यानी ब्रह्मपुत्र के किनारे ही है, नए जल विद्युत बांधों से समाप्त किया जा रहा है। इतने अधिक बांध और जल विद्युत परियोजनाएं परशुराम कुंड के आठ सौ मीटर से दो किलोमीटर की परिधि में स्वीकृत कर दी गई हैं कि परशुराम कुंड समाप्त हो जाए। वहां की पवित्रता और पर्यावरण के प्रति किसी की दिलचस्पी नहीं है। वहां की जनजातियां दिल्ली आ नहीं सकतीं। उनकी इ-मेल और चिट्ठियों का दिल्ली से जवाब तक नहीं दिया जाता। ईटानगर में सरकार इस बारे में दिलचस्पी ले भी क्यों। तमाम स्वीकृतियों के पीछे तो उसी का मन है। 

आस्था पर आक्रमण है। पर्यावरण, जमीन और जंगल पर हमला है। भाषा, भूषा, परंपरा और मूल चेतना अरक्षित हैं। केवल राजनीति जिंदा है। इस राजनीति के दायरे में वे सब नहीं आते, जिनके समाप्त होने से सरकार के चलने या न चलने पर फर्क ही नहीं पड़ता। अरुणाचल के थोंगशी उपन्यास लिखते रहेंगे। दिल्ली में शायद कोई उस उपन्यास की समीक्षा भी न छापे या छापे भी तो बुझे हुए, अहसान जताते हुए भाव से- तुम नॉर्थ ईस्ट वालों के लिए हमने भी कुछ कर दिया। लेकिन इस इलाके में हिंदुस्तान की रक्षा सिर्फ वायुसेना के नए हवाई अड्डे या सीमा तक अब बनाई जा रही सड़कों से नहीं की जा सकती। जन मन का धन नहीं बचेगा तो बचेगा क्या? 


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समांतर संसार: खुद को मारता समाज PDF Print E-mail
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Monday, 15 September 2014 17:36

सय्यद मुबीन ज़ेहरा

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: भारत को आत्महत्या की राजधानी का खिताब मिला है। यह हमारे लिए गर्व की नहीं, शर्म की बात है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में सबसे अधिक लोग भारत में आत्महत्या करते हैं। हर चालीस सेकेंड में दुनिया में कोई न कोई व्यक्ति खुद को मौत के हवाले कर देता है और आत्महत्या करने वाले हर तीन में से एक व्यक्ति भारत का होता है। यानी हर दो मिनट में एक भारतीय आत्महत्या कर लेता है। रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण-पूर्व एशिया में 2012 में सबसे अधिक आत्महत्या की घटनाएं भारत में हुर्इं। दुनिया में आत्महत्या से हुई आठ लाख चार हजार मृत्यु में से दो लाख अट्ठावन हजार पचहत्तर मौतें भारत में हुर्इं। पुरुषों को बहुत बहादुर और हिम्मती कहा जाता है, लेकिन चौंकाने वाली बात है कि भारत में होने वाली आत्महत्या की घटनाओं में सबसे अधिक संख्या पुरुषों की है। एक लाख अट््ठावन हजार अट्ठानबे पुरुषों ने इस अवधि में खुदकुशी की, जबकि महिलाओं की संख्या एक लाख से तेईस कम है। पर महिलाओं की आत्महत्या भी हमारे समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। 

दक्षिण-पूर्व एशिया में खुदकुशी के लिए लोग ज्यादातर कीटनाशकों का उपयोग करते हैं। श्रीलंका में कीटनाशकों की उपलब्धता मुश्किल बनाने के बाद वहां आत्महत्या की घटनाओं में कमी आई है। क्या इस पर रोक लगा कर हमारे यहां भी आत्महत्या के मामलों को कम किया जा सकता है? दरअसल, हमारे यहां आत्महत्या के अधिकतर मामलों में घरेलू झगड़े बड़ी वजह बनते हैं। यहां तेजाब हो या न हो, अगर घर के लोग ही जीवन में तेजाब घोलने पर उतारू हो जाएं और किसी की भावनाओं की कद्र न करें, कोई पूछने वाला तक न हो, तो संभव है कि आदमी दहशत और निराशा में ऐसे पाप को अपना ले, जिसकी हर धर्म में निंदा की गई है। खासकर महिलाओं के मामले में यही देखा गया है। हमारे समाज में महिलाओं के जीवन को कष्टों से भर देने की प्रवृत्ति आम है। 

दिल्ली में, जो कि देश की राजधानी है, हर दिन बलात्कार की चार वारदातें होती हैं। अधिकतर महिलाएं बलात्कार की मानसिक पीड़ा के बाद अपने जीवन का अंत कर लेती हैं, क्योंकि वे अपने साथ हुई किसी ऐसी हरकत के बाद हर पल खुद को मरता देखती हैं। समाज भी ऐसी महिलाओं की मुश्किलों को मानसिक और सामाजिक रूप से दूर करने में विफल रहता है। होता यह है कि ऐसे हालात में दोषी को समाज सिर आंखों पर बिठाता है। ऐसी हरकतें समाज की एक ऐसी छवि पेश करती हैं, जो मर चुका है और जिसमें बलात्कार की शिकार महिला को ही निशाने पर रख लिया जाता है। ऐसे में यह आशंका रहती है कि बलात्कार की शिकार महिला अपने को मौत के हवाले न कर दे। उसकी ऐसी मौत समाज की ही मौत कही जाएगी। 

पिछले दिनों बिहार के दरभंगा में एक पच्चीस वर्षीय महिला को पुलिस ने बचाया। दहेज न ला पाने के कारण उसे ससुराल वालों ने तीन साल से शौचालय में बंद कर रखा था। अपनी बेटी से मिलने के सभी प्रयास विफल हो जाने के बाद उसके माता-पिता ने शिकायत की तब पुलिस ने उसे नरक से मुक्ति दिलाई। तीन साल तक बचा-खुचा खाकर शौचालय की अंधेरी दुनिया में बंद रहने वाली यह महिला बाहर निकल कर धूप में आंखें नहीं खोल पा रही थी। जब वह बाहर निकली तो उसकी बेटी भी उसे नहीं पहचान पाई। ऐसा जीवन अगर हमारे समाज में किसी महिला को दिया जाए, तो क्या वह जीने से अधिक मरने की चाह नहीं करेगी। जब अपने ही जान के दुश्मन बन जाएं और हर घड़ी यातना में बीत रही हो, तो आत्महत्या को रोकने के सभी तरीके विफल होते नजर आते हैं। समाज को मिल कर इसके विरुद्ध लड़ना होगा। यह कैसा समाज है कि जहां पड़ोसी तक उस महिला की सहायता नहीं कर पाए। जब उसके माता-पिता ने कई बार मिलना चाहा होगा तब समाज को तो बीच में पड़ कर उनकी मुलाकात बेटी से करानी चाहिए थी। पर शायद यह आज का कड़वा सच है कि जब किसी पर अत्याचार होता है, तो पूरे समाज का मौन समर्थन अत्याचारी के साथ होता है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन की जिनेवा में जारी इस रिपोर्ट के अनुसार आत्महत्या से मरने वालों में पंद्रह वर्ष से उनतीस वर्ष के युवा अधिक होते हैं। यह वह अवस्था है, जिसमें युवाओं में उत्साह का संचार होना चाहिए। पहाड़ों का सीना चीर देने की हिम्मत होनी चाहिए। तूफानों को मोड़ देने की भावना दिखनी चाहिए। जान की बाजी लगाने की तैयारी दिखाई देनी चाहिए, मगर अफसोस कि युवा पीढ़ी न जाने क्यों हालात से इतना घबरा जाती है कि उसे जीवन से टक्कर लेना मुश्किल और मौत को गले लगाना आसान नजर आता है। अगर हमारे समाज में युवा ऐसे सोच के साथ परवरिश पा रहे हैं, तो फिर समाज का भविष्य अंधेरे में है। अगर इस समय कुछ नहीं किया गया तो हमें तैयार रहना चाहिए एक डरपोक और कमजोर समाज के लिए, जहां विरोध की हल्की-सी आहट हमारे युवकों को चूहों की तरह अपने बिलों में घुसा देगी। वह घबरा कर किसी भी गलत दिशा में निकल सकते हैं। वह चाहे खुद को मार डालना ही क्यों न हो। इसे काबू में करने की जरूरत है। 

अगर हमें समाज से आत्महत्या की प्रवृत्ति को दूर करना है, तो हमें अपने समाज में प्रवेश कर चुकी बुराइयों को दूर करना होगा। बाजार के हवाले हो चुके इस जीवन में हम एक-दूसरे के कपड़े की अधिक सफेदी तक से बेचैन हो जाते हैं। यह सोच हमें आगे चल कर कुएं में ले जाएगी। जिस प्रकार के एक बने-बनाए सांचे में ढले माता-पिता अब तैयार हो रहे हैं, वे एक ऐसी दुनिया में जीते हैं, जहां इंसान की कद्र केवल धन-संपत्ति से होती है। आपकी योग्यता आपकी लंबी गाड़ी पर निर्भर करती है। आप किस ब्रांड के कपड़े पहनते हैं, कैसे घर में रहते हैं, कौन-सा मोबाइल उपयोग करते हैं और साल में कितनी बार कहां-कहां घूमने जाते हैं, यह सब अगर सफलता की दलील होने लगे तो आप समझ सकते हैं कि आज का व्यक्ति कैसे झूठी दुनिया में जी रहा है। इसके अलावा इंसान की इंसान से दूरी, समाज में ऊंच-नीच, जात-पांत, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ सबको बराबर न मिलना भी किसी व्यक्ति के आत्मविश्वास को कमजोर कर सकता है। हमारे देश में बुढ़ापे में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, अपनों से दूरी या महंगाई के कारण भी कई बुजुर्ग आत्महत्या का रास्ता अपना लेते हैं। 

आत्महत्या की घटनाएं किसी भी समाज की कमजोरी को दर्शाती हैं। साबित करती हैं कि लोग एक-दूसरे के साथ नहीं खड़े हैं, जरूरत पड़ने पर मदद के बजाय दूसरों का मजाक उड़ाते हैं। इसलिए लोगों का अपनी परेशानी को लेकर परस्पर संवाद नहीं हो पाता। हमें आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए ऐसे सोच से बचना होगा। सरकार को इस दिशा में काम कर रहे संगठनों के साथ बेहतर तालमेल बनाना होगा। समाज को एक-दूसरे से अधिक बातचीत करनी होगी। एक-दूसरे को सुनना भी होगा और निराशा के शिकार लोगों का हौसला भी बढ़ाना होगा। मीडिया को भी इसमें बड़ी भूमिका निभानी होगी। धार्मिक नेताओं को भी आत्महत्या जैसे पाप से लोगों को बचाने का वचन लेना होगा, ताकि लोग आत्मघाती न बन कर उच्च मनोबल और नैतिक बल से भर सकें। आइए, कोशिश करें कि हमारा देश आत्महत्या की राजधानी के पदक से मुक्ति पा सके। इसके लिए सरकार ही नहीं, हम सब यानी पूरे समाज को एक-दूसरे का समर्थन करना होगा और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की मदद करनी होगी। 


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संवाद: भाषा की जमीन PDF Print E-mail
Monday, 15 September 2014 17:32

लक्ष्मीधर मालवीय

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: कुलदीप कुमार के स्तंभ में ‘हिंदी बनाम उर्दू’ (7 सितंबर) पढ़ने तक मुझे यह जानकारी न थी कि सन् 74 में जेएनयू में हिंदी उर्दू विद्यार्थियों के लिए ये दोनों भाषाएं सीखना अनिवार्य कर दिया गया था। इसका उद्देश्य क्या था पता नहीं, पर मेरा अनुमान है कि यह प्रस्ताव लागू न किया गया होगा। जापान में हिंदी सीखने वाले छात्रों को उर्दू वर्णमाला का अभ्यास कराया जाता है ताकि वे प्लाट्स और फेलन के कोशों का फायदा उठा सकें। हिंदी शब्दकोशों पर कैसे भरोसा किया जाए जबकि, हिंदी के सारे शब्दकोश खोल कर देख डालें, वहां तो नागरी की बारहखड़ी लड़खड़ा और भहरा रही है- ‘अ’ के बाद ‘आ’ नहीं ‘अं’ कूद पड़ता है! 

हिंदी बनाम उर्दू जैसे प्रसंगों में मेरे मन में सदा यह संदेह पैदा होता है कि हमारे देश में भाषा और मातृभाषा में सचमुच क्या कोई तात्त्विक और व्यावहारिक भेद नहीं है? 

