मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
दुखद अध्याय PDF Print E-mail
User Rating: / 2
PoorBest 
Friday, 19 September 2014 12:16

जनसत्ता 19 सितंबर, 2014: नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया की एक किताब से मेधा पाटकर पर लिखे पाठ को हटाया जाना एक अलोकतांत्रिक फैसला है। यह कदम इस ओर इशारा करता है कि सहिष्णुता और विचारों की स्वतंत्रता के लिए कैसी मुश्किलें खड़ी हो रही हैं। अमदाबाद स्थित एक स्वयंसेवी संगठन के एतराज पर वह अध्याय हटाया गया है। संगठन के कर्ताधर्ता वीके सक्सेना गुजरात सरकार की एक परियोजना से संबद्ध हैं और वे सरदार सरोवर बांध के मुखर समर्थक रहे हैं। चूंकि मेधा पाटकर ने विस्थापन और पर्यावरण के सवाल उठा कर सरदार सरोवर बांध के विरोध में लंबे समय तक आंदोलन चलाया, इसलिए वे इस परियोजना के पैरवीकारों को चुभती रही हैं। पर क्या यही उनसे संबंधित अध्याय को हटाए जाने का वाजिब आधार हो सकता है? अगर एनबीटी को ऐसी सामग्री में कुछ गलत लगता तो वह किताब में शामिल ही न की जाती। साफ है कि उसे ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर किया गया। सक्सेना के एतराज-भरे पत्र कोइसका आधार बनाया गया, पर दरअसल वह बहाना था। कोई भी सरकार महज एक व्यक्ति की चिट्ठी पर ऐसा निर्णय नहीं करती, जब तक खुद उसकी वैसी मंशा न रही हो। गौरतलब है कि एनबीटी ने बच्चों के लिए भारत की कुछ चर्चित शख्सियतों के बचपन के बारे में एक किताब छापने की योजना बनाई थी, ताकि बच्चे उनके जीवन से प्रेरणा ले सकें। उनमें सरोदवादक अमजद अली खां, शतरंज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद, लेखक रस्किन बॉण्ड आदि के साथ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में मेधा पाटकर भी शामिल थीं। मगर सक्सेना ने एतराज जताया कि मेधा पाटकर सामाजिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि राजनीतिक शख्सियत हैं और उनके बारे में किसी सरकारी संस्थान से   प्रकाशित होने वाली पुस्तक में पाठ शामिल नहीं किया जाना चाहिए। हैरानी की बात है कि सक्सेना की दलील को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आसानी से मान लिया और एनबीटी ने मंत्रालय के दबाव में झुकते हुए उनकी आपत्ति को उचित ठहरा दिया। 

नेशनल बुक ट्रस्ट सरकारी अनुदान से जरूर काम करता है, मगर वह एक


स्वायत्त संस्था है। ट्रस्ट की अपनी किताबों के प्रकाशन, वितरण, लेखक-पाठक संबंधों को विकसित करने से जुड़ी योजनाएं आदि इसके संपादकों और सलाहकारों के विवेक से तय होते रहे हैं। इसी का नतीजा है कि पुस्तकों के प्रकाशन के मामले में सरकारी संस्थाएं एनबीटी की साख के मुकाबले कहीं नहीं ठहरतीं। मेधा पाटकर से संबंधित अध्याय हटाए जाने से उसकी स्वायत्तता और प्रतिष्ठा आहत हुई है। अगर मेधा पाटकर आम आदमी पार्टी के बजाय सत्ताधारी पार्टी से जुड़ी होतीं, क्या तब भी यह अध्याय हटाया जाता? क्या उनके राजनीति में कदम रखने से नर्मदा बचाओ आंदोलन  का वह योगदान नजरअंदाज कर दिया जाना चाहिए, जो उसने विकास को नई कसौटियों पर कसने की जरूरत रेखांकित कर और  विस्थापन और पर्यावरण के सवालों को व्यापक विमर्श का विषय बना कर किया। भाजपा सरकारों के दौर में पाठ्यपुस्तकों, सरकारी संस्थाओं से प्रकाशित होने वाली पुस्तकों आदि में दक्षिणपंथी आग्रह प्रकट होते रहे हैं, जिन्हें लेकर कई बार विवाद पैदा हो चुके हैं। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी संस्थान जैसी संस्थाओं के पर तो पहले ही कतरे जा चुके थे। अब एनबीटी भी उससे बच नहीं पाया है। शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में इस कठमुल्लेपन को नहीं रोका गया तो उसका खमियाजा आने वाली पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ेगा। 


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?