मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
आस और खटास PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Thursday, 18 September 2014 12:32

जनसत्ता 18 सितंबर, 2014: पांच रोज पहले हुए उपचुनावों के नतीजे भाजपा के लिए दोहरी परेशानी लेकर आए हैं। इन नतीजों ने जहां विपक्ष का हौसला बढ़ाया है, वहीं भाजपा के सहयोगी दलों खासकर शिवसेना को भी सीटों के बंटवारे में अपनी मांग पर अड़ने का नया तर्क मुहैया कराया है। ये परिणाम आते ही शिवसेना नेता रामदास कदम ने कहा कि इनसे उनकी पार्टी के रुख की पुष्टि होती है; भाजपा को इन नतीजों से सबक लेना चाहिए। भाजपा और शिवसेना का गठबंधन चार दशक पुराना है, किसी और पार्टी से भाजपा का साथ इतना लंबा नहीं रहा। दोनों के बीच सीटों को लेकर थोड़े-बहुत मतभेद पहले भी कई बार उभरे थे, पर उन्हें सुलझाने में कोई खास दिक्कत नहीं आई। दोनों का गठजोड़ इस सहमति पर चलता रहा कि लोकसभा सीटों में बड़ी हिस्सेदारी भाजपा की होगी और विधानसभा सीटों में शिवसेना की। फिर इस बार झगड़े की नौबत क्यों आई, और वह सुलट क्यों नहीं पा रहा है? दरअसल, लोकसभा चुनावों के बाद कई और राज्यों की तरह महाराष्ट्र में भी भाजपा की महत्त्वाकांक्षा बढ़ गई है। उसकी दलील है कि मई में हुए आम चुनाव में गठबंधन को मिली जीत मोदी लहर की देन थी। उन नतीजों के आधार पर वह महाराष्ट्र में पहले से ज्यादा विधानसभा सीटों पर लड़ना चाहती है। पर शिवसेना उसकी एक सौ पैंतीस सीटों की मांग मानने को कतई राजी नहीं है। 

शिवसेना खुद डेढ़ सौ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारना चाहती है। दोनों की दावेदारी की संख्या मिल कर दो सौ पचासी सीटों तक पहुंच जाती है। राज्य की दो सौ अट्ठासी विधानसभा सीटों में फिर इतनी सीटें कहां बचेंगी कि वे महायुति यानी लोकसभा चुनाव के समय बने अपने गठबंधन के बाकी सहयोगियों को संतुष्ट कर पाएं। इन सहयोगियों में स्वाभिमान शेतकरी संघटना, राष्ट्रीय समाज पार्टी, रामदास आठवले की आरपीआइ जैसे दल शामिल हैं। बेशक ये छोटे दल हैं, पर गठबंधन को दलितों और पिछड़ों के बीच स्वीकार्य बनाने में इनका साथ उपयोगी साबित हुआ। बहरहाल, भाजपा और शिवसेना के बीच सीटों को लेकर मची तकरार मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से भी जुड़ी हुई है। उद्धव ठाकरे चाहते थे कि उन्हें मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश कर चुनाव


लड़ा जाए। पर भाजपा इसके लिए तैयार नहीं है, क्योंकि वह मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी का मसला खुला रखना चाहती है। उसे लगता है यही मौका है जब वह राज्य में कनिष्ठ सहयोगी होने की विवशता से छुटकारा पा सकती है। पर उपचुनावों ने उसकी बढ़ी हुई दावेदारी को मुश्किल में डाल दिया है। उपचुनावों में भाजपा को पूरब में जरूर कुछ सफलता मिली, पर पश्चिम भारत में मोदी-कार्ड का जादू टूट गया है। 

गुजरात में भाजपा अपने कब्जे वाली तीन विधानसभा सीटें कांग्रेस के हाथों गंवा बैठी। जब मोदी के गृहराज्य में यह हाल हुआ, तो महाराष्ट्र में शिवसेना से ज्यादा सीटें छोड़ने के लिए वह क्या तर्क देगी! कुछ दिन पहले तक भाजपा के कुछ नेता यह दम भरते थे कि अगर उद्धव ठाकरे ने उनकी मांग नहीं मानी तो पार्टी चुनाव में अकेले उतर सकती है। पर अब साफ हो गया है कि उसने अकेले चलने का फैसला किया तो वह उसके लिए काफी जोखिम-भरा हो सकता है। यही बात शिवसेना की बाबत भी कही जा सकती है। इसलिए दोनों पार्टियां गठबंधन तोड़ने की हद तक शायद ही जाएं। उनके बीच सीटों का जैसा भी हिसाब बैठे, यह जाहिर है कि महाराष्ट्र में गठबंधन को अपने मन-मुताबिक आकार देने की भाजपा की योजना खटाई में पड़ गई है। यही नहीं, आगामी विधानसभा चुनावों में राज्यों के अपने समीकरण और स्थानीय कारक अहम भूमिका निभाएंगे। अब तक मोदी के आसरे रही भाजपा को इस लिहाज से भी नए सिरे से सोचना पड़ेगा। 


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?