पूर्वी उत्तर प्रदेश के पडरौना निवासी मुन्ना खां ने अपनी मातृभाषा उर्दू दर्ज कराई है तो इसका कारण मेरी समझ में यह आता है कि- एक, वह मुसलमान हैं और दो, कि वह पढ़े-लिखे हैं और लिखते-पढ़ते हैं उर्दू लिपि में। वास्तव में उनकी मातृभाषा भोजपुरी है। उनके पड़ोसी मुन्ना लाल ने अपनी मातृभाषा हिंदी लिखाई है तो ऊपर की वजहों में अंतर हिंदू और नागरी लिपि का है। 

नहीं, ये दोनों- मुन्ना लाल और मुन्ना खां साकिन हैं झांसी के और अपनी मातृभाषा क्रमश: हिंदी उर्दू लिखा रहे हैं तो यह गलत बयानी है- दोनों ही बुंदेली बोलते हैं, बुंदेली उनकी मातृभाषा है। यहां तक कि दोनों अकोला, महाराष्ट्र, में जा बसें तो उनकी मातृभाषा वहीं की बोली होगी जहां से ये उठ कर आए हैं- वह पडरौना हो कि ललितपुर कि उन्नाव। फिर इन दो अकोला वासियों के लिए मराठी का दरजा क्या होगा? मराठी भाषा इनके लिए उपकरण है, तर्जुमाकार- वैसे ही जैसे कलछी उपकरण है, बटलोई से दाल या रसा निकाल कर परसन्े का। (चाकू कांटा हो कि जापानी सलाइयां, भोजन करते समय इनके किसी काम की न होंगी!) 

मोन्ना मोशाय के सामने बांग्ला छोड़ भाषा का कोई दूसरा नाम है ही नहीं- वह चिटगांव के हों कि बर्दवान के। यही बात मोन्नामा की तमिल पर लागू होती है। थोड़ा-बहुत बारीक भेद भले ही हो, घर-बाहर उसी भाषा का चलन है, जो उनकी मातृभाषा भी है। यों कहें कि मुन्ना द्वय से मातृभाषा और भाषा में भेद पहचानने में चूक हुई। 

हरियाणवी बोलने वाले बालमुकुंद गुप्त की डलमऊ उन्नाव के बैसवाड़ीभाषी महावीर प्रसाद द्विवेदी से जब इतनी गर्मागर्मी हो गई, तब कल्पना करें, झांसी वाले मुन्ना पडरौना के मुन्ना से आपसी हाथापाई से बचने के लिए किस बोली में बोलें! 

सैकड़ों बरसों से राजधानी बने रहे नगर दिल्ली के पड़ोस में होने के सबब मेरठ अलीगढ़ के छोटे से इलाके की बोली को इसी उद्देश्य से काट-तराश कर खड़ी बोली के रूप में गढ़ा गया। इस गढ़ंत रूप का एक नमूना गिलक्रिस्ट की ‘हिंदी स्टोरी टेलर’ (1806) में देखें- 

ऐक औरत बेवकूफ अपने फूहड़पने से चलते हुए गिर गिर पड़ती- और अपनी नजाकत पर बहान: करती- किसूने दरयाफ्त किया कि यिह आपसे गिरती है- और नजाकत को बदनाम करती है- हंस कर कहने लगा सच है नाच न जाने आंगन टेढ़ा 

यह जबान हिंदू के लिए है और न मुसलमान के लिए- यह भाषा ‘हिंदी’ अब के उत्तर भारत में कहीं के भी निवासी से, जिनकी मातृभाषा भोजपुरी से लेकर बीकानेरी तक कोई भी बोली हो सकती है, कंपनी के अंगरेज साहब बहादुर के लिए तर्जुमा करने के लिए गढ़ी गई थी। इसका प्रकट प्रमाण है कि एक बंगाली बांग्ला बोल कर अपना मंतव्य पठान तक नहीं पहुंचा पाता, मगर वह भले ही टूटी-फूटी ‘हिंदी’ में बोले, उसकी कही हुई बात का आधे से अधिक हिस्सा पश्तो बोलने वाला पठान समझ जाएगा। इसी प्रकार तमिल बोल कर एक कश्मीरी को बात नहीं समझाई जा सकती, ‘हिंदी’ दोनों के बीच संवाद करा देती है। अगर एक मथुरा वासी, एक मंगलूर का, एक अरुणाचल का, ये तीन इकट्ठा बैठ कर बातें करना चाहें तो उनके वार्तालाप बखूबी करा देगी ‘हिंदी’! उनकी मंडली में एक नेपाली के आ मिलने से भी बात वही रहेगी! 

वह गढ़ी जाती हुई खुरदुरी दुभाषिया ‘हिंदी’ पहाड़ी नदी में ढुलकते-बहते रोड़ों की भांति गोल और चिकनी होती जा रही थी, इसके नमूने 1850 के आसपास छपी पुस्तकों में देखने को मिल जाते हैं। सन् 1900 के इधर-उधर ‘सरस्वती’ ‘भारत मित्र’ वह कहां से कहां पहुंच गई! (‘‘हम वही भाषा लिखते हैं, जो हम बोलते हैं’’- बालमुकुंद गुप्त) 

हिंदी एक तो तितलौकी, फिर चढ़ी नीम! कैसे चढ़ी नीम का खुलासा करते थोड़ा संकोच होता है, क्योंकि मेरे अपने गुरु तथा गुरुस्थानीय जनों के नाम भी साथ ही जाहिर होते हैं। 

बनारस विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग खुला, सन् 1921 में। (अब से महज छह बरस बाद वहां आयोजित शताब्दी समारोह की मन गुदगुदाने वाली कल्पना तो कीजिए!) बाबू श्यामसुंदर दास विभाग के अध्यक्ष। ‘हिंदी साहित्य कोश’ (प्रकाशक ज्ञानमंडल) भाग दो, पेज 569 पर आपके द्वारा रचे गए ग्रंथों की सूची छपी है- इसमें ‘पाठ्यपुस्तकें’ के आगे तीस से ऊपर पुस्तकें हैं! (मैंने कुल ग्रंथों की संख्या जानने के लिए गिनना शुरू किया, मगर बीच में हिम्मत छूट गई!) हिंदी में हर विषय पर प्रकाशित साहित्य, पुस्तक, पत्र, पत्रिका के रूप में सन् 21 में मौजूद था तो! नहीं, इस बाजारू माल को विश्वविद्यालय स्तरीय नहीं माना जा सकता! विश्वविद्यालय में वही पुस्तक मान्य हो सकती है, जिसे विश्वविद्यालय तक शिक्षा प्राप्त और इसके भी ऊपर विश्वविद्यालय में पदासीन अध्यापक ने लिखा हो! इसका सबूत चाहिए? राहुलजी और किशोरीदास वाजपेयी के नाम याद करिए! 

मेरे गुरु श्री धीरेंद्र वर्मा ने सन् 1921 में इलाहाबाद युनिवर्सिटी से एमए किया था, संस्कृत में। महामहोपाध्याय सर डॉ. गंगानाथ झा के शिष्य थे। गंगानाथजी युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर, तब सीनेट में तूती बोलती थी, डॉ. ताराचंद, डॉ. ईश्वरी प्रसाद, डॉ. गणेश प्रसाद- पूरा दल-बल था इनका! धीरेंद्रजी ने दल-बल के साथ गंगानाथजी से लड़-झगड़ कर (जी हां, लड़-झगड़ कर) अलग हिंदी विभाग खुलवाया। जो कार्य बनारस में दासजी ने किया था, उसी के जोड़ का काम धीरेंद्रजी ने शोध परंपरा कायम करने- और अपने शिष्य, प्रशिष्य की लंबी पांत खड़ी कर देने में किया! सन् साठ में मैं वहां लेक्चरर था, तब डॉ. धीरेंद्र वर्माजी अध्यक्ष थे, और उनसे दोयम डॉ माताप्रसाद गुप्त से लेकर मुझ तक, सब धीरेंद्र वर्माजी के और एक से दूसरे से तीसरे के पढ़ाए हुए प्राध्यापक थे! इसमें आपत्तिजनक तो कुछ भी नहीं! सारे उत्तर भारत (और नीचे भी!) डंका बजता था विश्वविद्यालयी हिंदी का! 

भाषा- मातृभाषा भी- प्रकृत्या अनुकरण मूलक, नकलची होती है! यही विभागी हिंदी आकाशवाणी बनी, दफ्तरों में हिंदी अफसर बनी, संपादकों की व्यास पीठ पर विराजी, टीवी पर वेदपाठियों के सामान हस्त संचालन करती लंगर बन कर खड़ी हुई- आज भी यह क्रम चल रहा है और भविष्य में भी चलता रहेगा। ‘नल की औ नलनीर की एकै सी गति होय!’ निरंतर अधोगति पाती भई अब तो विश्वविद्यालयी हिंदी ‘जमीनी हकीकत’ से टेक आॅफ कर, अर्थ- अर्थात मायने- के दायरे से बाहर निकल गई! लिखे हुए का अर्थ या तो स्वयं उसका लेखक समझे या खुदा समझे! 

यह हश्र है सारे संसार में बेजोड़ और अनोखी ऐसी अमरबेल सम भाषा का जिसने अपना व्याकरण संस्कृत तक को ठेंगा दिखाते हुए, केवल श्रुत के सहारे तैयार किया था! इसके प्रयोक्ता हम यदि कर्मदरिद्री न हुए होते तो आज के दिन यह चार ठौर मजूरी करते हुए भी तमाम बोलियों की अर्थ गौरव से संपन्न शब्द संपदा को बटोरती समेटती हुई, अंगरेजी और चीनी भाषाओं को पीछे छोड़ गई होती! 

उर्दू को भी उचित स्थान दिया जाए- भला क्यों नहीं! हिंदी के साथ-साथ- जी नहीं! मुझे क्षमा करें, आप फिर वही भूल कर रहे हैं! भाषा और लिपि में घालमेल कर। मेरे मन तो कुछ और ही है! विश्वविद्यालय स्तर के हिंदी प्राध्यापक को उर्दू क्या, फारसी भाषा में भी दक्ष होना चाहिए। हरिऔध, चंद्रबली पांडेय, काशिकेय शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’, हिंदी के ये प्रतिष्ठित लेखक संस्कृत, फारसी, अरबी के पारदर्शी विद्वान तेहरान युनिवर्सिटी के स्नातक न थे! और नहीं तो वासुदेवशरण अग्रवालजी की पदमावत पर टीका के एकाध पन्ने उलट-पलट कर देख लीजिए। जापान में उर्दू के एक प्राध्यापक ने मुझ हिंदी वाले से सही उत्तर पाने की उम्मीद रखते हुए पूछा था कि ‘दाग़’ संस्कृत मूल का शब्द होकर भी फारसी में ‘ग़ैन’ से क्यों लिखा जाता है! 


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संवाद: भाषा विवाद और राजनीति PDF Print E-mail
Monday, 15 September 2014 17:32

गणपत तेली

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: कुलदीप कुमार ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार के उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा बनाए जाने के फैसले को वैध करार देने पर ‘हिंदी बनाम उर्दू’ शीर्षक से (7 सितंबर) हिंदी और उर्दू के संदर्भ में प्रासंगिक मुद्दे उठाए हैं। गौरतलब है कि 1989 के सरकारी फैसले के विरुद्ध हिंदी साहित्य सम्मेलन ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वाद दायर किया था और 1996 में वहां से हारने के बाद सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी। हिंदी साहित्य सम्मेलन के इस कदम पर हमें हैरान नहीं होना चाहिए। 1910 में काशी प्रचारिणी सभा के तत्त्वावधान में सम्मेलन की स्थापना ही तत्कालीन भाषा विवादों में हिंदी भाषा के समर्थन के उद्देश्य से हुई थी। कांग्रेस की तर्ज पर देश के विभिन्न शहरों में सम्मेलन की शाखाएं थीं और इसके वार्षिक अधिवेशन भी अलग-अलग शहरों में आयोजित होते थे, जिनकी महात्मा गांधी, राजेंद्र प्रसाद जैसे कई कांग्रेसी नेताओं ने अध्यक्षता भी की थी। नाम से भले यह साहित्य सम्मेलन था, लेकिन इसका उद्देश्य और इसकी गतिविधियां राजनीतिक अधिक थी। नागपुर में हुए अधिवेशन के बारे में अज्ञेय ने ‘विशाल भारत’ में लिखा था कि ‘‘सम्मेलन साहित्यिक न होकर एक पोलिटिकल जमघट था।... घूम फिर कर सम्मेलन के आगे एक ही प्रश्न आ जाता था- राष्ट्रभाषा का प्रश्न।’’ यानी सम्मेलन के लिए साहित्य गौण था और राजनीति प्रमुख। राष्ट्रभाषा के उस राजनीतिक मुद्दे ने हिंदी की साहित्यिक और अकादमिक क्षमता को प्रभावित किया था। 

हिंदी साहित्य सम्मेलन और नागरी प्रचारिणी सभा ने उस समय हिंदी भाषा और साहित्य के लिए महत्त्वपूर्ण काम भी किए थे, जिनमें कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का प्रकाशन भी सम्मिलित है (जो आज इन्हीं संस्थानों के पुस्तकालयों में दुर्दशा के शिकार हैं)। उस समय भी हिंदी लेखन में विविधता आज से किसी तरह कम नहीं थी। और, हर साल-दो साल में किसी एक भाषा से जुड़े लोग एक जगह जुटते हों, यह भी कोई कम बड़ी बात नहीं थी। बावजूद इसके इन दोनों संस्थाओं और खासकर सम्मेलन ने हिंदी की साहित्यिक और अकादमिक संपदा में वृद्धि और उसके संरक्षण का अपेक्षित काम नहीं किया। अपने संसाधनों और प्रयासों को वे हिंदी समर्थन और उर्दू-हिंदुस्तानी विरोध में लगाते रहे। यहां तक कि हिंदी क्षेत्र की भाषाओं के साहित्य पर बल देने और सम्मेलन के विकेंद्रीकरण करने के जनपद आंदोलन के प्रस्ताव को भी सम्मेलन नेतृत्व ने कभी लागू नहीं होने दिया, जबकि यह एक दूरदर्शी योजना थी कि उक्त भाषाओं से हिंदी समृद्ध होती। सम्मेलन ने जो नजरिया उर्दू और हिंदुस्तानी के प्रति अपनाया, वही स्थानीय भाषाओं के प्रति भी अपनाया। सम्मेलन नेतृत्व के इसी तरह के आग्रह के कारण महात्मा गांधी ने 1945 में सम्मेलन से नाता तोड़ लिया था। 

