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सिखों के तेवर से हरियाणा में कठिन हुई भाजपा की डगर PDF Print E-mail
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Friday, 19 September 2014 09:06



विवेक सक्सेना

नई दिल्ली। हालिया विधानसभा उपचुनावों में करारी मात के बाद अब भाजपा की जीत का अश्वमेघ घोड़ा हरियाणा में थमता नजर आ रहा है। इसकी वजह यह है कि अकाली दल से घनिष्ठ रिश्ते होने के बावजूद विधानसभा चुनाव में सिख मतदाता का रुख अभी साफ नहीं है। संभावना यही है कि सिख वोटर भाजपा और इनेलो को वोट नहीं देने वाला है। पहली बार राज्य में अकाली दल की भूमिका खत्म होती दिखाई पड़ रही है।

इस बार हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं। वहां इतने अजीबोगरीब राजनीतिक समीकरण बने हैं कि प्रमुख विपक्षी दलों- इनेलो व भाजपा दोनों को ही जबरदस्त झटका लगना तय माना जा रहा है। इन्हें अब तक इनेलों व भाजपा का समर्थक माना जाता था। इसकी वजह यह थी कि पहले ये दोनों दल मिलकर चुनाव लड़ते थे। दिवंगत देवीलाल तो प्रकाश सिंह बादल के पगड़ीबदल भाई रहे हैं, वहीं भाजपा और अकाली दल का काफी पुराना राजनीतिक गठबंधन चला आ रहा है। 

इस बार भी अकाली दल लोकसभा चुनाव में चाहता था कि भाजपा व इनेलो का गठबंधन हो जाए। पर भाजपा ने इस पर ध्यान नहीं दिया। इसकी कई वजहें रहीं। भाजपा को यह लग रहा था कि ओमप्रकाश चौटाला की दागी छवि के कारण उनके साथ गठबंधन करना ठीक नहीं होगा। लोकसभा चुनाव में अकाली नेताओं ने इनेलो के पक्ष में प्रचार किया। पर मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपना मास्टर स्ट्रोक खेल दिया। उन्होंने हरियाणा के लिए अलग गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी गठित करवा दी। इससे एक ओर राज्य के सिख खुश हो गए क्योंकि उन्हें अपने गुरुद्वारों का प्रबंध अपने हाथों में लेने का अधिकार मिल गया, वहीं इससे तिलमिला कर प्रकाश सिंह बादल व उनका दल खुद राज्य के सिखों के विरोध में उतर आए। उनके प्रतिशोध का आलम यह है कि उन्होंने हरियाणा गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के वरिष्ठतम पदाधिकारियों को तनखैया घोषित करवा दिया। 

मालूम हो कि राज्य में 72 गुरद्वारे हैं। इनकी सालाना आय 350 करोड़ रुपए है। इनके पास 6000 एकड़ बहुमूल्य जमीन है। इसकी कीमत करीब एक लाख करोड़ बताई जाती है। जब 1966 में हरियाणा पंजाब से अलग हुआ तब से ही ये गुरुद्वारे अमृतसर स्थित शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अधीन चले आ रहे थे, जिस पर


हमेशा से ही बादल गुट का कब्जा रहा है। सबको पता है कि पंजाब की राजनीति में गुरुद्वारों की बहुत अहम भूमिका रही है। यह कमेटी हरियाणा से 350 करोड़ रुपए बटोरने के बाद भी उन पर सिर्फ 30 करोड़ ही खर्च करती थी। यहां तक की वहां के अधिकांश कर्मचारी

तक पंजाब के ही होते थे। वह 100 से ज्यादा शिक्षण संस्थाएं चला रही है, पर हरियाणा में एक भी नहीं है। इससे हरियाणा के सिख अपने साथ सौतेला व्यवहार होने की शिकायत करते आए थे और अपनी अलग प्रबंधन कमेटी की मांग कर रहे थे। राज्य सरकार की ओर से कानून बना देने के बाद शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने पंजाब से सैकड़ों लोगों को हरियाणा के गुरुद्वारों पर कब्जा करने के लिए भेज दिया। टकराव इतना बढ़ा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया और उसने फिलहाल फैसला होने तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी किया है। 

पंजाब की अकाली सरकार हरियाणा के सिख नेताओं को प्रताड़ित कर रही है। एक प्रमुख अकाली नेता संत बाबा बलजीत सिंह दादूवाल के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज करके उन्हें गिरफ्तार किया जा चुका है। हरियाणा के सिख नेताओं का आरोप है कि यह सब बदला लेने की वजह से किया जा रहा है। उन पर दबाव डाला जा रहा है कि वे हरियाणा गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की सदस्यता से त्यागपत्र दे दें। हाल ही में उनके इस्तीफा देने की खबर भी छपवा दी गई, जिसका उनके वकील ने खंडन कर दिया। 

बहरहाल, इस विवाद के कारण न तो भाजपा कोई रुख साफ कर पा रही है और न ही इनेलो।  राज्य के सिखों में अकाली दल के खिलाफ नाराजगी बढ़ती जा रही है। अगर वे किसी भी दल के पक्ष में प्रचार करने आते हैं तो इससे वहां के सिख और भड़केंगे। हरियाणा गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने खुलकर चुनाव में कांग्रेस का समर्थन करने का एलान कर दिया है। इससे इनेलोे व भाजपा दोनों की ही करारा झटका लगा है। राज्य में सिख मतदाता सात फीसद हैं। कुरुक्षेत्र, करनाल, यमुनानगर, सिरसा जिलों के 25 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां जीत की कुंजी सिख मतदाताओं के हाथों में है। इसलिए इस चुनाव में उनकी भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती है।  

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