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सहिष्णुता के शत्रु PDF Print E-mail
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Thursday, 18 September 2014 12:29

जनसत्ता 18 सितंबर, 2014: हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथी संगठनों का शैक्षणिक संस्थानों में जोर-जबर्दस्ती से अपने विचारों के अनुरूप नीतियां बनवाने, उन्हें लागू कराने का प्रयास पिछले कुछ सालों में ज्यादा उग्र हुआ है। जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें रही हैं वहां यह प्रवृत्ति और अधिक दिखती है, क्योंकि इन तत्त्वों को लगता है कि वे कुछ भी करें, उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली सरकार बनने के बाद ऐसे लोगों का हौसला और बढ़ा है। उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति जवाहरलाल कौल के एक बयान पर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं का हिंसक प्रदर्शन इसी की एक बानगी है। कुलपति ने अपील की थी कि जम्मू-कश्मीर में भयावह बाढ़ के चलते वहां से मध्यप्रदेश में पढ़ने आए विद्यार्थियों को आर्थिक परेशानी उठानी पड़ रही है, इसलिए मकान मालिक उनसे किराया वसूलने और विश्वविद्यालय-महाविद्यालय फीस आदि के मामले में रियायत बरतें। मगर कश्मीर और कश्मीरियों से हमेशा खार खाए संगठनों को यह बात नागवार गुजरी और उन्होंने कुलपति के दफ्तर में पहुंच कर उनसे बदसलूकी की और अपील वापस लेने की मांग करते हुए तोड़-फोड़ की। कुलपति को अस्पताल में भरती कराना पड़ा। ऐसी ही अपील प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके थे। उस पर उन्हें आपत्ति क्यों नहीं हुई? उन्माद में उन्होंने एक कश्मीरी पंडित को भी नहीं बख्शा, जिस समुदाय के हितों की रक्षा का झंडा वे उठाए रहते हैं!  

उज्जैन में किसी शैक्षणिक परिसर में इस तरह की यह पहली घटना नहीं है। कुछ साल पहले वहां के एक महाविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव में पक्षपात का आरोप लगा कर विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने प्रोफेसर सब्बरवाल को इस कदर मारा-पीटा था कि उनकी मौत हो गई। और भी कई मौकों पर ज्ञान, शील, एकता का नारा लगाने और गुरु-शिष्य की पवित्र परंपरा की दुहाई देने वाले संगठन का हिंसक चेहरा सामने आ चुका है। लोकसभा चुनावों से कुछ दिन पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने विद्यार्थियों को लैपटॉप वितरण में हो रही देरी को लेकर


वहां के एक प्रभारी अध्यापक को अपमानित किया। यह धमकी भी दी थी कि मोदी सरकार बनने के बाद उनकी बात न मानने वाले लोगों को ‘ठीक’ कर दिया जाएगा। 

अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सभी विश्वविद्यालयों से कहा है कि जम्मू-कश्मीर के विद्यार्थियों से फीस वसूली के मामले में रियायत बरतें। मगर उज्जैन की घटना में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई में कोताही बरती जा रही है। हालांकि दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है, पर टीवी और अखबारों में घटना के आरोपियों की तस्वीरें जाहिर होने के बावजूद पुलिस उन्हें नामजद करने से बच रही है। प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या के मामले में भी उसका यही रवैया देखा गया था। कुछ दिनों पहले वहां एक कश्मीरी छात्र को अज्ञात लोगों ने गोली मार दी थी, तब भी पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई। समझना मुश्किल है कि भाजपा की राज्य सरकार ने इस संबंध में कोई सख्ती क्यों नहीं बरती। इन घटनाओं में भाजपा की छात्र इकाई या फिर उसके आनुषंगिक संगठनों के कार्यकर्ता शामिल थे, इसलिए पुलिस ने उनके खिलाफ सख्ती बरतने से परहेज किया। शैक्षणिक संस्थाओं में इस तरह जहर बोने और संकीर्ण मानसिकता फैलाने के प्रयास क्या ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ और ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारों से मेल खाते हैं?  


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