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गांव का दुख PDF Print E-mail
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Wednesday, 17 September 2014 12:23

मनोज चाहिल

जनसत्ता 17 सितंबर, 2014: जब भी मैं अपने गांव जाता हूं, मुझे मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियां याद आ जाती हैं- ‘अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों न इसे सबका मन चाहे’। मैं सोचता हूं कि वह कौन-सा ग्राम्य जीवन है, जिसके बारे में कवि मैथिलीशरण गुप्त ने ऐसा कहा होगा! 

मैं गांव में ही पला-बढ़ा, पढ़ा-लिखा और जीवन के बीस से ज्यादा वर्ष मैंने वहीं बिताए। मैं अक्सर देखा करता था कि गांव की चौपाल पर हमेशा बहुत-से लोग बैठे रहते थे। उनमें से कुछ ताश खेल रहे होते थे, हंसी-मजाक में एक दूसरे पर अश्लील टिप्पणियां होती थीं, जिसमें निशाना कोई न कोई स्त्री होती। आज वर्षों बाद भी उस माहौल में मुझे कोई खास तब्दीली नहीं दिखती। बल्कि अब इस मजमे में तकनीक ने भी अपना आश्रय पा लिया है और मोबाइल फोन के जरिए ‘मनोरंजक चीजें’ भी चौपाल पर पहुंच गई हैं। 

गांधीजी के अनुसार, गांव ही भारत की जान हैं और भारत इन्हीं गांवों में निवास करता है। इसके विपरीत डॉ आंबेडकर का मानना था कि गांव असमानता और जाति-भेद को बढ़ाने के केंद्र हैं। इस संदर्भ में हाल ही की एक घटना सोचने पर मजबूर करती है। थोड़े समय पहले गांव के लोगों ने बताया कि खेत में जानवरों को चराने को लेकर एक दलित किशोर और उसकी मां का एक दबंग जाति के व्यक्ति से झगड़ा हो गया। इस बीच दबंग जाति के पुरुष ने दलित स्त्री को जातिसूचक और अश्लील गालियां दीं, जिसके कारण महिला के बेटे की उस दबंग के साथ हाथापाई हो गई। उस लड़के ने उसे थप्पड़ मार दिया। अपने को अकेला पाकर उस दबंग पुरुष ने फोन कर अपने साथियों को बुलाया और सबने मिल कर उस लड़के की बहुत पिटाई की। बचाने के क्रम में उस स्त्री को भी गहरी चोटें आर्इं। 

इसके बाद वह स्त्री


अपने बेटे को लेकर थाने गई। रिपोर्ट दर्ज कराई। थाने में किसी दलित पृष्ठभूमि वाले सिपाही के होने के कारण उनकी रिपोर्ट लिखी गई और आरोपियों पर अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न कानून के तहत रिपोर्ट दर्ज की गई। यह बात जैसे ही आरोपी पक्ष को पता चली, देखते ही देखते बहुत सारे लोग इकट्ठा हो गए। आसपास के गांवों से भी दबंग जातियों के लोग आ गए। आगे क्या हुआ होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। पीड़ित पक्ष पर इतना दबाव बनाया और धमकाया गया कि उन्हें मुकदमा वापस लेना पड़ा। धमकी में ‘दुश्मनी मोल न लेने’, ‘रहना तो गांव में ही है’ और ‘अपने बच्चों की नौकरी का भी ध्यान रखो’ जैसी बातें शामिल थीं। एक बार फिर यही साबित हुआ कि समरथ का दोष नहीं होता! यह घटना किसी शहर में हुई होती तो शायद उस कमजोर दलित परिवार को ऐसी धमकियों के बारे में सोचने की जरूरत नहीं रहती। यह ऐसी अकेली घटना नहीं है। यह ग्रामीण इलाकों का कड़वा सच है। मेरी नजर में यह कोई ‘आदर्श ग्राम्य जीवन’ नहीं है।   


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