दुखद है कि सम्मेलन के दृष्टिकोण में अब भी कोई बदलाव नहीं आया, जबकि आज इलाहाबाद के आसपास के क्षेत्रों में सम्मेलन की छवि एक शैक्षणिक संस्था की है। आज भी हिंदी साहित्य सम्मेलन के संग्रहालय या पुस्तकालय में ऐतिहासिक महत्त्व की कई पुरानी पुस्तकें और पत्रिकाएं धूल खा रही हैं और नष्ट होने के कगार पर हैं। यही स्थिति नागरी प्रचारिणी सभा की भी है। किसी भी शोधार्थी के लिए उस संदर्भ सामग्री तक पहुंच पाना बहुत ही मुश्किल काम हो जाता है। इस सामग्री के संरक्षण के लिए विद्वानों ने सरकार को ज्ञापन भी दिया था, लेकिन सरकार को क्या पड़ी है, यह सब करने की। कितना अच्छा होता कि अगर सम्मेलन मुकदमे में लगाए संसाधनों का सदुपयोग अपने संग्रहालय में रखी ऐतिहासिक महत्त्व की बहुमूल्य सामग्री को संरक्षित करने में लगाता। 

कुलदीप कुमार ने आंकड़ों के आधार पर बताया कि देश में उर्दूभाषी लोग अन्य भारतीय भाषाओं से कम नहीं हैं, जबकि आजादी के बाद से हिंदी समर्थकों की तरफ से यह तर्क दिया जाता रहा कि अब पाकिस्तान बन गया है तो उर्दू का यहां क्या काम। यह उसी तर्क का एक विस्तार था, जिसके तहत हिंदी को हिंदुओं और उर्दू को मुसलमानों की भाषा बनाया गया। सम्मेलन ने भी आर्य समाज की तर्ज पर हिंदी को हिंदुओं की भाषा मानते हुए भाषाई विभाजन की खाई को चौड़ा किया। उधर अंजुमन-ए-तरक्की-उर्दू जैसी संस्थाएं उर्दू को मुसलमानों की भाषा मान कर यही काम करती रही है। हिंदी समर्थकों ने हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बनाया और उर्दू समर्थकों ने उर्दू को फारसीनिष्ठ। इन दोनों अतिवादी खेमों के विपरीत गांधी हिंदुस्तानी के पक्षधर थे, जिसका इन दोनों ही खेमों ने विरोध किया था। 

हिंदी और उर्दू का यह विवाद उपनिवेशवादी शासन की विभाजनकारी नीतियों से उपजा था, जिसे उस समय के पढ़े-लिखे वर्ग ने हाथों-हाथ लिया और भाषा को सांप्रदायिक मुद्दा बनने दिया। लगभग दो सौ वर्षों का इतिहास गवाह है कि इस विवाद से दोनों भाषाओं ने अकादमिक और साहित्यिक स्तर पर बहुत कुछ हासिल नहीं किया, बल्कि अपने आप को सीमित ही किया। हिंदी देश की आधिकारिक भाषा बनी, पर उस हिंदी को समझने के लिए राजभाषा अधिकारी भी शब्दकोश लेकर बैठते हैं। इसलिए आवश्यकता है कि अब अतीत के उन विवादी आग्रहों को छोड़ दिया जाए और दोनों भाषाभाषी समुदायों के बीच संवाद बढ़ाया जाए। 


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प्रसंग: क्रांति के कपड़े PDF Print E-mail
Monday, 15 September 2014 17:26

अर्चना वर्मा

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला-2007 के समय ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें अठारह दिसंबर, दो हजार पांच के ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट को उद्धृत करते हुए बताया गया था कि सन दो हजार तीन के मेले में सेल्स-गर्ल की स्कर्ट की लंबाई अठारह इंच और दैनिक भुगतान पंद्रह सौ रुपए था, जो दो हजार पांच में बढ़ कर दो हजार रुपए हो गया था। उस समय, 2007 में, चालू मेले में स्कर्ट की लंबाई बारह इंच और दैनिक भुगतान तीन हजार रुपए था। लेकिन यह भुगतान सबके लिए समान दर से होने वाला नहीं था। 

मेले के दौरान दिल्ली शहर के युवा छात्र-छात्राएं वहां अस्थायी रोजगार के तौर पर जेबखर्च कमाने के लिए ‘सेल्स बॉयज’ और ‘सेल्स गर्ल्स’ की हैसियत से काम कर लिया करते हैं। भुगतान की दर अलग-अलग किस्म की दुकानों पर अलग-अलग किस्म के ड्रेस कोड के अनुसार तय हुआ करती है। घरेलू उपयोग का साजो-सामान बेचने वाली दुकान पर साड़ी या सलवार-कमीज में उपस्थित विक्रय-परिचारिका का वेतन उस रिपोर्ट के अनुसार तब तीन सौ रुपए प्रतिदिन था और ‘इलेक्ट्रॉनिक गुड्स’ की दुकान पर ‘मिनी स्कर्ट’ में आपका स्वागत करने वाली ‘सेल्सगर्ल’ तब दिन भर की मेहनत के बदले तीन हजार रुपए पाती थी। जाहिर है कि वहां पर खरीद में सामान के साथ सुंदर, सुडौल, अनावृत्त टांगों का दर्शन अतिरिक्त पाया जाता रहा होगा और कुछ न भी खरीदना हो तो दुकान तक जाने का एक आकर्षण तो रहता ही होगा। चले ही गए होंगे लोग तो क्या पता कुछ खरीद भी लाए होंगे। बहेलिए तो लासा लगा कर जाल फैलाते ही हैं। 

तब से अब तक सात या आठ बरस और बीत गए हैं। तब से अब तक में हमारी रिहाइशी दुनिया की सूरत ही एक लंबे लगातार मेले में बदल चुकी है और उसके अनुरूप समाज के एक वर्ग में हमारी जीवन पद्धति भी। उस वर्ग में अब हमें याद भी नहीं आता कि मेला रहने की नहीं, थोड़ी देर घूम कर लौट आने की जगह है। लेकिन लौट कर अब आएं कहां? मेले ने तो घर में भी घर कर लिया है। इस मेले की न कोई चौहद्दी, न चारदीवारी। लेकिन बेहतर है कि इस पैमाने के मेले में मौका है, हर एक के लिए। बेहतर है कि यह खेल का, ‘सेल’ का एक समतल मैदान है। उनके लिए यह मौका और मैदान कुछ और अधिक बेहतर और समतल है, जिनके पास बोलने के लिए अंगरेजी और दिखाने के लिए सुंदर, सुडौल, अनावृत्त टांगें मौजूद हैं। 

मुझे अहसास है कि मेरी ये टिप्पणियां हद दर्जे की ‘सेक्सिस्ट’ करार दी जाने वाली हैं। अहसास है इस बात का भी कि अपने बारे में खुले दिमाग का मेरा मुगालता भी बस चकनाचूर किए जाने को है, लेकिन फिर भी मैं पूछूंगी अपना सवाल कि आदमी ने कपड़ा आखिर बनाया ही क्यों? यह जवाब पुराना और अप्रासंगिक हो चुका है कि नग्नता उसके लिए असहनीय रूप से बदसूरत थी और सभ्यता की दिशा में पहला कदम उसने शरीर को ढंक कर बढ़ाया था। जी नहीं, इस अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले का जवाब शायद यह होगा कि वही एक उत्पाद था, जिसको सबसे पहले ‘मार्केट’ किया जा सकता था। सिर से पांव तक ढंकने की संस्कृति क्यों आई? क्योंकि कपड़ा बेचना था। कहां से आई? कपड़े का बाजार बढ़ाने की जरूरत से। अब क्यों गायब होती जा रही है? क्योंकि कपड़े के अलावा अब इतना बहुत कुछ है बेचने के लिए, जिसे बेचने में कपड़े कम से कम होकर ज्यादा से ज्यादा मददगार हैं। भूमंडलीय ग्राम के व्यापार मेले की दिशा में गंतव्य तक दौड़ के लिए देह सबसे सहज सवारी है। 

सच कहूं तो लड़कियों का अपनी देह में यह सहज, स्वच्छंद, निस्संकोच वास मन को मुग्ध करता है। भले अभी समाज के कुछ ही हिस्सों में व्याप्त हो, लेकिन है यह सचमुच क्रांति। लेकिन क्रांति क्या किसी खास नाप या डिजाइन के ही कपड़े पहनती है तभी क्रांति कहलाती है? मामला जब ‘लाइफ स्टाइल’ और ‘स्टैंडर्ड आॅफ लिविंग’ का बना दिया जाए और ‘स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग’ जब ‘क्वालिटी ऑफ लाइफ’ का स्थानापन्न बन जाए तब ऐसी भी परिणतियां होती हैं। ये वाक्यांश इसलिए अंगरेजी में दिए जा रहे हैं, क्योंकि उस वर्ग के ये प्रचलित मुहावरे हैं और हिंदी में अनूदित होकर अपनी आन-बान-शान खो बैठते हैं, तो बिल्कुल जरूरी नहीं रहता कि स्पगेट्टी स्ट्रैप, हेल्टर टॉप, बैकलेस ब्लाउज में पीठ, कंधे या वक्ष को खुला/ अधखुला छोड़ने वाला शरीर दिमाग से भी खुला हो। बल्कि शायद वह सहज-स्वच्छंद की ठीक उलटी दिशा में असहज-स्वच्छंद होने की कोशिश कर रहा हो। अनावश्यक ही आत्म-सजग। एक साथ विरोधी दिशाओं में दौड़ता हुआ। कोई देख तो नहीं रहा? कोई देख क्यों नहीं रहा? देख रहा है तो ऐसे क्यों देख रहा है? 

कैसे भूला जा सकता है कि हम किसी सामाजिक-सांस्कृतिक शून्य में नहीं रहते और हमारी स्वच्छंदता किसी शून्य में सक्रिय नहीं होती। समाज के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग संस्कृति के पास अपनी अलग-अलग आचरण संहिता या ‘कोड आॅफ कंडक्ट’ है। खेल के मैदान में सानिया मिर्जा के स्कर्ट की नाप को लेकर मचाया गया हल्ला गलत और बेकार था, क्योंकि स्कर्ट की वह नाप अन्य प्रतियोगियों के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता को अधिक समतल धरातल पर स्थापित करती है और खेल के संदर्भ-समाज में ‘कोड आॅफ कंडक्ट’ के अधीन है। 

जिस समुद्रतट पर पूरी की पूरी भीड़ स्विमिंग सूट में हो, वहां किसी का शरीर अलग से नहीं दिखता, न्यूड-फार्म पर किसी की नग्नता महसूस नहीं होती, अपने घर पर पार्टी की निजता में या पांच सितारा होटल में पार्टी की सामूहिकता में जो स्पगेट्टी स्ट्रैप, हेल्टर टॉप, बैकलेस ब्लाउज और उनमें खुले/ अधखुले पीठ, कंधे या वक्ष सहज होते हैं वे ही सड़क पर, कॉलेज में या मेट्रो और बस में आक्रामक हो उठते हैं। हर खंभे, हर दीवार, हर बिल-बोर्ड, हर संभव जगह पर टंगा और घूरता सौंदर्य और शृंगार पहले कभी इतना आक्रामक नहीं रहा होगा, जितना अब है। प्रतिक्रिया में प्रत्याक्रमण भी प्रत्याशित ही होगा। नहीं, इस बात की कोई गारंटी नहीं कि शरीर ढंका होगा तो बलात्कार से सुरक्षित भी होगा। वह असुरक्षा तो स्त्री-शरीर नाम के जन्मजात वस्त्र की है। मैं बात अपनी आजादी और क्रांति के चुनाव-चिह्न की कर रही हूं। 

किसी सामाजिक ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ की बुनियाद में अन्याय निहित हो तो उसे ललकारने और बदलने की जरूरत होती है। लेकिन हम उसे कैसे चुनते हैं? हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं? जब घूंघट उठाना ही विद्रोह हो तब इस ललकार की कीमत समझी जा सकती है। लेकिन घूंघट में कैद हो सीता, तो राधा कपड़े उतार कर सीता की आजादी का बिगुल नहीं बजा सकती। यह शायद पिछली सदी से आई एक औरत का पूर्वग्रह ही हो, लेकिन मुझे लगता है कि जब स्वच्छंदता का बोलबाला हो चुका हो तब स्वेच्छा से कुछ निषेधों का चुनाव उचित है। स्वेच्छा में स्वतंत्रता सुरक्षित है अन्यथा विधेयों की कीमत भी जाती रहती है और आखिरकार उस स्वच्छंदता की भी, जिसे हमारी पिछली पीढ़ी ने महंगे मोल कमाया और विरासत में हमें दिया। 


