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निवेश की कूटनीति PDF Print E-mail
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Friday, 19 September 2014 12:19

जनसत्ता 19 सितंबर, 2014: चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भारत आने से ऐन पहले कहा था कि दोनों देश आपसी संबंधों का नया अध्याय लिखना चाहते हैं। स्वाभाविक ही इससे काफी आस जगी। पर क्या यह कहा जा सकता है कि वे उम्मीदें पूरी हुर्इं? चीन से भारत के लोगों की उम्मीदें आर्थिक संबंध और प्रगाढ़ करने के साथ-साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति और सीमा विवाद के संतोषजनक समाधान की भी रही हैं। जबकि चिनफिंग ने केवल भारत के बाजार में दिलचस्पी दिखाई और मोदी सरकार भी चीनी निवेश के लिए बेतरह लालायित दिखी। विचित्र है कि एक तरफ भारत में चीन से निवेश संबंधी समझौतों पर बातचीत और हस्ताक्षर हो रहे थे और दूसरी तरफ चीन के सैनिक लद्दाख के चुमार सेक्टर में घुसपैठ कर रहे थे। चीन की सैनिक टुकड़ी से पहले उसके कुछ नागरिक भी वहां घुस आए थे। चिनफिंग की यात्रा का पहला पड़ाव अमदाबाद रहा, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनका स्वागत करने पहुंचे। मोदी ने दोनों देशों के रिश्तों में बौद्ध प्रतीकों का स्मरण कराया, और उनके साथ चिनफिंग ने कुछ वक्त साबरमती आश्रम में भी बिताया। पर क्या वास्तव में बुद्ध और गांधी की कोई छाप कहीं दिखी? 

शिखर बैठक के बाद संवाददाताओं से बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सीमा विवाद का मुद््दा भी उठा था और उन्होंने लद्दाख में चीन की तरफ से हुए ताजा अतिक्रमण पर भारत की चिंता जताई। पर चीन के रुख में बदलाव का कोई संकेत नहीं दिखता। चिनफिंग ने कहा कि विकास के लिए शांति जरूरी है, पर साथ में यह जोड़ा कि सीमा का निर्धारण अभी तक नहीं हुआ है। यह सही है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर दोनों देशों के बीच दशकों से मतभेद हैं, पर क्या इतने अहम मौके पर भी चीन संयम नहीं बरत सकता? जिस समय भारत चिनफिंग के स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए हुए था उसी समय सीमा पर तनाव की घटनाएं क्या यह संदेश देने के लिए थीं कि चीन को सिर्फ भारत के बाजार की फिक्र है। अमदाबाद में तीन और फिर दिल्ली में भी दोनों पक्षों के बीच कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से ज्यादातर भारत में चीन के निवेश


से संबंधित हैं। चिनफिंग ने अगले पांच साल में यहां बीस अरब डॉलर के निवेश का इरादा जताया है। चीन गुजरात और महाराष्ट्र में औद्योगिक पार्क बनाएगा। इसके अलावा रेलवे और विनिर्माण में भी चीन के पूंजी लगाने का रास्ता खुल गया है। दोनों देशों का सालाना व्यापार पचहत्तर अरब डॉलर तक पहुंच चुका है और इस वक्त चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। लेकिन आपसी व्यापार का पलड़ा चीन की तरफ काफी झुका हुआ है। 

इस असंतुलन को दूर करने के भारत के सुझावों को चीन लगातार अनसुना करता रहा है। इसलिए कई लोगों का मानना है कि अगर इस तरह का बाहरी निवेश भारत के लिए जरूरी ही है, तो जापान उसका बेहतर विकल्प हो सकता था। मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान चीन को चेताया था कि वह अपनी विस्तारवादी नीति से बाज आए। पर प्रधानमंत्री का पद संभालते ही उन्होंने कहा कि उनकी विदेश नीति में चीन सर्वोच्च प्राथमिकता रखता है। अपनी जापान यात्रा के दौरान उन्होंने चीन के विस्तारवाद की आलोचना की। साफ है कि चीन की बाबत उनके वक्तव्यों में निरंतरता नहीं रही है। फिर, सवाल है क्या चीन भी भारत को वैसी ही प्राथमिकता देता है? सीमा विवाद को वह इतिहास की देन कह कर टाल देता है। इसी तरह तिब्बत से निकलने वाली नदियों को लेकर भी उसका रवैया बेहद चिंताजनक रहा है। सिर्फ कैलास मानसरोवर के लिए एक और रास्ता खुलने से ये चिंताएं कम नहीं हो जातीं। 


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