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पारदर्शिता की कमी पर केंद्र की खिंचाई PDF Print E-mail
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Friday, 19 September 2014 09:32



जनसत्ता ब्यूरो 

नई दिल्ली।  सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और सतर्कता आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव के लिए केंद्र की गुरुवार को खिंचाई की। इसके बाद सरकार ने आश्वासन दिया कि अदालत की सहमति के बगैर कोई अंतिम फैसला नहीं किया जाएगा। मुख्य सतर्कता आयुक्त और सतर्कता आयुक्तों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव का सवाल उठाते हुए अदालत ने कहा कि इससे पक्षपात और भाई-भतीजावाद को बढ़ावा मिलता है। अदालत ने जानना चाहा कि इन पदों के लिए सिर्फ नौकरशाहों का ही चयन क्यों होता है, आम आदमी का क्यों नहीं। 

प्रधान न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाले खंडपीठ ने कहा कि चयन प्रक्रिया तो निष्पक्षता की निशानी होनी चाहिए और मौजूदा व्यवस्था की आलोचना हो रही है क्योंकि इसमें पारदर्शिता का अभाव है। जजों ने कहा कि कोई भी व्यवस्था जिसमें चयन के लिए आंतरिक प्रक्रिया अपनाई जाती है उसकी पारदर्शिता के अभाव के लिए जनता आलोचना करती है। अदालत ने कहा कि देश में प्रतिभा का भंडार है और लोग पारदर्शिता चाहते हैं। आप क्यों ऐसी प्रक्रिया अपनाते हैं जिससे उन लोगों को मौका नहीं मिलता जो प्रतिभाशाली हैं। 

अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि जनता से आवेदन नहीं आमंत्रित किए जा सकते क्योंकि ज्यादातर लोग इस पद के लिए आवेदन करने के बजाय केंद्र द्वारा विचार करने को प्राथमिकता देते हैं।


उन्होंने कहा कि चयन प्रक्रिया पूरी होने में कम से कम एक महीना लगेगा। उन्होंने अदालत को भरोसा दिलाया कि इस मामले के शीर्ष अदालत में लंबित होने के दौरान नियुक्ति के बारे में कोई अंतिम फैसला नहीं किया जाएगा। शीर्ष अदालत ने अटार्नी जनरल की दलीलें सुनने के बाद केंद्र सरकार को सारे मामले में नौ अक्तूबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए सुनवाई 14 अक्तूबर के लिए स्थगित कर दी। 

रोहतगी ने चयन प्रक्रिया के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि कैबिनेट सचिव और 36 अन्य सचिव इस पद के लिए 120 नामों का प्रस्ताव करते हैं। इसमें से 20 नाम लिए जाते हैं और फिर पांच लोगों की सूची तैयार कर इसे चयन समिति के पास भेजते हैं। अदालत ने इसके बाद नामों को आगे प्रेषित करने के आधार के बारे में पूछा और कहा कि अलग-अलग सचिवों का नाम भेजने के लिए अलग-अलग पैमाना हो सकता है।     अदालत एक गैर सरकारी संगठन की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और सतर्कता आयुक्तों के पदों की रिक्ति के संबंध में प्रचार किए बगैर ही नियुक्ति प्रक्रिया में आगे बढ़ रही है। मुख्य सतर्कता आयुक्त प्रदीप कुमार 28 सितंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

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