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कभी-कभार: अजमेर साहित्य समारोह PDF Print E-mail
Monday, 15 September 2014 17:22

अशोक वाजपेयी

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: अजमेर को शिक्षा, धर्म, पुरातत्त्व आदि से जोड़ा जाता रहा है। पर उसे एक साहित्य केंद्र के रूप में पहले जाना-समझा न था। दो-एक बार वहां कुछ लेखक बंधुओं के आग्रह पर गया था। वहां साहित्य के श्रोता अच्छी संख्या में जुड़े भी। पर बाद में उनकी लगातार सक्रियता का कोई संकेत नहीं मिला। इसलिए जब रासबिहारी गौड़ और उनकी मित्रमंडली ने मिल कर वहां अजमेर साहित्य समारोह, जिसे पता नहीं उन्होंने किस दबाव में लिटरेचर फेस्टिवल कहा, करने का निर्णय किया तो प्रीतिकर आश्चर्य हुआ। आश्चर्य के कई कारण बने: पहला यह कि भारत में इन दिनों होने वाले अन्य साहित्य समारोहों से अलग यह पूरी तरह से हिंदी का, जिसमें उर्दू भी शामिल है, आयोजन है और उम्मीद करनी चाहिए कि अंगरेजी के आतंक और प्रलोभन से मुक्त, हिंदी का ही रहेगा। दूसरा, उसमें बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं शामिल हुए और अधिकतर प्रश्न उन्होंने ही पूछे। तीसरा, इस समारोह में प्राय: कोई राजनेता नहीं आया, जिसने इस धारणा की पुष्टि ही की कि इन दिनों आप किसी राजनेता की साहित्य में रुचि होने का संदेह नहीं कर सकते। चौथा, अजमेर के हिंदी मीडिया ने इस आयोजन को पहले पृष्ठ पर जगह देने का काम किया। पांचवां, आयोजन के लिए राशि कॉरपोरेट जगत से नहीं, कुछ मित्रों ने मिल कर अपने से जुटाई। छठवां, सभी सत्र ठीक समय से शुरू हुए, भले कई बार अपनी रौ में निर्धारित अवधि से कुछ लंबे चलते रहे। सातवां, साहित्य के अलावा मीडिया, राजनीति, अहिंसक आंदोलनों के नैतिक मूल्य, सच बोलने के खतरों आदि पर बातचीत होती रही। ऐसे पहले आयोजन में ही ये पक्ष प्रगट हुए यह भूरि-भूरि प्रशंसा की बात है। बनारस, लखनऊ, पटना, चंडीगढ़, जयपुर आदि के साहित्य समारोहों में अंगरेजी का वर्चस्व रहता है। 

मृदुला गर्ग, शीन काफ़ निज़ाम, पुरुषोत्तम अग्रवाल, उर्मिलेश आदि ने समारोह में हिस्सा लिया और समुचित मुखरता, विनोद-भाव और जिम्मेदारी से विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे; श्रोताओं की जिज्ञासाओं और प्रश्नों के उत्तर दिए और आमतौर पर यह अहसास कराया कि हिंदी में दृष्टियों, शैलियों, विचारों की सशक्त और ऊर्जस्वित बहुलता है और उसमें निजी बेचैनी, सामाजिक सरोकारों और गहरी चिंता सबके लिए जगह है। बावजूद इसके कि अनेक हिंदी लेखक बेवजह अंगरेजी शब्दों का इस्तेमाल करते रहते हैं, साफ-सुथरी, पर खुली हुई हिंदी सक्रिय है: उसमें सूक्ष्म और जटिल बातों को सुघरता से रखा जा सकता है और उनका सफल संप्रेषण होता है।

चूंकि अपने पहले आयोजन की सफलता से उत्साहित आयोजक इसे एक वार्षिक शृंखला बनाने का मंसूबा कर चुके हैं, यह सुझाना समीचीन है कि वे इसमें हिंदी अंचल की कलाओं को भी शामिल कर इसका वितान विस्तृत करें, युवा लेखकों आदि की भागीदारी बढ़ाएं, आमंत्रित लेखकों आदि की पुस्तकों के प्रदर्शन और बिक्री का आयोजन-स्थल पर ही प्रबंध करें और इसे हिंदी का ही साहित्य समारोह बनाए रखें।


हिंदी के संकोच

एक बड़ी भाषा होने के नाते हिंदी कुछ संकोच और संयम बरते यह स्वाभाविक और जरूरी है। अपने बड़प्पन का बोझ उतार कर ही उसे दूसरी भारतीय भाषाओं से संवाद और सहकार करना चाहिए। इसमें संदेह नहीं है कि हिंदी में पिछले लगभग पचहत्तर बरसों में श्रेष्ठ साहित्य की रचना हुई है, जिसे किसी भी भारतीय भाषा के श्रेष्ठ साहित्य के समकक्ष रखा जा सकता है। यह भी सही है कि अगर आप मोटे तौर पर जानना चाहें कि इस समय भारतीय साहित्य में क्या लिखा जा रहा है, तो आप हिंदी अनुवाद के माध्यम से यह बखूबी जान सकते हैं, भारतीय अंगरेजी में तो यह कतई संभव नहीं है- अंगरेजी के मुकाबले हिंदी भारत में अधिक आतिथेय भाषा है। 

हिंदी को एक बड़ा संकोच इस कारण होना चाहिए कि उसमें सर्जनात्मक साहित्य के साथ-साथ उसी कोटि का बौद्धिक साहित्य नहीं है: यह विचित्र है कि हिंदी अधिकतर विचार आलोचना में करती है, पर इतिहास, संस्कृति, आर्थिकी, विज्ञान, राजनीतिशास्त्र, धर्म, मनोविज्ञान आदि पर उसमें उदग्र विचार की कोई परंपरा नहीं बन पाई है। एक समाजशास्त्री मित्र बताते हैं कि समाज विज्ञान के क्षेत्र में इधर कुछ सक्रियता और विस्तार आए हैं। यह अच्छी बात है, पर कुल मिला कर, हिंदी बुद्धि और विचार में विपन्न ही है: हमारा साहित्य भाषा की इस भयावह कमी की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकता। इसका ही परिणाम है कि हिंदी में कोई सोचता-विचारता-बहसता-झगड़ता बौद्धिक जगत नहीं है। 

कई बार आश्चर्य होता है कि ऐसे जगत की अनुपस्थिति के बावजूद इतना उच्च कोटि का साहित्य कैसे संभव हुआ है। यह भी हो सकता है कि यह खामखयाली हो और इस आत्मविश्वास को, कि हमारी साहित्यिक उपलब्धि श्रेष्ठ है संदेह और प्रश्नांकन के घेरे में आना चाहिए। शायद यह तर्क दिया जा सकता है कि हमारे श्रेष्ठ लोगों के पास लगभग स्वार्जित बुद्धि रही है, पर औसत लेखक आदि ऐसा स्वार्जन अपने आसपास के माहौल और पाठ्यक्रमों आदि में बौद्धिकता के अभाव और कई बार अवमूल्यन की वजह से नहीं कर पाते हैं। इसका एक दुष्परिणाम वह बड़बोलापन है, जो कि इधर के युवा आलोचकों में बढ़ता गया है। 

ऐसे अवसर, सार्वजनिक और साहित्यिक, आए हैं जिनमें अनर्जित और अपरीक्षित आत्मविश्वास से युवा आलोचक पिछले पचास वर्षों में किसी के श्रेष्ठ होने का दावा करते हैं और बिना कोई आलोचनात्मक आधार स्पष्ट किए या विश्लेषण के एक बनी-बनाई बासी सूची एक बार फिर पेश कर देते हैं। यह बुद्धि से अपसरण है: अपनी बार-बार घोषित और असंदिग्ध और प्रश्नातीत विचारदृष्टि से अलग सोचने वाले लेखकों या कृतियों को हिसाब ही में नहीं लेते! यह बौद्धिक संकीर्णता और वफादारी का ही नमूना होता है, आलोचना-कर्म नहीं। सबसे बड़ा कवि कौन है, सबसे बड़ा उपन्यास या कृति कौन है आदि प्रश्न पत्रकारिता के प्रश्न तो हो सकते हैं, आलोचना के नहीं। जो आलोचक यह न जाने-माने कि उसकी दृष्टि से अलग या उसके विरोधी भी श्रेष्ठ और विचारणीय लेखक या कृति हो सकते हैं उसे आलोचक मानने में हमें संकोच करना चाहिए। 

हिंदी के संकोच का एक और कारण उसका राजभाषायी रूप है, जो अपनी बौद्धिक दयनीयता, समझ की हास्यास्पदता और राज्य-पोषित होने के कारण खर्चीलेपन से जो दुनिया बनाता है उसका हिंदी समाज से लगभग कुछ लेना-देना नहीं है, हालांकि वह इसी समाज को संबोधित है। यह हिंदी की बौद्धिक असमर्थता का एक और उदाहरण है कि हम साठ बरसों बाद भी ऐसी राजभाषा नहीं बना सके, जो राजकाज को उसमें समझदारी, जिम्मेदारी, सूक्ष्मता और संवेदनशीलता के साथ चला सकें, जिसे साधारण लोग समझ-बूझ सकें। 

एक और संकोच हिंदी का स्वयं अपनी बोलियों से किया दुर्व्यवहार है। संसार में शायद ही किसी और भाषा में छियालीस बोलियां होंगी, जितनी कि हिंदी में जनगणना आयुक्त की ताजा रपट के अनुसार हैं। खड़ी बोली ने, जिसने मानक हिंदी होने का अवसर पा लिया, बाकी बोलियों से संवाद और सहकार को छेंक दिया। उन्हें दोयम दर्जे का अपने व्यवहार से करार दिया। खड़ी बोली का श्रेष्ठ साहित्य ब्रज, अवधी, भोजपुरी आदि बोलियों के श्रेष्ठ साहित्य की तुलना में कमतर ही बैठेगा। इस मामले में हिंदी को अपनी बोलियों के प्रति अधिक खुला, ग्रहणशील और विनयी होने की जरूरत है। 

हिंदी अंचल भारत का सबसे अधिक सांप्रदायिकता-ग्रस्त, धर्मांध, जातिवाद पीड़ित, अवसरवादी और हिंसक राजनीति, पिछड़ी आर्थिकी, दलित-अल्पसंख्यकों-स्त्रियों पर लगातार अत्याचार, ध्वस्त शिक्षा व्यवस्था, अज्ञातकुलशील हो गए विश्वविद्यालयों, भ्रष्ट और अक्षम हिंदीसेवी संस्थाओं, सांस्कृतिक साक्षरताहीन पत्रकारिता आदि का क्षेत्र भी है। ये सभी हिंदी पर कलंक हैं। यह वह अंचल भी है, जो अपने साहित्य और कलाओं से अधिकतर बेखबर है। जिसे दरअसल पता ही नहीं है कि उसकी भाषा में कितना महत्त्वपूर्ण साहित्य रचा गया है; जो भूल चुका है कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और कथक नृत्य के अधिकांश घराने हिंदी अंचल में जन्मे और विकसित हुए थे और जो अब वहां नहीं रह गए हैं। अपनी इस बढ़ती सांस्कृतिक दरिद्रता से हिंदी अंचल अनजान है और उसे दूर करने के लिए रत्ती भर सजगता या प्रयत्न नजर नहीं आते। हिंदी को इसे लेकर भी संकोच करना चाहिए। 

आखिरी बात। हिंदी अंचल धीरे-धीरे अपने एक बहुत उजले उत्तराधिकार से दूर हो रहा है। उसके राजभाषायी रूप में भले तत्सम संस्कृत शब्दों की अबूझ भरमार है, पर वह संस्कृत से दूर हट रहा है। उस संस्कृत से, जिसमें अदम्य निर्भयता, अक्लांत उदात्तता और बहुत सारे ज्ञान और दृष्टियों की बहुलता रही है। संस्कृत धार्मिक अनुष्ठानों, संस्कारों के समय अनपढ़ ढंग से उच्चरित किए जाने तक महदूद होती जा रही है। दूसरी ओर, उसे वर्णाश्रम का पोषक मान कर उसके विरुद्ध दलित पूर्वग्रह फैलता जाता है। संस्कृत के कुछ पक्ष आज तिरस्करणीय जरूर हैं, पर उसमें उनके अलावा बहुत कुछ और है, जो हमारी जातीय स्मृति का अनिवार्य अंग है और हम उससे अज्ञानपूर्वक अपने को वंचित कर रहे हैं। ‘हिंदी’ सप्ताह या पखवारे में हमें इन संकोचों के बारे में निस्संकोच सोचना चाहिए। 


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पुस्तकायन: वैश्विक चिंता का वितान PDF Print E-mail
Monday, 15 September 2014 17:20

