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ई-रिक्शे से तिजारत के साथ सियासत भी PDF Print E-mail
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Thursday, 18 September 2014 10:43



मनोज मिश्र

नई दिल्ली। राजनीतिक दल ई-रिक्शा के मुद्दे को गरमाने में लगे हैं। वास्तव में इस मुद्दे पर वोट की राजनीति के साथ-साथ ई-रिक्शा के चलने पर राजनीति दलों के कुछ नेताओं के आर्थिक हित सधने की बात भी सामने आने लगी है। केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की सफाई के बावजूद कि उनकी कोई कंपनी ई-रिक्शा नहीं बनाती यह आरोप भाजपा के नेताओं पर लगातार लग रहे हैं। बताया यही जा रहा है कि रिक्शा के निर्माण से लेकर उसको जरूरत के हिसाब से बना कर बेचने वालों में कई भाजपा नेता शामिल हैं। यह भी एक दबाव माना जा रहा है कि जिसके चलते हाई कोर्ट से रोक हटवाने के लिए आसान नियम बनाए जा रहे हैं। 

इस मामले में जो जानकारी मंत्रालय से मिल रही है उसके मुताबिक अलग-अलग माप के चलने वाले ई-रिक्शा में एकरूपता लाने की कोई व्यवस्था नहीं की जा रही है और न ही ऐसी व्यवस्था की जा रही है कि सामान्य आॅटो की तरह इनके बारे में भी पुलिस और परिवहन विभाग में शिकायत की जा सके। आज तो हालात ऐसे हैं कि पंजीकरण की अनिवार्यता न होने से किसी भी सरकारी एजंसी के पास यह निश्चित संख्या ही नहीं है कि दिल्ली में चलने वाली ई-रिक्शा की सही संख्या कितनी है? कोई नियम-कानून नहीं होने से पुलिस भी इनके खिलाफ कार्रवाई करने में खुद को असमर्थ मानती है। हाई कोर्ट की ई-रिक्शा पर 23 जुलाई की रोक इनकी उस अराजकता को रोकने के लिए है, जो दूसरी सुनवाई एक दिन पहले 30 जुलाई को जमना पार में दिखी।

अनुमान के तौर पर कहा जा रहा है कि इस रिक्शा एक लाख से ज्यादा होगी। दिल्ली में 2011 से ई-रिक्शा चलना शुरू हुआ। पहले 200 वाट से चलने वाली रिक्शा थी उसे बढ़ाकर 650 वॉट किया गया और बताते हैं कि उसे हजार से ज्यादा वॉट के बना लिए गए ताकि आसानी से कई-कई यात्रियों को ढोया गया।  कहा जा रहा है कि नए नियम में चार ही यात्री यात्रा कर सकते हैं लेकिन अगर हर क्षमता के ई-रिक्शा सड़कों पर चलेंगे तो इस पर रोक कैसे लगेगी। राष्ट्रमंडल खेलों के समय दिल्ली के देहाती इलाकों को शहरी इलाकों से जोड़ने के लिए चलाई गई ग्रामीण सेवा नाम की आॅटो सर्विस की अराजकता को भी महज तीन साल में इस ई-रिक्शा ने पीछे छोड़ दिया है। 

महज ढाई साल में राजनीतिक पार्टी बना कर घमाका करने वाली आम आदमी पार्टी  (आप)ने अपनी राजनीति की शुरुआत निम्न वर्ग के लोगों से की थी। महंगी बिजली के बाद उन्होंने आॅटों वालों को पुलिस और परिवहन विभाग के भ्रष्टाचार से मुक्त कराने का वायदा करके अभियान चलाया और आॅटो के पीछे लगाए गए उनके पोस्टरों ने उन्हें सीधे नंबर एक-दो की लड़ाई में पहुंचा दिया


था। बताते हैं  कि सत्तर के दशक से ही कांग्रेस और जनसंघ (जनता पार्टी, भाजपा)में से जिसका आॅटो पर ज्यादा झंडे लगे होते थे, वही पार्टी चुनाव जीतती थी। यही 2013 के विधानसभा चुनाव में भी दिखा। इसका ही असर था कि लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ऑटो वालों को पटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। संयोग से वे लोकसभा चुनाव में भारी अंतरों से जीते। लोकसभा चुनाव के बाद आप के नेता बुरी तरह से हतोत्साहित हो गए थे। उन्होंने खड़े होने के लिए फिर से ऑटो का सहारा लिया। अब तो उन्हें जोड़-तोड़ से सरकार बनने के बजाए चुनाव करवाने से लेकर कई मुद्दे मिल गए हैं। 

आप ने ई-रिक्शा वालों को अपने के साथ करने के लिए जैसे ही अभियान तेज किया वैसे ही भाजपा ने आॅटों वालों से अलग ई-रिक्शा वालों को अपने पक्ष में करने की रणनीति केंद्र में सरकार बनते ही बना ली और 17 जून को रामलीला मैदान में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, जो दिल्ली के चुनावों के प्रभारी भी थे, को मुख्य अतिथि बनाकर सम्मेलन कर डाला। उस सम्मेलन में गडकरी ने ई-रिक्शा को बिना परमिट चलाने की घोषणा कर दी केवल उनके पंजीकरण की जिम्मेदारी दिल्ली के तीनों नगर निगमों को दी। इतना ही नहीं आसान शर्तों पर ई-रिक्शा खरीदने पर बैंकों से कर्ज दिलवाने की भी घोषणा कर दी गई। फिर क्या था, दिल्ली में तो  ई-रिक्शा वालों ने अराजकता फैलाना शुरू कर दिया। विभिन्न दुर्घटनाओं में दो लोगों के मरने के अलावा करीब दो दर्जन लोग घायल हो चुके हैं। इनके लिए केवल परमिट की ही छूट नहीं है उन्हें तो मनमाने रूट पर चलने, मनमाने किराया वसूलने और मनमानी स्पीड पर जितना संभव हो उतनी ही सवारी ले कर चलने की एक तरह से छूट मिली हुई है। पुलिस की मुसीबत है कि वे लापरावाही से वाहन चलाने के अलावा किसी भी धारा में मुकदमा दायर नहीं कर सकते हैं। 2011 में दिल्ली में ई-रिक्शा चलने के साल भर बाद ही नवंबर 2012 में तब की दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने परिवहन विभाग को इन ई-रिक्शा के लिए नियम-कानून बनाने को कहा था, लेकिन पर्यावरण सुधार के नाम पर उनको अराजकता के स्तर तक छूट मिली। तब से आज तक नियम बनाने का केवल नाटक ही होता रहा है।

अब हाई कोर्ट के आदेश से इन रिक्शों के चलने पर पाबंदी लगने के बाद भाजपा हरकत में आई है। अभी भी जो कानून बनने की जानकारी मिली है, उससे लगता यही है कि किसी भी तरह इन रिक्शों पर से रोक हटवाई जाए। यह रोजगार के नाम पर तो हो ही रहा है और होना भी चाहिए, लेकिन यह रिक्शों का कारोबार करने वालों के लिए ही नहीं होना चाहिए। 

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