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उपचुनावों के संकेत PDF Print E-mail
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Wednesday, 17 September 2014 12:30

जनसत्ता 17 सितंबर, 2014: अक्सर यह कहा जाता है कि उपचुनाव के आधार पर कोई राजनीतिक निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। यह दलील अपनी जगह सही हो सकती है, जब इक्का-दुक्का सीट पर उपचुनाव हुए हों। लेकिन तेरह सितंबर को जिन सीटों पर दोबारा चुनाव हुए उनका दायरा बड़ा है, न सिर्फ संख्या में बल्कि भौगोलिक रूप से भी। इसलिए इनके नतीजे मायने रखते हैं। केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के साढ़े तीन महीने बाद हुए तैंतीस विधानसभा सीटों और तीन लोकसभा सीटों के इन उपचुनावों को नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के संदर्भ में भी देखा जा रहा था। भाजपा यह मान कर चल रही थी कि अब भी मोदी लहर कायम है। पर उसके इस दावे की हवा निकल गई है। ये नतीजे भाजपा के लिए बड़ा झटका हैं, इस हद तक कि शायद ही किसी को इसका अनुमान रहा हो। उत्तर प्रदेश में भाजपा को लोकसभा की अस्सी में से इकहत्तर सीटें हासिल हुई थीं। उसके सहयोगी अपना दल की दो सीटों को जोड़ दें, तो यह आंकड़ा तिहत्तर सीटों तक पहुंच जाता है। आम चुनाव में इतनी जबर्दस्त कामयाबी की चमक इतनी जल्दी फीकी पड़ जाएगी, किसने सोचा था! 

उत्तर प्रदेश की ग्यारह विधानसभा सीटों के उपचुनाव में भाजपा सिर्फ तीन सीटें पा सकी। आठ सीटें समाजवादी पार्टी की झोली में गर्इं। भाजपा का यही हाल राजस्थान में भी हुआ, जहां उसने लोकसभा की सभी पच्चीस सीटें जीती थीं। वहां जिन चार सीटों पर उपचुनाव हुए वे सभी पहले भाजपा के पास थीं, पर वह सिर्फ एक सीट बरकरार रख सकी, बाकी कांग्रेस के खाते में गर्इं। गुजरात में भाजपा का ऐसा हश्र तो नहीं हुआ, पर मोदी के गृहराज्य में भी उसका प्रभाव घटने के ही संकेत हैं। गुजरात की नौ में से छह सीटें भाजपा और तीन कांग्रेस को मिली हैं। पर खास बात यह है कि कांग्रेस को मिली ये तीनों सीटें पहले भाजपा के पास थीं। अलबत्ता लोकसभा की तीन सीटों के परिणाम में कोई फेरबदल नहीं हुआ है, जो सीट जिस पार्टी के पास थी उसी के पास रही। ये उपचुनाव बताते हैं कि मोदी का जादू टूट चुका है। यों लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा को यह पहला


झटका नहीं है। इससे पहले बिहार और कर्नाटक में और उससे पहले उत्तराखंड में हुए उपचुनावों में भी उसे मायूस होना पड़ा था। उसकी ताजा नाकामी ने दो सवाल खड़े किए हैं। भाजपा ‘लव जिहाद’ आदि के नाम पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा दे रही थी, यह मान कर कि इससे उसे चुनावी फायदा होगा। इसी रणनीति के तहत उसने योगी आदित्यनाथ को आगे किया। पर मतदाताओं ने उसकी इन कोशिशों को नकार दिया है। इससे भाजपा को अपने मुद्दों के बारे में नए सिरे से सोचना पड़ सकता है। 

उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में मिली कामयाबी का श्रेय अमित शाह को दिया गया और इसी तर्क पर वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उपचुनावों में वे कोई करिश्मा क्यों नहीं दिखा सके? इन उपचुनावों के नतीजे ऐसे समय आए हैं, जब महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड में विधानसभा चुनावों की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। जम्मू-कश्मीर में आई आपदा के कारण वहां जरूर चुनावी गहमागहमी फिलहाल थम गई है। भाजपा खुद को आश्वस्त दिखा रही थी कि इन राज्यों में उसी की सरकारें बनेंगी। लेकिन उसके पुराने गढ़ वाले राज्यों में उसे जो आघात लगा है, उससे आगामी चुनावों में भी उसकी संभावनाओं पर सवालिया निशान लग गया है। दूसरी तरफ, जब कांग्रेस के नेतृत्व से लेकर उसकी रणनीति तक, हर चीज पर अंगुली उठ रही थी, उसे नई संजीवनी मिली है। क्या वह इसे खुद के कायाकल्प के अवसर में बदल पाएगी? 


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