ओम निश्चल

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: कविताओं में प्राय: प्रेम की पुलकित वसुंधरा का आख्यान रचने वाली पुष्पिता अवस्थी हिंदी की सुपरिचित कवयित्री हैं। उन्होंने प्रवास में रहते हुए भी भारतीय मन की संवेदना और वैश्विक चिंता की अनुभूतियों को खूबी से सिरजा है। वे सूरीनाम में रहीं तो सूरीनामी गंगा को काशी की गंगा सरीखा मान दिया। इन दिनों नीदरलैंड में रह रही हैं तो वहां की प्रेमपगी धरती को अपने भीतर रचा-बसा रखा है। विश्व के अनेक देशों में यायावरी करती हुई आखिरकार जिस चिंता और संवेदना के तहत वे रचती-बुनती हैं वह उनकी आत्मा की ही उपज है। उनकी कविताओं में स्त्री का अनुराग भरा चित्त प्रतिबिंबित होता है तो भारतीय विवृत्ति भी, जो समूची वसुधा को अपना नीड़ मानती आई है। शब्दों में रहती है वह संग्रह से पुष्पिता अवस्थी ने यह जताने की चेष्टा की है कि वे विश्व को अपनी कवि-आंखों से निरखती-परखती हुई धरती के सौंदर्य को अपनी कविताओं में अक्षुण्ण रूप में सहेज लेना चाहती हैं। 

दरअसल, भारतीयों के लिए जो विदेश है, पुष्पिता के लिए वह भी स्वदेश सरीखा है-आत्मीय और अपना। विदेश में भी अपनी पहचान रचने की प्रक्रिया में वे शब्दों में प्रवेश करती हैं। पूरी आत्मीयता के साथ उनका अपनापन कविताओं में धड़कता है। उनकी कविताओं की संरचना लालित्य के प्रत्ययों से निर्मित होती है और अक्सर किफायतसारी की हिमायती उनकी कविता के पीछे एक चुप्पी-सी छाई रहती है। लेकिन उनका मौन मुखर होता है। वे अपने अर्थ खुलने पर बोलती हैं- चुप-चुप-सी रहती हुई। वे अनायास ही नहीं कहतीं: ‘शक्तियां चुपचाप जन्म लेती हैं/ और अपनी चुप्पी में ही पैदा करती हैं- शक्ति।’ 

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने प्रकृति को देवता का काव्य कहे जाने का उल्लेख करते हुए पुष्पिता की कविताओं में प्रकृति प्रेम की तसदीक की है। अपनी विश्व यायावरी के दौरान देश के कोने-अंतरों का भ्रमण करते हुए पुष्पिता ने प्रकृति को कहीं चित्रकार की तरह, कहीं लोकगायक की तरह, तो कहीं वहीं के बाशिंदे की तरह उसे उकेरा है। अपने शब्दों के अंकवार में समेटा है। मसलन, अमर इंडियन परिवारों के बारे में उनका एक कवितांश देखें: ‘सघन घन-बीच/ मछली-सी बिछलती तैरती/ जंगली मानसूनी बरसात पीकर जीवन जीती नदियों में/ अपने जीवन की कटिया डाले हुए जीती है वन जाति।’ 

ब्राजील के जंगलों का यह दृश्य है तो यूरोप के तीन देशों के संधिस्थल- इटली, फ्रांस और आस्ट्रिया- पर स्थित नाउदर्स गांव का चित्र उकेरती हुई वे लिखती हैं: ‘नाउदर्स के पेड़ों में/ फलों की तरह लदी रहती हैं चिड़ियां/ जो अपने नीड़ बनाती हैं- होटलों के गोखों और छत-ऊपर/ जंगल की प्रमुख नागरिक हैं मधुमक्खियां/ मौका पड़ते ही झपट लेती हैं पर्यटकों पर/ नाउदर्स निवासियों का गोपालन/ और होटल सेवा प्रमुख जीवन साधन।’ 

यहां कथा, कोमो झील, झील का अनहद नाद, स्नो बेल्स (बर्फ की घंटियां), नर्सेस (आत्मरति), ब्राजील की रियो नीग्रो जैसी प्रकृतिपरक गहरी संवेदनशील कविताएं हैं, तो त्रिनिदाद और टुबैगो, सेंट लूशिया और अंजोरे द्वीप पर कविताएं लिख कर उन्होंने अंतलांतिक महासागर और कैरीबियाई सागर के इन द्वीपसदृश उतराते द्वीपों का साक्षात प्रस्तुत कर दिया है। दरअसल, दो-तीन वर्ष पूर्व प्रकाशित संग्रह ‘शैल प्रतिमाओं से’ (डच-अंगरेजी-हिंदी) में प्रकाशित ‘पृथ्वी’ कविता में कवयित्री ने पृथ्वी को उस अकेली औरत के रूप में देखा है, जो जीने का दुख चुपचाप सह रही है। 

इधर पृथ्वी पर तरह-तरह के खतरे बढ़े हैं। ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, एक और महायुद्ध की तरफ बढ़ती हुई महाशक्तियां और जलसंकट। इस चिंता का वितान वैश्विक है, जिसमें प्रकृति और उसके सारे उपादान समाहित हैं। पृथ्वी, स्त्री, बच्चे पुष्पिता की प्रकृति के प्राणतत्त्व हैं। इसी में सृष्टि है, संवेदनाएं हैं, प्रेम, पीड़ा, हर्ष और विषाद है। सुख है, सुख के स्वप्न हैं। मन के शृंगार का रचाव है, आत्मा के आनंद का व्याख्यान है। संग्रह में भ्रमण के परिभ्रमण का चाक्षुष आह्लाद है, जीवन और जगत की गूंज है, संवेदना की राग-रागिनियां हैं और उदासियां भी। शब्दों के प्रति आस्थावान कवयित्री शायद इन्हीं तत्त्वों से तादात्म्य महसूस करती है। 

प्रकृति से तादात्म्य के साथ-साथ पुष्पिता की कविताओं का जीवन और विश्व की वैचारिकता से संश्लिष्ट रिश्ता है। वे विभेदकारी और विभाजनमूलक विचारों को कौतुक से परखते हुए सृजन और निर्माण के लिए प्रतिश्रुत दिखाई देती है। उन्हें यह दुखद लगता है कि कोई हमेशा भीतर से छीनता रहता है, इंसान का अपनापन जो हमेशा उसका अपना घोंसला है। पुष्पिता अवस्थी ने इन कविताओं में विदेशी धरती के मानवीय प्रसंगों को पूरी संजीदगी से समेटा है। यहां अश्वेत शिशु के जन्म पर मां का संतोष है तो ‘पेट भरों की भूख’ में दुनिया की अमिट भूख का एक लोमहर्षक जायजा भी। 

पुष्पिता जगह-जगह भारतवंशियों की पीड़ा का आख्यान रचते हुए भूलती नहीं कि सूरीनाम और हालैंड जैसे देशों का नख-शिख भारतीय मजदूरों ने अपने श्रम और पसीने से संवारा है। एक ओर मकबूल फिदा हुसेन की चित्रकारी, तो दूसरी ओर जाकिर हुसैन का तबलावादन उनकी कविता में गूंजता है। यूरोप की साइकिल की महिमा का गान है, तो फुटबाल खेल की विरासत का वैभव भी। मां की लेगेसी है तो स्त्री का इंद्रधनुष भी भूमंडल के चतुर्दिक उनकी कविताओं के माध्यम से अनुभव होता है। गर्भ की उतरन में स्त्री होने की व्यथा दर्ज है। पाश्चात्य और दक्षिण एशियाई देशों के युवाओं के लिए उभर रही दासता-दबोच के तेवर हैं। ब्राजील की रियो नीग्रो नदी की श्यामाभा है, तो न्यूजीलैंड की माओरी जाति (अमर इंडियन) की धड़कती दास्तान है। प्रणयगर्भी कविताओं में उनके मन का ब्रह्मांड है। नवातुर गर्भिणी स्त्री के आह्लाद का अद्भुत उन्माद है। आल्पस संवाद कविता को पढ़ते हुए कोई भी पाठक स्वयं को आल्पस से संवाद करते हुए अनुभव कर सकता है। 

अपने अनुभव और संवेदना की आंखों से दुनिया को निहारते हुए कवयित्री अक्सर अपनी स्त्री-देह में लौटती और तब जो महसूस करती है वह दुनिया भर की स्त्रियों की चरितगाथा लगने लगती है। वे कहती हैं: ‘औरत की देह ही/ औरत का ताबूत है/ जिसे वह जान पाती है- उम्र ढलने के बाद/ जीवन भर एक ही यात्रा/ भौतिक ताबूत से दैहिक ताबूत तक।’ इसी तरह वे एक ग्रेवयार्ड से गुजरते हुए सोचती हैं: ‘चलती हुई कारों के उस पार/ मृतकों का ग्रेवयार्ड है/ और इस पार चलते और चलाते हुए मनुष्यों का जिंदा ग्रेवयार्ड।’ उन्होंने अब तक के प्रवास में कैरेबियाई धरती की संवेदना को गहराई से महसूस किया और औपनिवेशिक दासता के इतिहास को जैसे निकट से गुजरते हुए देखा है। कहना न होगा कि वे शब्दों की धातु को पहचानने वाली कवयित्री हैं और शब्दों की अक्षय देह में ही जैसे दुबक कर रहने में गहरे सुकून और संजीवनी का अनुभव करती हैं। 


शब्दों में रहती है वह: पुष्पिता अवस्थी; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, दरियागंज, नई दिल्ली; 390 रुपए। 


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पुस्तकायन: आलोचना में अनुसंधान PDF Print E-mail
Monday, 15 September 2014 17:19

अनंत विजय पालीवाल

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: आज की बाजारीकृत व्यवस्था में नएपन के नाम पर मनगढ़ंत लिखने की मानो होड़-सी लगी है। सर्वेक्षण और साक्ष्यों के जरिए साहित्य को समृद्ध करने वाली पुस्तकें कम ही नजर आती हैं। ऐसे में सत्यकेतु सांकृत की पुस्तक हिंदी कथा साहित्य: एक दृष्टि इस दिशा में संक्षिप्त, लेकिन मुकम्मल प्रयास है। 

इस पुस्तक का पहला अध्याय 1975 से लेकर 2000 तक के उपन्यासों के व्यापक फलक को समेटता है। इतने बड़े फलक को आलोचक ने जिस तरह बांधने का काम किया है, वह निश्चय ही बहुत मुश्किल भरा रहा होगा। इसके लिए उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को लगभग आठ पृष्ठों में बताया है। फिर इन बदलती परिस्थितियों में उपन्यासकारों का अपनी समकालीन प्रवृत्तियों के साथ सीधा साक्षात्कार पेश किया गया है। यह इसलिए भी जरूरी हो जाता है कि किसी रचना का सही मूल्यांकन उसे उसकी समकालीन प्रवृत्तियों के बरक्स रख कर ही किया जा सकता है। साहित्यिक दशा-दिशा प्रवृत्तियों के अनुरूप कैसे ढलती है, इससे सत्यकेतुजी भली-भांति परिचित हैं, इसलिए उन्होंने सर्वेक्षण के अलग-अलग ढांचों का बखूबी इस्तेमाल किया है। 

पुस्तक का दूसरा अध्याय माखनलाल चतुर्वेदी की गद्य भाषा पर है, जिसका आधार ‘साहित्य देवता’ को बनाया गया है। इसमें चतुर्वेदीजी की गद्य भाषा की पड़ताल के लिए सत्यकेतुजी ने भाषा और शैली के सभी उपकरणों का प्रयोग किया है। ध्वनिरूपक, शब्द रूपक, अर्थ रूपक और वाक्यात्मक शैली के सभी विभागों का खुलासा करते हुए एक-एक विभाग को उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया गया है। चतुर्वेदीजी की गद्य भाषा की लयात्मकता पर विशेष बल देते हुए वे इसे उनकी गद्य शैली की प्रमुख पहचान मानते हैं। भाषा की यह पड़ताल कितनी बारीक और शोधपरक है, इसका अनुमान पुस्तक की इस पंक्ति से ही लग जाता है कि ‘गणित की भाषा का प्रयोग करें तो उनके संज्ञा और विशेषण पदों का 56 प्रतिशत तत्सम, 32.5 प्रतिशत तद्भव और 11.5 प्रतिशत विदेशज होता है’। इसी प्रकार प्रत्यय, भाव निर्मिति, अलंकार, लय, ध्वनि, रीति, व्यक्ति वैशिष्ट्य, आवृत्ति, शब्द शक्ति, पर्याय वक्रता, पदोचित्य आदि शैलीय उपकरणों द्वारा चतुर्वेदीजी की गद्य भाषा का बारीक परीक्षण इस अध्याय में किया गया है। 

