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Friday, 19 September 2014 12:01

देवेंद्र सिंह सिसौदिया

 जनसत्ता 19 सितंबर, 2014: मध्यप्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित प्री-मेडिकल टेस्ट (पीएमटी) में हुए घोटाले में अभी तक लगभग साढ़े तीन सौ विद्यार्थियों की परीक्षा और करीब सत्तर छात्र-छात्राओं के प्रवेश को निरस्त कर दिया है। इनमें कुछ तो पाठ्यक्रम के दूसरे या तीसरे वर्ष में अध्ययनरत थे। कुछ बच्चे और उनके अभिभावक फरार हैं। सही है कि इस तरीके से प्रवेश पाने वाले विद्यार्थी इस डिग्री के योग्य नहीं थे। कमजोर व्यवस्था का फायदा उठा कर इन लोगों ने पैसे के बल पर प्रवेश पा लिया। लेकिन यह भी सच है कि वे बच्चे, जो जीवन के बहुमूल्य सोलह-सत्रह वर्ष कड़ी मेहनत करके आए थे, क्या दोषी हैं? संदेह के घेरे में आए विद्यार्थियों की दो-तीन श्रेणियां हो सकती हैं। पहली वह, जिसमें बच्चों को पता था कि वे यह परीक्षा पास नहीं कर पाएंगे। ऐसे में उन्होंने दलालों से संपर्क किया और व्यवस्था की कमजोरी का फायदा उठाते हुए किसी तरह टेस्ट पास कर प्रवेश पा लिया। दूसरे, वे छात्र-छात्राएं हैं, जिन्हें खुद कुछ पता नहीं था, लेकिन उनके अभिभावकों ने उच्च महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए दलालों से संपर्क किया और अपनी काली कमाई के सहारे उन्हें टेस्ट में पास कराया और प्रवेश दिला दिया। तीसरी श्रेणी उनकी है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शायद शामिल न हों, लेकिन शंका के घेरे में आ गए हैं। इन तीनों श्रेणियों के विद्यार्थी आगे के अध्ययन से वंचित हो गए हैं। इसमें जो भी दोषी हैं, उन्हें सजा मिलना चाहिए, लेकिन उन बच्चों की मनोदशा क्या होगी, जो किशोरावस्था से गुजर रहे हैं। जांच के बाद अगर पता चलता है कि वे दोषी नहीं हैं, तो उनके भविष्य का क्या होगा? 

किशोरावस्था में बच्चे अपनी स्वतंत्रता से विकास करने का प्रयास करते हैं। एक स्वस्थ सामाजिक वातावरण मिलने से किशोर अपने जीवन की सीढ़ियां ठीक से चढ़ पाता है। लेकिन इसके उलट अगर उसे नकारात्मक माहौल मिले, तो वह समाज के लिए समस्या भी बन सकता है। इस घोटाले के दायरे में आए लगभग सभी


बच्चे किशोरावस्था से गुजर रहे हैं। इनकी मन:स्थिति क्या होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है। सब जानते हैं कि हमारे यहां जांच और न्यायिक प्रकिया की चाल कितनी धीमी है। यहां त्वरित अदालतों में भी फैसले सत्तर-अस्सी सुनवाई के बाद एक-डेढ़ वर्ष में आते हैं। तो क्या इस लंबी प्रकिया और फैसले के इंतजार में ये किशोर अपने जीवन के निर्णायक समय को यों ही जाया होने दें? प्राकृतिक न्याय क्या इसकी इजाजत देता है? तो फिर क्या ऐसे उपाय हैं, जो इन बच्चों को झंझावात से बाहर निकाल सकें? 

कायदे से अलग से एक स्वतंत्र एजेंसी द्वारा फिर से इन सभी विद्यार्थियों की प्रवेश जांच परीक्षा ली जानी चाहिए और जो उसमें उत्तीर्ण होते हैं, उन्हें दोष मुक्त कर आगे का सफर तय करने का मौका दिया जाना चाहिए। एक और शर्त लगाई जा सकती है। इन किशोरों से ग्रामीण क्षेत्र में दस वर्ष तक सेवा करने का बांड भरवाया जाना चाहिए। इसके अलावा, जो अभिभावक दोषी करार दिए जाते हैं, उन्हें कानून के मुताबिक सजा दी जानी चाहिए। मेरा मकसद किसी भी तरह से किसी अपराध की वकालत करना नहीं है। लेकिन आमतौर पर किशोरावस्था से गुजर रहे या अभी-अभी इस उम्र से निकले बच्चों का यह अपराध ऐसा भी नहीं है, जिसके चलते उनका समूचा भविष्य बर्बाद कर दिया जाए। 


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