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फीस की टीस PDF Print E-mail
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Wednesday, 17 September 2014 12:28

जनसत्ता 17 सितंबर, 2014: निजी स्कूलों की फीस का निर्धारण लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अभिभावक संघों और कुछ स्वयंसेवी संगठनों की शिकायत पर सर्वोच्च न्यायालय तक ने निर्देश दिया था कि निजी स्कूलों में फीस का पैमाना तार्किक बनाया जाए। मगर इस मामले में अब तक कोई व्यावहारिक रूपरेखा तय नहीं हो पाई है। इसी का नतीजा है कि स्कूल अपनी मर्जी से हर साल फीस में बढ़ोतरी करते रहते हैं। लिहाजा, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने उचित ही मानव संसाधन विकास मंत्रालय को पत्र लिख कर स्कूलों की फीस की बाबत नियामक संस्था बनाने की सिफारिश की है। तमाम निजी स्कूल पढ़ाई-लिखाई के अत्याधुनिक उपकरणों, खेल-कूद के संसाधनों, अतिरिक्त शैक्षणिक गतिविधियों, व्यक्तित्व विकास की सुविधाओं आदि के दावों के साथ अपने को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में लगे रहते हैं। इन्हीं का हवाला देकर वे मनचाहे ढंग से फीस वसूलते रहते हैं। जबकि हकीकत यह है कि इन कथित सुविधाओं का पाठ्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं होता। वातानुकूलित कक्षाओं-बसों, स्मार्ट ब्लैकबोर्ड, बच्चों के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग अनिवार्य बनाया जाना, तमाम निजी कंपनियों की तरफ से आयोजित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने को बाध्य किया जाना, घुड़सवारी और तरणताल आदि की सुविधाएं मुहैया कराना अनावश्यक चमक-दमक पैदा करने की कवायद है, जो निजी स्कूलों में फैशन की तरह चल पड़ी है। आखिरकार इनकी साज-संभाल का खर्च अभिभावकों की जेब पर ही डाला जाता है। ऐसे में उनका असंतोष स्वाभाविक है। इस पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सुझाव को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। 

निजी स्कूलों के मालिक और प्रबंधक आय की फिक्र करें, यह स्वाभाविक है। पर ज्यादा से ज्यादा कमाई के लोभ में वे कोई मर्यादा नहीं रखते। इस तरह सरकारी और निजी स्कूलों के बीच काफी चौड़ी खाई पैदा हो चुकी है, साथ ही शिक्षा के साथ जुड़े सामाजिक सरोकार का भी हनन हुआ है। यह धारणा पुष्ट होती गई है कि गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई-लिखाई महज संपन्न तबके तक सिमटती जा रही


है। मगर सरकारें सब जानते-बूझते इस खाई को पाटने का कोई उपक्रम नहीं कर रहीं। स्कूल भवनों, शैक्षणिक सुविधाओं, अध्यापकों आदि की कमी के आंकड़े अक्सर आते रहते हैं, पर इस स्थिति को सुधारने के बजाय तदर्थ व्यवस्था के तहत सभी बच्चों तक पढ़ाई-लिखाई की सुविधाएं पहुंचाने के प्रयास चल रहे हैं। निजी स्कूल सरकारों की इस ढिलाई का फायदा उठा रहे हैं। सरकारी स्कूलों की दशा दिनोंदिन बिगड़ती जाने के कारण लोगों ने निजी स्कूलों का रुख किया और फिर उनकी मनमानियों के जाल में फंसते गए। बहुत सारे औद्योगिक घरानों ने स्कूलों की शृंखला शुरू कर दी। पहले भी वे स्कूल-कॉलेज खोलते थे, मगर तब उनका मकसद इस कदर व्यावसायिक नहीं था। अब खुद सरकारें अपनी शिक्षा संबंधी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ते हुए उन्हें बढ़ावा दे रही हैं। यही कारण है कि अब निजी स्कूलों के मालिक इस कदर ताकतवर हो चले हैं कि जब भी इनके खिलाफ कोई कड़ा कदम उठाने की पहल होती है वे संगठित रूप से सरकारों पर दबाव बनाने में जुट जाते हैं। ऐसे में मनमाने तरीके से फीस वसूली की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का नियामक गठित करने का सुझाव स्वागत-योग्य है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। 


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