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संस्कृत बनाम हिंदी PDF Print E-mail
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Wednesday, 17 September 2014 12:33

जनसत्ता 17 सितंबर, 2014: अशोक वाजपेयी ने अपने स्तंभ ‘कभी-कभार’ (14 सितंबर) में हिंदी के संस्कृत से दूर होने की बात कही है। हमारा पूछना यह है कि हिंदी का संस्कृत से कब बहनापा रहा है? जिस संस्कृत में उन्हें ‘अदम्य निर्भयता, अक्लांत उदात्तता’ दीख रही है उसमें जारकर्म की रामायण- महाभारत के सिवाय क्या है? यह अच्छा ही है जो उन्होंने स्वीकार किया कि संस्कृत वर्णभेद यानी रंगभेद की पोषक भाषा है। फिर, उन्हें बताना चाहिए था कि संस्कृत किसकी ‘जातीय स्मृति’ का अनिवार्य अंग है? जहां तक संस्कृत से वंचित करने की बात है, तो इसे पढ़ने से कौन रोक रहा है? दलितों को तो बस इतना पता है कि संस्कृत का एक भी शब्द कान में पड़ते ही कानों में पिघला सीसा डालने का आदेश रहा है। 

हिंदी सप्ताह या पखवाड़े में बताना यह है कि हिंदी का संस्कृत से किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं। संस्कृत अंगरेजी की तरह विदेशी भाषा है जिसे इसे जानने वालों ने यहां के मूल निवासियों यानी दलितों को कभी सीखने नहीं दिया। हां, अंगरेजों ने अपनी भाषा सभी को सिखाई है। 

जहां तक हिंदी के विकास की बात है, तो इसमें हर देसी और बहुत-सी विदेशी भाषाओं का योगदान है। इस मामले में हिंदी जितनी खुली,


ग्रहणशील और विनयी भाषा शायद ही कोई हो। इन सबके बावजूद हिंदी का संस्कृत से कोई लेना-देना नहीं। मेरी दादी-नानी संस्कृत के हलंत तक से अनभिज्ञ रहीं। मेरी मातृभाषा हिंदी है, जो मेरी मां से मेरे पास आई है, उन्होंने भी संस्कृत का नाम तक नहीं सुना।  हां, संस्कृतवादियों ने आगे चल कर जबरदस्ती हिंदी में संस्कृत के शब्द घुसेड़ दिए जिन्हें इनके सिवाय कोई पढ़-बोल नहीं सकता। तो इतना ही रिश्ता है हिंदी और संस्कृत का। 

कैलाश दहिया, पश्चिम पुरी, दिल्ली


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