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पश्चिम बंगाल में सियासी बदलाव के संकेत PDF Print E-mail
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Thursday, 18 September 2014 09:29



विनोद कुमार

लोकसभा चुनाव में भाजपा पश्चिम बंगाल में दो सीटों पर जीती थी, लेकिन विधानसभा में तकरीबन 15 वर्ष बाद उसका खाता खुला है। यह कहना तो जल्दबाजी होगी कि अगर यहां विधानसभा चुनाव हुए होते तो भाजपा प्रत्याशी बड़ी संख्या में जीतते। लेकिन यह बात वहां के कई लोग बता रहे हैं कि ममता बनर्जी वोट की राजनीति के लिए मुसलिम तुष्टीकरण की जिस नीति पर चल रही है, उसकी वहां भारी प्रतिक्रिया हो रही है और माकपा से छिटक कर लोग भाजपा की तरफ आ रहे हैं।

दो सीटों के लिए हुए उपचुनाव में एक सीट बसिरहाट दक्षिण पर भाजपा की जीत पश्चिम बंगाल में हो रहे राजनीतिक बदलाव का संकेत है। ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक जमीन को पश्चिम बंगाल में पुख्ता करने के लिए लगातार ऐसी कार्रवाइयां कर रही हैं जिससे मुसलिम वोटर तो उनकी तरफ खिंच रहे हैं और उनसे जुड़ रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ भाजपा के पक्ष में हिंदू वोटों का तेजी से ध्रुवीकरण हो रहा है।

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को सामने रख ममता माकपा पर आक्रमण करती रहती हैं। माकपा पर आरोप है कि उनकी सरकारों ने बंगाल के मुसलमानों का ध्यान नहीं रखा।  वहां उनकी स्थिति देश में सबसे अधिक खराब है। पिछले अप्रैल से उन्होंने इमामों को भत्ता देना शुरू कर दिया। हालांकि कोलकाता हाईकोर्ट ने इसे गैर-संवैधानिक बताते हुए इस पर रोक लगा दी। कुछ मुसलिम विद्वानों ने भी इस वजीफे को गैर-इस्लामिक बताया है। लेकिन ममता का कहना है कि वे आधी रोटी खाएंगी और आधा इमाम भाइयों को खिलाएंगी। 

दरअसल, वे मुसलिम प्रेम का कुछ ज्यादा ही दिखावा कर रही हैं। एक जमाने में एनडीए सरकार में रह चुकी ममता के इस प्रेम की एक प्रमुख वजह राज्य के 30 फीसद मुसलिम वोटर हैं जो कल तक माकपा के साथ थे।

कवींद्र रवींद्र और नजरुल की यह भूमि हमेशा से सांप्रदायिक सौहार्द की भूमि रही है।  आजादी के वक्त के लीगी दंगे के बावजूद वहां संस्कृति और भाषा लोगों को जोड़ती है। भाषा और संस्कृति का यह जोड़ इतना मजबूत साबित हुआ कि धर्म के नाम पर पाकिस्तान बांग्लादेश को आपने साथ अधिक दिनों तक जोड़े नहीं रख सका। वाम मोर्चे की सरकारों के दौरान भी यहां धार्मिक सहिष्णुता काफी हद तक कायम रही, हालांकि वाम मोर्चा कभी मुसलमानों का हमदर्द होने का दिखावा नहीं करता था। लेकिन ममता ने वोट की राजनीति के लिए तुष्टीकरण की जो नीति अपनाई, वह सौहार्द की स्वाभाविक और सहज जमीन में दरारें डाल रही है।

इसके अलावा बंगाल में लोगों का मिजाज भी बदल रहा है। उपभोक्तावाद प्रभावी हो रहा है। किसी जमाने में वहां सरकारी स्कूलों, अस्पतालों पर लोगों का भरोसा था। लोग ट्रामों पर


चलते और ट्रामों-बसों के किराए में दो चार पैसे की भी वृद्धि होती थी तो  सड़कों पर उतर आते थे। बंगालियों का अपनी भाषा से प्रेम जगत विख्यात है। लेकिन अब वहां सस्ती और सहज सुलभ सवारी ट्रामें खत्म हो चली हैं। टैक्सी के रूप में चलती पीले रंग से रंगी एंबेसडर की जगह सेंट्रों और नए मॉडल की गाड़ियां ले रही रही हैं। सरकारी अस्पतालों की जगह नित नए निजी अस्पताल खुल रहे हैं। बांग्ला की जगह अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के लिए , स्कूलों में अंग्रेजी शिक्षा के लिए आंदोलन हो रहे हैं।

 लोगों के मन में यह बात टीस बन कर उभर रही है कि अंग्रेजों के जमाने में नई रोशनी और अभिजात का केंद्र रहा पश्चिम बंगाल देश के विकास के क्रम में कहीं पिछड़ गया। ट्रेड यूनियन मूवमेंट ने उद्योगों की कमर तोड़ दी। बंगलूर, हैदराबाद आइटी की बदौलत कहां से कहां पहुंच गए और बंगाल में छात्र अभी भी बुनियादी विज्ञान, सिविल व इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग ही पढ़ रहे हैं। बुद्धदेव भट्टाचार्य इस तथ्य को समझ रहे थे और इसलिए वे कुछ संशोधनों के साथ नई औद्योगिक नीति के पैरोकार बन गए थे। इस हद तक कि परंपरागत ग्रामीण जनाधार की उपेक्षा कर बैठे। नंदीग्राम और सिंगूर की घटनाओं ने ऐसी राजनीतिक परिस्थितियां बनाईं कि ममता सत्ता में आ गईं। कल तक जो युवा और बुद्धिजीवी माकपा के साथ जुड़कर फख्र का अनुभव करते थे, वे वाममोर्चे के विरोधी हो गए। अब तो माकपा विरोध ही फैशन बन गया है बंगाल में। 

बहरहाल बंगाल बदहाल है। लगातार बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं। अस्पतालों में बच्चों की मौत की घटनाएं हमेशा सुर्खियां बन रही हैं। राजनीतिक हत्याएं आम बात हंै। माकपा ने सत्ता की मदद से विरोधियों को कुचलने की जिस रणनीति पर काम किया, उसी पर चलते हुए ममता अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का सफाया कर रही हैं। उनके एक मंत्री एलानियां कहते पाए गए कि वे माकपा के लोगों की हत्या करेंगे, उनकी महिलाओं का बलात्कार करवा देंगे। और ममता उस मंत्री के खिलाफ सार्वजनिक बयान तक देने में कोताही करती रहीं। विडंबना यह कि ममता भी जन आकांक्षाओं के अनुरूप नया बंगाल गढ़ने की दिशा में बढ़ने के बजाय, मुसलिम तुष्टीकरण की सरल व आसान राजनीति पर चल पड़ी हैं। 

तुष्टीकरण ने भारतीय राजनीति को कहां पहुंचा दिया, यह पिछले लोकसभा चुनाव में स्पष्ट रूप में दिखाई दे चुका है। अगर बंगाल में 30 फीसद मुसलमान है तो 70 फीसद गैर-मुसलमान भी। और चूंकि माकपा खोई जमीन पाने की स्थिति में तत्काल नहीं है, तो इस ध्रुवीकरण का फायदा भाजपा ही उठाएगी आगामी चुनावों में।


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