इसके बाद के नौ अध्यायों को मुख्यत: तीन भागों में बांट कर देखा जा सकता है। जिसके पहले भाग में साहित्यिक दृष्टि से एकदम अलग दो अध्याय हैं- ‘समय का यथार्थ परिसर जीवन और हिंदी उपन्यास’ और ‘शैक्षणिक परिसर का सुनामी’। विश्वविद्यालयी राजनीति और परिसर जीवन के यथार्थ को उद्घाटित करते ये दो अध्याय इस पुस्तक को भीड़ से अलग खड़ा कर देते हैं। विश्वविद्यालयी जीवन और उसके अपने समय के यथार्थ से टकराव को जिस भी उपन्यास ने दर्ज किया उसका खुलासा यह अध्याय अपनी मुक्त आलोचना के साथ करता है। यहीं सत्यकेतुजी उपन्यास विधा के प्रति अपना लगाव प्रकट करते हुए कहते हैं कि ‘जिंदगी में जो कुछ भी घटित होता है, वह चाहे कविता, नाटक या अन्य किसी साहित्यिक विधा की पकड़ से बच जाए, पर उपन्यास से बच निकलना संभव नहीं है। दरअसल, औपन्यासिक कलेवर ने तत्कालीन राजनीति के एक बड़े फलक को समेटते हुए लगभग हर समस्या से रूबरू होने की कोशिश की थी। फिर भी सत्यकेतुजी ने यह प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया है कि परिसर जीवन की चर्चा सातवें दशक तक आनुषंगिक रूप में होती रही। प्रेमचंद के उपन्यासों तक में परिसर जीवन प्राय: गायब है, लेकिन यहीं सातवां दशक परिसर जीवन में विक्षोभकारी बदलाव लेकर आया और आठवें-नौवें दशक तक वह अपनी चरम तक पहुंच गया। 

इसी संदर्भ में आलोचक ने ‘राग दरबारी’, ‘अपना मोर्चा’, ‘कांच घर’, ‘गुरुकुल’, ‘परिशिष्ट’, ‘चक्रव्यूह’, ‘समर शेष है’, ‘दीक्षांत’, ‘कितने नीलकंठ’ आदि उपन्यासों में परिसर जीवन पर आलोचनात्मक दृष्टि डाली है। परिसर जीवन से संबंधित इन उपन्यासों में कितना यथार्थ है या कितना भोंडा-सपाट अंकन है या बाहरी पक्ष के साथ-साथ इसने पात्रों की मानसिकता में कितना प्रवेश किया है, इसका मूल्यांकन ये अध्याय प्रस्तुत करते हैं। दरअसल, यह मूल्यांकन आलोचक के अकादमिक अनुभव और आलोचनात्मक विवेक दोनों को दर्शाता है। 

दूसरा खंड प्रेमचंद के पूरे साहित्यिक संसार को तीन अध्यायों में बांटता है, जो एक संक्षिप्त लेकिन असरदार प्रयास है। ये अध्याय प्रेमचंद के निबंध, अनुवाद, पत्रकारिता, नाटक, कहानी और उपन्यासों की रूपरेखा को भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के एक ब्योरे के रूप में पेश करते हैं। वे प्रेमचंद के उस रूप को प्रतिस्थापित करने में भी सफल रहे हैं, जो राजनीतिक रूप से उतना ही प्रतिबद्ध रहा है जितना कि सामाजिक रूप से। वे प्रेमचंद के पात्रों के माध्यम से ही प्रेमचंद की उस मन:स्थिति को उद्घाटित करते हैं कि ‘यह अकर्मण्यता का समय नहीं है। इस समय तटस्थ बैठे रहना अपने देशवासियों पर घोर अत्याचार है।’ इतना ही नहीं आजादी की जंग पर केंद्रित तत्कालीन कहानियों का अतिरिक्त मूल्यांकन भी वे इसी के साथ करते हैं, जो इस तारतम्यता को कहीं अधिक यथार्थपरक बनाता है। 

पुस्तक का तीसरा खंड उपन्यास और कहानी के विकास की एक नई पड़ताल है, जिसमें मधुरेश की पुस्तक ‘हिंदी उपन्यास के विकास’ और ‘हिंदी कहानी के विकास’ पर दो समीक्षात्मक लेख हैं। यह लेख इस दृष्टि से भी उल्लेखनीय है कि यह इतिहास और विकास के फर्क को बाकायदा जानता और दर्ज करता है। इसी कारण आलोचक  को यह कहने में जरा भी झिझक नहीं है कि ‘ये पुस्तकें न ‘इतिहास’ हैं, न ‘विकास’।... ये ‘इतिहास’ लिखने और ‘विकास’ दिखाने वाले आलोचकों के लिए आधारभूत ग्रंथ बन सकती हैं।’ 

दरअसल, यह पुस्तक उपन्यास और कहानियों की उनके समसामयिक संदर्भों में एक विस्तृत पड़ताल है, जो रचना और रचनाकार दोनों को यथार्थ की तुला पर तौलती हुई आगे बढ़ती है। इन विधाओं के शिल्पगत परीक्षण से लेकर सामाजिक सरोकारों तक को जांचती है। पुस्तक का अंतिम पड़ाव भी जांच की इसी प्रक्रिया में ‘कहानी’ और ‘कथा’ के शिल्पगत मूलभूत अंतरों को दर्शाते हुए राहुल सांकृत्यायन और संजीव की कहानियों में सामयिक यथार्थ को जांचता चलता है। दरअसल, सत्यकेतु राहुलजी की कहानियों को जहां एक दृष्टि में उपन्यासों का ही लघु रूप मानते हैं, वहीं संजीव की कहानियों में उन्हें ‘कथा’ और ‘कहानी’ का घालमेल दिखाई पड़ता है। 

इस संदर्भ में वे लिखते हैं कि ‘कहानी में रचना के केंद्र में कोई एक संवेदना या भाव या अनुभूति का एक क्षण होता है। उसमें कथा का अंश नाममात्र का ही होता है।’ यहीं वे ‘कथा’ की संभावित विशेषताएं भी स्पष्ट करते हैं- मसलन, कौतूहल पैदा करने के लिए रहस्य सृष्टि, संयोगाधृत घटनाएं, रोमांच, रोमांस, नाटकीयता आदि। इन शिल्पगत द्वंद्वों के बावजूद वे अपने मूल्यांकन द्वारा सिद्ध करते हैं कि ‘वोल्गा से गंगा’, ‘बहुरंगी मधुपुरी’ और ‘सतमी के बच्चे’ राहुल सांकृत्यायन की समकालीन यथार्थ से संबद्ध मानवतावादी रचनाएं हैं। इसी प्रकार संजीव भी ‘समकालीन जीवन के अद्भुत चितेरे’ हैं। यह बात आलोचक ने संजीव की कहानियों में कहीं गहरे उतर कर कही है। संजीव की आदिवासी, नक्सलवादी, दलित संवेदना, अति पिछड़े और पूंजीवादी सभ्यता को आंख तरेरती कितनी ही रचनाओं को केंद्र में रख कर सत्यकेतुजी इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ‘समाज की शायद ही कोई ऐसी समस्या हो, जिस पर संजीव की पैनी निगाह न पड़ी हो।’ 

कुल मिला कर पुस्तक अपने पंद्रह अध्यायों में इसी प्रकार के सर्वेक्षणों से गुजरती है। पुस्तक का हर अध्याय किसी लेख या निबंध से अधिक प्रस्तुत विषय पर एक गहन शोध-सा लगता है। शायद यही कारण है कि यह पुस्तक साहित्य की बारीक से बारीक सूचनाओं, तथ्यों और संवेदनाओं को मापती-तौलती चलती है। 


हिंदी कथा साहित्य- एक दृष्टि: सत्यकेतु सांकृत; राधाकृष्ण प्रकाशन, 7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 350 रुपए। 


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निनाद: हिंदी बनाम उर्दू PDF Print E-mail
Friday, 12 September 2014 18:47

कुलदीप कुमार

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ का फैसला आ गया है कि उत्तर प्रदेश सरकारी भाषा (संशोधन) कानून 1989 संविधानसम्मत है और राज्य में उर्दू को सरकारी कामकाज की दूसरी भाषा घोषित करने का फैसला सही है। इस मामले में ध्यान देने की बात है कि कानून को संविधान के विरुद्ध बता कर मुकदमा लड़ने वाला कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन था। यानी हिंदी-उर्दू की लड़ाई अभी तक जारी है। उर्दू अगर उत्तर प्रदेश में सरकारी कामकाज की दूसरी भाषा बन जाती है, तो इससे हिंदी को क्या नुकसान होने वाला है? 

आजादी मिलने के बाद उत्तर प्रदेश ही नहीं, समूचे भारत की राजभाषा का दर्जा पाने के बाद भी हिंदी को उर्दू के कारण इतनी असुरक्षा क्यों महसूस होती है? क्या इस ग्रंथि के पीछे केवल ऐतिहासिक कारण हैं या सांप्रदायिक सोच भी है, क्योंकि उर्दू अब केवल मुसलमानों की भाषा बन कर रह गई है? दूसरे, यह देखना भी जरूरी होगा कि क्या बार-बार सुना जाने वाला यह विलाप वास्तविकता पर आधारित है कि स्वाधीन भारत में उर्दू की हालत बहुत खराब है? 

2001 में हुई जनगणना में जो आंकड़े सामने आए उनसे पता चलता है कि बाईस अनुसूचित भाषाओं में हिंदी, बांग्ला, तेलुगू, मराठी और तमिल के बाद उर्दू छठे स्थान पर है। यानी वह गुजराती, कन्नड़, मलयालम, ओड़िया, पंजाबी और असमिया से ऊपर है। 2001 की इस जनगणना का यह भी कहना है कि पूरे देश की आबादी का 5.01 प्रतिशत उर्दूभाषी था और पांच करोड़ पंद्रह लाख व्यक्तियों ने उर्दू को अपनी मातृभाषा के रूप में दर्ज कराया था। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल-ये दस राज्य ऐसे हैं जिनमें पूरे देश में उर्दू बोलने वालों की संख्या के एक प्रतिशत से अधिक लोग रहते हैं। इनमें भी उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और झारखंड में देश की कुल उर्दूभाषी आबादी का 85.8 प्रतिशत लोग रहते हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में उर्दूभाषियों की संख्या देश की कुल उर्दूभाषी आबादी के एक चौथाई से भी अधिक है। 

जनगणना से एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी पता चली है कि हालांकि भारत में रहने वाले सभी मुसलमानों की भाषा उर्दू नहीं है, लेकिन केवल मुसलमानों ने उर्दू को अपनी मातृभाषा के रूप में दर्ज कराया है। यानी उर्दू का मुसलिम समुदाय के साथ नाता वास्तविक है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और पूरी बीसवीं सदी का इतिहास साक्षी है कि हिंदी और उर्दू के कंधों पर बंदूक रख कर हिंदू और मुसलिम सांप्रदायिकता ने अपनी लड़ाइयां लड़ी हैं। लेकिन क्या अब समय नहीं आ गया, जब इस निरर्थक झगड़े को समाप्त किया जाए और लोकतांत्रिक भारत में हिंदी के साथ-साथ उर्दू को भी उचित स्थान दिया जाए? 

हिंदी और उर्दू को एक ही भाषा की दो शैलियां या जुड़वां बहनें कहने वालों की भी कमी नहीं है। क्या ऐसी स्थिति स्वीकार्य हो सकती है, जिसमें एक शैली या एक बहन सिंहासन पर बैठी हो और दूसरी को अपने अस्तित्व के लिए लड़ना पड़ रहा हो? दरअसल हिंदी और उर्दू को एक ही भाषा की दो शैलियां कहने के पीछे भी कई बार यह दृष्टि होती है कि एक भाषा के रूप में उर्दू का स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है और वह तो खड़ी बोली हिंदी की ही एक शैली है। लेकिन 1932 में प्रकाशित पुस्तक ‘हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी’ में पद्मसिंह शर्मा ने इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया था कि ‘हिंदी-उर्दू बिल्कुल जुदा दो भाषाएं बन गई हैं।... प्रचलित ठेठ हिंदी शब्दों का बहिष्कार और उनकी जगह अरबी, फारसी या संस्कृत शब्दों की भरमार भाषा-भेद का एक प्रधान कारण है। यह प्रवृत्ति पहले नहीं थी।’ 

जिस तरह हिंदी के झंडाबरदार उसकी प्रगति की राह में रोड़े अटकाते रहे हैं, उसी तरह उर्दू के हिमायती उसे आगे बढ़ने से रोकते रहे हैं। दोनों की पूरी कोशिश एक ऐसी भाषा गढ़ने की है जिसे कम से कम लोग समझ सकें यानी जो भाषा के उद्भव की बुनियादी शर्त के ही विरुद्ध हो। हमें भाषा की जरूरत इसलिए पड़ती है ताकि हम दूसरों के साथ संवाद कर सकें, उनकी बात समझ सकें और अपनी बात समझा सकें। लगभग बारह-तेरह साल पुरानी बात है। मुझे पता चला कि इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में उर्दू पर एक सेमिनार हो रहा है, जिसमें देशी-विदेशी विद्वान, कुछ राजनेता और हिंदी के जाने-माने साहित्यकार राजेंद्र यादव भाग ले रहे हैं। उत्सुकतावश मैं भी चला गया। 

सैयद शहाबुद्दीन समेत कई मुसलिम वक्ता बोले, जिनमें खुर्शीद आलम खां भी शामिल थे। मैं औरों की बात को काफी कुछ समझ गया, लेकिन खुर्शीद आलम खां का अधिकांश भाषण मेरे पल्ले नहीं पड़ा, क्योंकि वे इतनी अरबी-फारसी में लिपटी उर्दू बोल रहे थे जिसे समझना मेरे लिए संभव नहीं था। जब राजेंद्र यादव ने बोलना शुरू किया, तो उपस्थित उर्दूप्रेमी समुदाय ने टोका-टोकी शुरू कर दी। वापस आते हुए मैं पूरे रास्ते सोचता रहा कि क्या इसी रास्ते पर चल कर उर्दू तरक्की करेगी? 

मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि खड़ी बोली के स्वभाव के विपरीत उर्दू वाले एकवचन को बहुवचन बनाते समय फारसी की नकल क्यों करते हैं? खुर्शीद आलम खां का पहला वाक्य ही था: ‘अभी आप हजरात ने जो तकारीर सुनी...’। और मैं सोचने लगा कि तकारीर की जगह तकरीरें क्यों नहीं कहा जा सकता, जो खड़ी बोली की प्रकृति के अनुरूप है। अक्सर आपने लोगों को ‘हालातों’ बोलते हुए सुना होगा। दरअसल, वे खड़ी बोली के स्वभाव के अनुसार हालात को एकवचन समझ कर उसका बहुवचन बनाते हैं। हिंदी और उर्दू संभवत: विश्व की अकेली ऐसी दो भाषाएं हैं, जिनका भाषिक आधार एक है। ‘मैं बाजार जा रहा हूं’ हिंदी का वाक्य है या उर्दू का? 

फिराक गोरखपुरी का कहना था कि भाषा क्रियापद के कारण अलग होती है और अगर किसी वाक्य में अधिकांश शब्द किसी दूसरी भाषा के हों, तो भी उसे उसी भाषा का वाक्य माना जाएगा जिस भाषा के क्रियापद का इस्तेमाल किया गया है। इस दृष्टि से हिंदी और उर्दू वास्तव में एक ही भाषा हैं। लेकिन यह भी वास्तविकता है कि उनका साहित्यिक और वैचारिक रूप एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हो चुका है और अब घड़ी की सुइयों को पीछे नहीं घुमाया जा सकता। लेकिन इस बात की कोशिश तो की ही जा सकती है कि इन दो रूपों के बीच का फासला जितना कम किया जा सके, किया जाए। और इसके लिए हिंदीवालों और उर्दूवालों, दोनों को कोशिश करनी होगी। 

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जब 1974 में भारतीय भाषा केंद्र खुला, तो उसमें हिंदी और उर्दू के दो प्रख्यात आलोचक- नामवर सिंह और मुहम्मद हसन- प्रोफेसर बन कर आए। उन्होंने जो पाठ्यक्रम तैयार किया, वह बेहद आधुनिक और लगभग क्रांतिकारी था। हिंदी के विद्यार्थियों के लिए उर्दू सीखना और उसके बेसिक कोर्स में उत्तीर्ण होना अनिवार्य था और उर्दू के विद्यार्थियों के लिए हिंदी का। आज भी शायद ही देश का कोई और विश्वविद्यालय हो जहां ऐसी व्यवस्था है। 

क्या उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में पहली कक्षा से ही स्कूली बच्चों को हिंदी और उर्दू- दोनों भाषाएं नहीं पढ़ाई जा सकतीं? दोनों भाषाओं का ज्ञान ही उन्हें इस क्षेत्र की गंगा-जमुनी कही जाने वाली संस्कृति से परिचित करा सकता है। इस बात से शायद ही कोई इनकार कर सके कि उर्दू जानने वाले हिंदी लेखकों का गद्य बहुत साफ-सुथरा होता है, क्योंकि उसमें दोनों भाषाओं के शब्द इस तरह मिल कर आते हैं जैसे दूध में चीनी। प्रेमचंद, शमशेर और नामवर सिंह का गद्य इसकी मिसाल है। उर्दू की जानकारी के अभाव में हिंदी वाली ‘खुलासा’ और ‘खिलाफत’ जैसे शब्दों को उन अर्थों में इस्तेमाल करते जाएंगे, जिन्हें सुन कर उर्दू वाले गश खाकर गिर पड़ें। 


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अप्रासंगिक: सोचने की जिम्मेदारी PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:46

अपूर्वानंद

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: ‘‘यह एक दिलचस्प संयोग है कि स्थापित व्यवस्था के प्राय: सभी पक्षों में सोचने का फिजूलपन एक तरह से मूल प्रतिज्ञा है। जातिप्रथा, नौकरशाही, गोहत्या विरोध, सांप्रदायिक दंगे- इन सबकी पकड़ हिंदुस्तानी नागरिक पर इसलिए है कि उसने सोचना फिजूल मान लिया है। विवेक की ओर हल्की कोशिश भी इन पर, यानी स्थापित व्यवस्था पर चोट करती है। उस समाज में जिसमें अधिकतर लोगों को सिर्फ अविवेक और अबुद्धि के कारण अमानवीय जिंदगी बिताने, ‘मनुष्य से एक दर्जा नीचे’ रहने को बाध्य होना पड़ता है, सोचने को फिजूल मानना (भले ही इस धारणा में कितना ही विद्रोह लटका हो) इस अमानवीयता का समर्थन करना है, स्थापित व्यवस्था को मुंहमांगा सहयोग देना है, उस सबके प्रति सहानुभूति रखना है, जो हमारे जीवन में मनुष्य विरोधी है।’’ 

तकरीबन पचास साल पहले अशोक वाजपेयी ने युवा लेखन की क्रांतिकारी मुद्रा के पीछे छिपी प्रतिक्रियावादिता का पर्दाफाश करते हुए विचारों से विदाई नामक लेख में यह लिखा था। जो लेखन ऊपर-ऊपर व्यवस्था पर आक्रमण करता हुआ दीखता है, दरअसल दकियानूसीपन से ग्रस्त है, स्त्री-विरोधी है और पुरुषत्व के अहंकार की अभिव्यक्ति है, यह अशोकजी ने तत्कालीन युवा कविता की पड़ताल करते हुए लिखा। 

सोचना सिर्फ लेखकों के लिए आवश्यक नहीं। बचपन से ही हमें बताया गया है कि मनुष्य अन्य प्राणियों से इस कारण अलग है कि वह सोचता है। वह विचारशील प्राणी है। लेकिन क्या यह बात आमतौर पर सही है? क्या सोचना मनुष्य के लिए इतना ही सहज है? क्या सभी समाज और समाज का हर सदस्य सोचने का काम करता है? उससे एक कदम आगे बढ़ कर इस पर विचार करना व्यर्थ न होगा कि क्या हर कोई सोचने को अपना दायित्व मानता है? 

सोचना स्वाभाविक क्रिया नहीं है। अगर सामाजिक घटनाओं का अध्ययन किया जाए और उनमें लोगों की भूमिका पर विचार किया जाए तो पाया जा सकता है कि प्राय: लोग सोचने से भागते हैं। सोचने में मेहनत लगती है। सोचने के लिए हमें अपने तात्कालिक परिवेश से बाहर निकलना पड़ता है। चीजों और घटनाओं के बीच के उस संबंध का उद्घाटन करना पड़ता है, जो हमेशा जाहिर नहीं होता। सोचने के क्रम में ऐतिहासिकता के बोध का उदय होता है और हम परिप्रेक्ष्य हासिल करते हैं। 

परिप्रेक्ष्य उपलब्ध करना इतना आसान नहीं। चित्रकला या कला मात्र के इतिहास से परिचित व्यक्ति को यह समस्या मालूम है। मनुष्य द्विआयामिता की अपनी सीमा का अतिक्रमण करके जिस दिन तीसरा आयाम उद्घाटित कर लेता है उस दिन से उसके लिए कई समस्याएं भी खड़ी होने लगती हैं। द्विआयामिता अगर एक बंधन है तो दूसरी तरफ उसमें इत्मीनान भी है। वह एक सुरक्षित घेरा है। इस पर हमने गौर नहीं किया है कि हमारे व्यक्ति बनने और आधुनिकता की यात्रा में परिप्रेक्ष्य की इस खोज ने कैसी भूमिका का निर्वाह किया है। 

परिप्रेक्ष्य को दूसरे शब्दों में गहराई भी कह सकते हैं। तीसरे आयाम ने मानवीय दृष्टि को गहराई दी। और दूरी का एक बोध भी। इसके बाद से ही हम सतहीपन को बुरा मानने लगे हैं और उसे हीनतर मानते हैं, जो मात्र सतह देख पाता है। 

तीसरे आयाम के बाद काल का एक चौथा आयाम भी उद्घाटित किया गया, जिसके बिना आइन्स्टीन का सापेक्षिकता का सिद्धांत संभव न था। यह मानवीय संज्ञानात्मकता को समझने के लिहाज से क्रांतिकारी आविष्कार था। काल या समय के आयाम की संवेदना के अभाव में दृष्टि संकुचित रहती है और समझ अपूर्ण। 

यह पूरा संघर्ष, जैसा क्रिस्टोफर टाइलर अपने एक निबंध में कहते हैं, प्रेरणा और रेखागणितीय विश्लेषण के बीच का संघर्ष है। थोड़ा सरलीकृत तरीके से कहें तो यह सहज बोध और विश्लेषणात्मक बुद्धि के बीच का संघर्ष है। मानवीय चिंतन के इतिहास में गणितीय या रेखागणितीय चिंतन को सर्वश्रेष्ठ माना जाता रहा है और ज्ञान का प्रत्येक क्षेत्र उस क्षमता को प्राप्त करने की स्पर्द्धा करता रहा है, लेकिन हम इतिहास से ही जानते हैं कि वह इतना आसान नहीं रहा है। 

परिप्रेक्ष्य के साथ ही एक अन्य महत्त्वपूर्ण बात है, दृष्टिकोण और दृष्टिपथ। दृश्यकला को इनके संबंध को ठीक-ठीक समझने में सदियों की यात्रा करनी पड़ी। क्या कलाकृति में एक ही केंद्रीय बिंदु होगा? और वह कहां होगा? केंद्रीय अगर है तो किसकी अपेक्षा? इस केंद्रीयता को प्राप्त करना जितना जरूरी था और उसके लिए जो संघर्ष किया गया उससे ज्यादा उस केंद्रीयता से मुक्ति प्राप्त करने के लिए। यह क्या आजादी है, लचीलापन है या असल में किसी केंद्रीय बोध का अभाव है? 

बीसवीं सदी ने एक वचन की जगह परिप्रेक्ष्यों के संदर्भ का ध्यान रखना उचित समझा। इसे एक तरह से जटिलता के तत्त्व का प्रवेश भी कह सकते हैं। 

परिप्रेक्ष्य, दृष्टिकोण और विश्लेषण के बोध से युक्त व्यक्ति के लिए सोचना इतना सरल नहीं, उसमें समय लगता है और श्रम भी। इसी वजह से उसके लिए किसी चीज पर फैसला सुना देना इतना आसान नहीं रह जाता। आंख के बदले आंख, हाथ के बदले हाथ और जान के बदले जान का सिद्धांत इसी कारण अब स्वीकार्य नहीं लगता। यह भी अगर आपने आंख के आगे हत्या होते देखी भी हो तो आपका वर्णन ही उसके लिए जिम्मेदारी तय करने में आखिरी सबूत हो, आवश्यक नहीं। 

बीसवीं सदी के इतिहास ने ही बताया है कि जब-जब परिप्रेक्ष्यों, दृष्टिबहुलता, विश्लेषणात्मकता और जटिलता के प्रति हम उदासीन होने लगते हैं, तब-तब हम अपनी आजादी खोने लगते हैं। आश्चर्य नहीं कि सत्ता मात्र सरल व्याख्या के प्रति पक्षपाती होती है और निरंकुशता तब तक संभव नहीं जब तक हर व्याख्या बिल्कुल सतह पर न हो। सोचना इसीलिए मानवीय उत्तरदायित्व से जुड़ा मसला है और वह सरल नहीं है। अशोक वाजपेयी ने ठीक ही कहा था कि सोचना अपने आप में यथास्थितिवाद पर चोट करता है। सोचना हर किसी की जिम्मेदारी है। सोचना अगर अधिकार है तो जिम्मेदारी भी। इसे हम किसी और के हवाले नहीं कर सकते। 

यह विचारणीय है कि सोचने की बुनियादी इकाई क्या होगी? व्यक्ति, समुदाय या व्यापक अर्थ में समाज? व्यक्ति के बदले समाज, वह किसी भी प्रकार का क्यों न हो, क्या सोचने का यह काम कर सकता है? यह इसलिए भी कि सोचना एक नैतिक कार्य भी है। और सोचने के अपने परिणाम हैं। हर कार्य किसी विचार-प्रक्रिया का फल है। जब हम किसी कार्य को अविचारित कहते हैं तो क्या यह कहते हैं कि उस क्षण विचार स्थगित कर दिया गया था? या यह कि वह विचार, जो इस कार्य की ओर ले गया, दोषपूर्ण था? 

