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आपदा के बहाने PDF Print E-mail
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Wednesday, 17 September 2014 12:34

जनसत्ता 17 सितंबर, 2014: के विक्रम राव का लेख ‘आपदा के दौर में कहां बिला गए ‘आजादी’ के झंडाबरदार’ (12 सितंबर) कश्मीर आपदा के बारे में पूरे कॉरपोरेट मीडिया द्वारा परोसे जा रहे अंधराष्ट्रवादी प्रचार से किसी भी तरह अलग नहीं है। भारत ही नहीं, विश्व भर में जितनी भी आपदाएं घटित हुई हैं वहां के बचाव कार्य में सेना ने हमेशा प्रमुख भूमिका अदा की है। लेकिन कश्मीर के मामले में इसे सेना द्वारा वहां के लोगों पर किए जा रहे एहसान के रूप में दिखाया जा रहा है। वैसे तो के विक्रम राव कश्मीर के लोगों द्वारा भारत को अपने से अलग मानने के लिए पूरी तरह अलगाववादियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, लेकिन उनका लेख स्वयं यह दिखला रहा है कि वे खुद भी कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते। मसलन, वे लिखते हैं कि ‘भारतीय करदाताओं और जनता का खरबों रुपया कश्मीर पर खर्च होता रहा’। इसे पढ़ कर तो ऐसा लगता है कि भारतीय करदाताओं में कश्मीर के लोग शामिल ही नहीं हैं या भारत के जीडीपी में कश्मीर की कोई हिस्सेदारी ही नहीं है।

लेख में वे समग्र दृष्टि अपनाए जाने की बात करते हैं, लेकिन स्वयं कश्मीर की आपदा का विश्लेषण करते हुए इसका पूरा ठीकरा महज राज्य सरकार की कारगुजारी पर फोड़ देते हैं। इस घटना को एकांगी तौर पर देखने की बजाय 2010 की लेह आपदा और पिछले साल की उत्तराखंड आपदा की निरंतरता में देखे जाने की जरूरत है। अंधाधुंध पूंजीवादी विकास की वजह से हुए जलवायु-परिवर्तन, जंगलों की भारी पैमाने पर कटाई, पूरे हिमालय क्षेत्र में पर्यटन केंद्रों का अनियोजित विकास और अनियोजित शहरी विकास ही वे मुख्य कारण हैं जिनकी वजह से ये आपदाएं घटित हो रही हैं। खासकर, कश्मीर में झेलम


नदी के बाढ़ क्षेत्रों और झीलों के किनारे बसाई गई रिहाइशी बस्तियों और होटलों ने भी इस आपदा को लाने में प्रभावी भूमिका अदा की है। पूंजीवाद ने धरती पर इस कदर कहर बरपा किया है कि आज यहां जीवन के अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो गया है। जिस तरीके से मोदी सरकार निर्बंध पूंजीवादी विकास को बढ़ावा दे रही है, आने वाले दिनों में उसका परिणाम प्राकृतिक आपदाओं की बारंबारता और तीव्रता में बढ़ोतरी में रूप में ही सामने आएगा।

के विक्रम राव आगे अपने लेख को झूठ के चरम पर ले जाते हैं जब वे दशकों से सेना द्वारा कश्मीर की जनता पर ढहाए गए जुल्म और मानवाधिकारों के हनन को अलगाववादियों का प्रचारित सफेद झूठ करार देते हैं। सच से शुतुरमुर्ग की तरह मुंह मोड़ कर अगर यों ही कश्मीर की जनता की आकांक्षाओं और भावनाओं की उपेक्षा की जाती रही तो के विक्रम राव की मान्यता के विपरीत कश्मीर की समस्या सुलझने की बजाय उलझती ही जाएगी।

अखिल, गाजियाबाद


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