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बाढ़ प्रभावित श्रीनगर में अब पसरा महामारी का अंदेशा PDF Print E-mail
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Thursday, 18 September 2014 10:20


श्रीनगर। बाढ़ प्रभावित श्रीनगर के स्वास्थ्य केंद्रों में अधिक से अधिक संख्या में खुजली, छाती में संक्रमण और अतिसार की शिकायतों के साथ मरीज आ रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि वे महामारी के प्रकोप से निपट रहे हैं। इस बीच श्रीनगर शहर के कई इलाकों से पानी निकालने के काम की सुस्त रफ्तार से सैकड़ों इमारतों के ढहने का खतरा पैदा हो गया है जिससे करोड़ों की संपत्ति को नुकसान पहुंच सकता है।


सिविल इंजीनियर नासिर अहमद ने कहा कि शहर में कई पुरानी इमारतें पहले ही ध्वस्त हो चुकी हैं और कई आने वाले दिनों में ढह सकती हैं क्योंकि जल स्तर बीते तीन दिन में ज्यादा कम नहीं हुआ है। एक पुलिस अधिकारी के अनुसार, केवल राजबाग, गोगजीबाग और जवाहर नगर क्षेत्रों में सौ से अधिक घर ढह चुके हैं जबकि इन क्षेत्रों में बाढ़ के कारण कई ढांचों को आंशिक रूप से नुकसान पहुंचा है। नासिर ने कहा कि जवाहर नगर में ज्यादातर घर साठ के दशक के आखिर और 70 के दशक की शुरुआत के बने हैं। उन्होंने कहा, ‘उन दिनों, घर कंक्रीट के बजाय र्इंट और मिट्टी से बनते थे। इस वजह से ये घर खतरे में हैं।’ उन्होंने कहा कि अधिकारियों को यहां से तेजी से पानी निकालने के लिए और मोटर लगानी चाहिए।

जम्मू कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी में बाढ़ आने के बाद से स्थानीय समाचारपत्रों का प्रकाशन नहीं हो रहा है क्योंकि अधिकतर अखबारों और साप्ताहिकों के कार्यालय पिछले दस दिनों से पानी में डूबे हुए हैं। 

उधर, रामबाग में एक चिकित्सा शिविर में डा शब्बीर अहमद ने कहा, ‘शुरुआत में हमारे पास जख्म वाले मरीज आ रहे थे और उन्हें प्राथमिक उपचार की जरूरत होती थी लेकिन बीते दो तीन दिनों से ज्यादातर मरीज खुजली, सीने में संक्रमण और अतिसार के लक्षणों के साथ आ रहे हंै।’ उन्होंने कहा, ‘हम महामारी के प्रकोप का सामना कर रहे हैं क्योंकि दिन ब दिन इसी तरह के लक्षणों वाले मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है।’

डा शब्बीर ने कहा, ‘क्या हम इस महामारी से निपटने को तैयार हैं। जवाब हैं नहीं। क्योंकि यहां पर्याप्त दवाओं की आपूर्ति नहीं है।’ उन्होंने कहा कि हालांकि यह शुरुआती चरण में है लेकिन महामारी पहले ही फैल गई है और उन्हें डर है कि यह धीरे-धीरे समूचे श्रीनगर को और आखिरकार समूची घाटी को अपनी गिरफ्त में ले लेगी।

अहमद ने कहा कि हर दिन 1600 से अधिक मरीज मेडिकल शिविरों में आते हैं और उनमें से करीबन 90 फीसद


समान लक्षणों के साथ आते हैं, जो इस बात का संकेत हो सकता है कि महामारी यहां पहले ही अपनी जड़ें फैला रही है। अहमद ने कहा कि त्वचा में खुजली, छाती में संक्रमण और अतिसार शहर में महामारी के प्रकोप का संकेत हैं।

शहर में दवाओं की कमी ने निवासियों की समस्या बढ़ा दी है क्योंकि यहां चिकित्सकों का कहना है कि समय पर उपचार नहीं किया गया तो ये लक्षण जीवन को खतरा पहुंचाने वाली स्थिति का रूप ले सकते हैं। 

शिविर में एक अन्य फिजिशियन डा तौसीफ डार ने कहा, ‘ये लक्षण महामारी के प्रकोप का पूर्व लक्षण हैं और ये तथ्य यहां लोगों के कष्ट को और बढ़ा रहे हैं कि हम जीवन रक्षक दवाओं की कमी से जूझ रहे हैं।’ चिकित्सकों का कहना है कि शिशु और छोटे बच्चे इन बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं क्योंकि उनकी प्रतिरक्षक प्रणाली रोगाणुओं से निपटने के लिए काफी कमजोर है।

स्थानीय अखबारों का प्रकाशन नहीं: कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी में बाढ़ आने के बाद से स्थानीय समाचारपत्रों का प्रकाशन नहीं हो रहा है क्योंकि अधिकतर अखबारों और साप्ताहिकों के कार्यालय पिछले दस दिनों से पानी में डूबे हुए हैं।

मुश्ताक प्रेस एनक्लेव में अब भी कई फुट पानी जमा है। इसी क्षेत्र में कई प्रमुख अंगे्रजी और उर्दू दैनिकों के कार्यालय स्थित हैं। झेलम का जलस्तर बढ़ने के बाद सात सितंबर को पानी लाल चौक और आसपास के इलाकों में प्रवेश कर गया था। बाद में अबी गुजर के पास नदी का बांध भी टूट गया था।

कुछ ही घंटों बाद प्रेस एनक्लेव सहित कई इलाकों में कई फुट पानी भर गया था जिससे समाचार पत्रों का प्रकाशन प्रभावित हुआ।

अधिकतर दैनिक अपने इंटरनेट संस्करणों का संचालन कर रहे हैं लेकिन उनका प्रिंट संस्करण कब तक शुरू  होगा, इस बारे में कोई अनुमान नहीं है। कश्मीर में एक प्रमुख अंगे्रजी समाचार पत्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने  कहा, ‘सभी उपकरण डूब गए हैं और हमें फिर शुरू  करने के पहले उनमें से अधिकतर को बदलना होगा। मेरा अनुमान है कि हमें नए सिरे से शुरुआत करनी होगी।’

दूसरी ओर कश्मीर मॉनीटर के संपादक शमीम मेराज ने दावा किया कि वह नौ दिनों के बाद आज अपने दैनिक का एक संस्करण बुधवार को प्रकाशित करने में सफल रहे। मेराज ने कहा, ‘हम आज संस्करण लाने में कामयाब रहे। लोगों ने समाचारपत्र की प्रतियों को हाथों-हाथ लिया क्योंकि कश्मीर में बाढ़ आने के बाद से कोई अखबार उपलब्ध नहीं है।’ 

(भाषा)

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