बीती सदी को जनसंहारों की सदी कहा जा सकता है। ध्यान करें तो मालूम होता है कि प्राय: हर धार्मिक और सांस्कृतिक समुदाय के अपने-अपने जनसंहार हैं। एक सदी पहले लाखों आर्मेनियायियों के, जो प्राय: ईसाई थे, जनसंहार की जिम्मेदारी अब तक तुर्की या इस्लामी दुनिया नहीं ले सकी है। यहूदियों के जनसंहार की याद को तो जीवित रखा जा सका है, लेकिन उसकी जिम्मेदारी हिटलर पर मढ़ कर पश्चिमी, ईसाई समाज ने अपनी आत्मा को समझा लिया है। इसका उत्तर अब तक वह नहीं खोज पाया है कि क्यों यूरोप यहूदियों को जगह नहीं दे पाया और क्यों उन्हें उसने अरबों पर थोप दिया। अब वे ही यहूदी फिलस्तीनी मुसलमानों के एक अधिक व्यवस्थित जनसंहार में लिप्त हैं और मजा यह कि सूए संहार कहने पर खफा हो उठते हैं। 

भारत को, और उसमें भी हिंदुओं को यह खुशफहमी रही है कि वे किसी भी अन्य समाज के मुकाबले अधिक मानवीय और उदार हैं। जयरुस बानाजी ने ध्यान दिलाया है कि हिंदुओं ने जनसंहार की पद्धति बदल दी है। छोटे-छोटे संहारों का एक सिलसिला है, जो आजादी के बाद से चला आ रहा है, जिसमें वे हमलावर रहे हैं। उनकी पूरी शृंखला मिल कर जनसंहारात्मक हो उठती है।

थियोडोर अडोर्नो और उनके मित्रों ने इस समस्या पर विचार किया कि जनसंहारों से कैसे बचा जा सकता है? उनका सुझाव है कि यह तभी संभव है, जब प्रत्येक व्यक्ति और व्यक्तियों के समूह के तौर पर समाज सोचने के कार्य को अनिवार्य माने। इसका आशय यह है कि कोई भी कदम सोचने की लंबी, श्रमसाध्य प्रक्रिया के बिना न उठाया जाए। सोचना अनिवार्य है और वह व्यक्तिगत जिम्मेदारी का मामला है, शिक्षा जब तक इस विचार को सहज बोध का अंग नहीं बना देती, अपना काम नहीं करती। 


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प्रसंग: काजर की कोठरी में धवल सयाने PDF Print E-mail
Friday, 12 September 2014 18:44

सुधीर चंद्र

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: हम अपनी कहानी कैसे कहते हैं वह हमारे बारे में बहुत कुछ बता देता है। उससे बहुत ज्यादा जो हम समझते हैं हम बता रहे हैं, और उससे बहुत अलग भी जो हम बताना चाह रहे हैं। बड़ा जोखिम का काम होता है आत्मकथा लिखना। हम बताने कुछ चलते हैं, बता बैठते हैं कुछ और। बेनकाब करने निकलते हैं दूसरों को, हो जाते हैं बेनकाब खुद। कुंवर नटवर सिंह की ‘वन लाइफ इज नॉट इनफ’ में कुछ ऐसा ही हो गया है। 

अफलातून के प्रसिद्ध कथन ‘अपरीक्षित जीवन जीने योग्य नहीं है’- से अपनी कहानी का श्रीगणेश कर, नटवर सिंह शुरू में ही हमें बता देते हैं कि वह सत्य और साहस के पुजारी हैं। कहीं बीच में कहते हैं कि वह असल भरतपुर वाले हैं, और अंत में घोषणा करते हैं: ‘मेरी शिराओं में मेरे पूर्वजों का रक्त प्रवाहित होता है।’ इसी के साथ, यह बताने के बाद कि राजाजी न्यूयार्क में उनके मेहमान रहे थे कुछ दिनों, नटवर सिंह कहते हैं: ‘मुझे विजडम धीरे-धीरे मिली; इसमें से कुछ निश्चय ही राजाजी की मारिफत आई।’ 

अब जबकि कोई व्यक्ति ‘वाइज’, सच्चा और साहसी होने का दावा करे और अपने लंबे सार्वजनिक जीवन का हमारे सामने परीक्षण करे तो उसकी अनदेखी तो नहीं होनी चाहिए। हुई भी नहीं। बड़ी चर्चा हुई इस किताब पर। पर सारी चर्चा सिमटी रही इस पर कि सोनिया गांधी के बारे में नटवर सिंह क्या कह रहे हैं। 

सच यह है कि कुछ विशिष्ट ब्योरों के अलावा इस किताब में कुछ भी ऐसा नहीं है, जो सोनिया गांधी के चरित्र, स्वभाव और उनकी राजनीतिक उपस्थिति के बारे में कोई नई रोशनी डालता हो। न ही उन ब्योरों में ऐसा कुछ है कि हाड़-मांस की जीती-जागती सोनिया गांधी का थोड़ा भी आभास करा दे हमें। 

अगर कोई दिखाई देता है जीता-जागता सोनिया के वर्णन के दौरान तो वह हैं खुद कुंवर नटवर सिंह। और जैसे वह दिखाई देते हैं सोनिया को हमें दिखाने के दौरान, वैसे ही अपनी पूरी कहानी में दिखाई देते रहते हैं। बड़ी भयंकर आलोचना है सोनिया की इस किताब में। पर गौर करने की बात यह है कि पूरी किताब में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है जब नटवर सिंह ने इशारे से भी सोनिया को जताया हो कि वे गलत काम कर रही हैं। अंदर ही अंदर जो भी सोचा हो- या आज सोचते हैं कि तब सोचा था- प्रसन्न वदन ठकुरसुहाती करते रहे। मसलन, यह बताने के बाद कि सोनिया गांधी ने कोई त्याग-व्याग नहीं किया था, अपने बेटे की जबरदस्त जिद की वजह से प्रधानमंत्रित्व छोड़ दिया था। नटवर सिंह बताते हैं कि उन्होंने एक दिन सोनिया से कहा कि इतिहास में सिर्फ दो लोगों ने ताज ठुकराया है और दोनों ही जन्म से इतालवी रहे हैं। सोनिया के पूछने पर कि दूसरा कौन था, नटवर सिंह ने कहा: ‘जूलियस सीज़र।’ 

मजे की बात यह है कि इस घटना का जिक्र करते हुए नटवर सिंह कहते हैं कि वे सोनिया की टांग खींच रहे थे। मान भी लें कि यही- या ऐसा भी- भाव था उनका, तो भी जिस तरह का रिश्ता दोनों के बीच उभर कर आता है इस किताब में, उससे यही लगता है कि सारी बात कुछ ऐसे अंदाज में कही गई होगी कि कहने वाला टांग खींच ले और सुनने वाले की प्रशंसा हो जाए। बरसों विदेश सेवा में रह कर इतनी कूटनीति तो आ ही गई होगी। 

आ ही नहीं गई थी, खासी महारथ भी हासिल हो गई थी। काफी जल्दी ही। 1969 की बात है। नटवर सिंह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अफगानिस्तान यात्रा में उनके साथ थे। एक दिन इंदिरा गांधी इनको लेकर ड्राइव के लिए निकल पड़ीं। काबुल से कुछ मील दूर उन्हें एक भग्न इमारत दिखाई दी। पता लगा कि यह बाग-ए-बाबर है। इंदिरा गांधी बाबर की कब्र को देखने के लिए बढ़ लीं। कब्र के आगे मौन ध्यानमग्न होने के बाद उन्होंने नटवर सिंह से कहा: ‘इतिहास से आज मुठभेड़ हुई है मेरी।’ ‘और मेरी दो’, तपाक से बोले नटवर सिंह। ‘क्या मतलब?’ जवाब था: ‘भारत की महारानी के साथ बाबर को नमन करने का सौभाग्य मिला है मुझे आज।’ 

भारत की महारानी! कुछ ही साल बाद महारानी ने आपातकाल की घोषणा कर दी। नटवर सिंह उस वक्त लंदन में उप उच्चायुक्त थे। कोई वहां आपातकाल के पक्ष में कुछ सुनने को तैयार नहीं था। असंभव को संभव बनाने की कोशिश में लगे रहे नटवर सिंह उच्चायुक्त बीके नेहरू के साथ। जब आपातकाल हट गया तब लगा कि अपनी आत्मा को दबाए रहे थे उस दौरान। 

अपनी इस कहानी में भी, आज सैंतीस साल बाद, कह रहे हैं कि आपातकाल ही एक दौर है उनकी जिंदगी का जिसे वह गर्व से नहीं देख सकते। इस पर अविश्वास किए बगैर, और बाकी कहानी के परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, ऐसा महसूस होता है कि आपातकाल को लेकर हुई उनकी परेशानी खास गहरी है नहीं। सोचें तो यह तथ्य बहुत महत्त्वपूर्ण बन जाता है कि आपातकाल पर लिखा गया अध्याय शुरू ही होता है पीएन धर की पुस्तक, ‘इंदिरा गांधी, द इमरजेंसी ऐंड इंडियन डिमॉक्रेसी’, से एक लंबे उद्धरण से। यह कहते हुए कि इस विषय पर धर की पुस्तक सबसे ज्यादा प्रामाणिक और तथ्यगत है, नटवर सिंह इस उद्धरण के सहारे हमें समझाते हैं कि अगर इमरजेंसी का मतलब है उस सिद्धांत- कानून का शासन- का धीरे-धीरे संकुचित होना जो लोकतंत्र का आधार है, तो यह सिलसिला 26 जून, 1975 से बहुत पहले ही शुरू हो गया था। 26 जून को जो हुआ वह सिर्फ इतना था कि यह सिलसिला नाटकीय ढंग से लोगों की चेतना में आ टपका। पीएन धर इंदिरा गांधी के सलाहकार थे, और बहुत चतुर व्यक्ति थे। इससे कुशल पैरवी आपातकाल की हो नहीं सकती। 

नटवर सिंह किस चेतन या अवचेतन प्रेरणा से इस पैरवी से शुरू करते हैं अगर आपातकाल से वह वाकई संतप्त हैं? इसी संदर्भ में एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य आता है उनकी कहानी में। 1981 के अंत में, जब वह पाकिस्तान में उच्चायुक्त थे, जिया-उल-हक के परेशान होने पर कि पाकिस्तान में चुनाव कराना बड़ी मुश्किल का काम था, नटवर सिंह ने जनरल जिया को समझाया था कि हिंदुस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाएं सुचारु रूप से चल रही थीं चूंकि इंदिरा गांधी ने उन्हें मजबूत कर दिया था। 

इसे ही परीक्षित जीवन कहते हैं? एक ऐसी चेतना का विकास कि अपने सही होने की संभावना विपरीत से विपरीत स्थिति में भी सदा बनी रहे। जब मनमोहन सिंह के लंबे प्रधानमंत्रित्व का लेखा-जोखा करना हो तो सारी गलती मनमोहन सिंह की हो। (वह प्रारंभिक भूल नहीं, जब सारी स्थिति को भलीभांति समझते हुए भी वे प्रधानमंत्री बनने को तैयार हो गए। चूंकि इसी किताब के मुताबिक, मनमोहनजी ने तो ना-नुच की थी उस वक्त, लेकिन नटवर सिंह ने सही तर्क देकर समझा लिया था उन्हें।) तब दस जनपथ या और मंत्रियों की कोई जिम्मेदारी न हो। लेकिन जब नटवर सिंह का अपना मामला आ फंसे, और उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगे, तो एक ही अचूक तर्क हो: ‘कांग्रेस में कुछ भी नहीं होता बिना सोनिया गांधी की जानकारी और हामी के।’ 

2014 में हुई कांग्रेस की अभूतपूर्व पराजय हो तो जिम्मेदार ठहरें सोनिया गांधी। तब न मनमोहन याद आएं और न ही अपने समेत वे सब जो सोनिया गांधी को संभव बनाए हुए थे। संभव बनाए हुए थे सब कुछ न सिर्फ सहते हुए, बल्कि सराहते हुए भी।

यह कैसे हुआ और किस तरह के लोगों का होना जरूरी था ऐसा होने के लिए, इसका खासा अंदाज तो सभी को है। पर इसको नजदीक से होता हुआ देखना चाहें तो नटवर सिंह की आत्मकथा में घटित होते देख सकते हैं। उस लिहाज से यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, हमारे शासक वर्ग की कहानी है। पढ़े-लिखे वर्ग की भी कहानी है कमोबेश। याद दिलाती है गांधी की चेतावनी की कि अंगरेजों से निजात पाने के बाद एक नई लड़ाई छेड़नी होगी। देश के पढ़े-लिखे लोगों के खिलाफ लड़ाई।

वे जिन्हें याद है अफलातून का कथन, उन्हें अपने आप से लड़नी होगी यही लड़ाई। अपनी विजडम, अपने साहस और अपनी सच्चाई का हवाला देते हुए नहीं, अपने प्रति अतिरिक्त संदेह बरतते हुए। ऐसा किया तो यह न कर पाएंगे कि मौत के इंतजार में जीवन की नश्वरता की दार्शनिक व्याख्या करें और नरेंद्र मोदी से समय मांग कर मिलने जाएं, बगैर स्वीकार किए कि मोह और तृष्णा अब भी जमे बैठे हैं अंदर। 

नटवर सिंह की कहानी का समापन इसी तरह होता है। सो, जिज्ञासा होती है कि एक जिंदगी किस कारण से नाकाफी लगती है उन्हें। कौन-सी अतृप्त इच्छाएं पैदा करती हैं इस नाकाफियत का अहसास?

अचरज न करिएगा अगर इस कहानी को पढ़ते-पढ़ते आप अपने अंदर के नटवर को टटोलने लगें। 


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