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सुनरख के मोर PDF Print E-mail
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Wednesday, 17 September 2014 12:21

प्रयाग शुक्ल

जनसत्ता 17 सितंबर, 2014: मोरों की चर्चा करते ही वे मुझे मोबाइल पर मोरों की विभिन्न छवियां दिखाने लगे। बोले, पहले तो यहां भी बहुत मोर थे, हमारे गांव सुनरख में, पर जैसे-जैसे फ्लैट/ घर बनते जा रहे हैं, वे और आगे चले गए हैं। आप यहां से कोई एक किलोमीटर और बढ़ जाओ तो अब भी सौ-दो सौ दिख जाएंगे। इतने सारे मोर इकट्ठा देखने की इच्छा तो उमड़ी, पर लगा कि सुबह की जितनी सैर कर चुका हूं, उसे और आगे बढ़ाना संभव न होगा। दिन भी चढ़ने लगा था। सुबह के साढ़े सात बज चुके थे। सुबह-सुबह यहां हवा में जितनी ठंडक मिली थी, उसमें अब मद्धिम तपन प्रवेश करने लगी थी। सो, मैंने इसी से संतोष किया कि बहुत दिनों बाद दो-चार मोर देखने को मिल गए हैं। और सुबह उनकी बोली भी देर तक सुन ली है। फिर जलसिंह ने अपने मोबाइल पर मोरों की कई मुद्राएं भी दिखा दी हैं। 

जलसिंह से भेंट अनायास हुई थी। सुनरख गांव की एक गली के प्रवेश-द्वार पर बने चबूतरे पर वे दो-चार लोगों के साथ बैठे थे। एक बुजुर्ग स्त्री भी थी। मैंने मोरों के बारे में जिज्ञासा की तो सबसे पहले उत्तर उन्हीं की ओर से आया था। माथे पर तिलक, साठ-पैंसठ के होंगे। मेरे वहां रुकते ही ‘राधे राधे’ के स्वर गूंजे थे। वृंदावन में, परिचित हो या अपरिचित, उसके सामने पड़ते ही यही स्वर-ध्वनि उठती है। भेंट होते ही पहला संबोधन यही होता है। मैंने पूछा था, यह भी कि, यहां अब जो इतने सारे फ्लैट-परिसर, होटल बन रहे हैं, मुंबई-दिल्ली की तरह, उसका विरोध आप लोग नहीं कर रहे हैं? कौन सुनता है, विरोध! यही प्रत्युत्तर मिला था। एक सज्जन बोले, पैसा मिलता है, किसान बेच देता है। एक ने कहा कि नहीं, यहां की जमीन तो ऊंची-नीची है, खेती अच्छी होती कहां थी। एक ने कहा, किसान करे भी तो क्या, इसके पास है ही क्या, मेहनत करता है, पसीना बहाता है, पर खुद तो मिट््टी ही खाता है, मिट््टी में मिल जाता है। यह जानकारी भी मिली कि सुनरख, वृंदावन के रमनरेती क्षेत्र में है। 

मन नहीं माना। थोड़ा और आगे बढ़ूं तो शायद कुछ और दिख जाएं, इस आशा ने पैरों में गति भरी। वृंदावन में हूं- मोर पंख, मोर मुकुट, जैसे शब्द याद आने लगे। कल शाम, स्वामी हरिदास संगीत सम्मेलन में बंगलुरु से कथक-नर्तक दंपति राजेंद्र और निरुपमा की एक प्रस्तुति में उनके दल की युवा-नृत्यांगनाओं के केशों में फंसा उन्नत मोर पंख कितना सुंदर लग रहा था और उनके दल की इन युवा-नृत्यांगनाओं का नृत्य भी कितना अपूर्व था। इसकी सुधि आई। कथक में उनके ‘नए’ प्रयोगों ने सम्मोहित किया है। पैरों ने और गति भरी। पर सड़क के दोनों ओर नए बने पक्के घरों ने, यह बता दिया कि सौ-दो सौ मोरों वाला मुकाम अभी दूर है। वापस लौटा। नीम के एक पेड़ से नई कोंपलें तोड़ीं, जो सुबह खाता हूं- मधुमेह को दूर रखने के लिए। यहां भले कभी जंगल रहा हो, और वे


केलि-कुंज भी रहे हों, जिनकी उपस्थिति जयदेव, सूर, रवींद्रनाथ सबकी कविता में है, पर अब वे मधुवन कहां! कुछ खेत, और नीम के वृक्ष जरूर बचे हुए हैं। 

एक परचून की दुकान के बाहर ही तखत पर एक अधेड़ सज्जन फुरसत में बैठे हुए दिखाई पड़े तो बतियाने का मन हुआ। कुछ दूरी पर स्कूली ड्रेस में कुछ बच्चे-बच्चियां खड़े थे- स्कूल बस की प्रतीक्षा में। देख कर अच्छा लगा। तखत पर बैठे हुए किशोरीलालजी- हां, यही नाम तो बताया था उन्होंने- कुछ पीड़ा के साथ कहा कि हां, गांव तो उजड़ रहा है। पेड़-पौधे-खेत भी नई इमारतों की भेंट चढ़ रहे हैं। बोले, मैं तो यहीं बड़ा हुआ हूं। न जाने कितनी चिड़ियां, कितने मोर थे। किशोरीलालजी के इशारे पर मेरे लिए एक कुर्सी आ गई। मैंने पूछा, ये बच्चे सरकारी स्कूल में जा रहे हैं या प्राइवेट में। उन्होंने कहा, गांव के बच्चे कुछ तो प्राइवेट में जाते हैं, कुछ सरकारी में। मेरे यहां का बच्चा तो प्राइवेट में जाता है। साढ़े पांच सौ रुपया का तो बंधा हुआ खर्चा है। कभी-कभी, किसी-किसी महीने किसी चीज के लिए ज्यादा भी मांग लेते हैं। फिर मैं बच्चों की ओर मुड़ा। मोरों के बारे में पूछा। एक छोटे-से बच्चे से पूछा, कोई कविता याद है, उसने सुनाई ‘प्यारा हिंदुस्तान हमारा’। एक और बच्चे ने सुनाई ‘वह आता है काला हाथी’। सहसा कुछ खलबली हुई, उनकी बस आ रही थी। मैंने भी होटल की राह पकड़ी। सोचा, अगले दिन आऊंगा, वही गाड़ी लेकर, जिसमें दिल्ली से आया हूं। देखूंगा वे डेढ़-दो सौ मोर। 

पर, अगले दिन सुबह होटल परिसर के रेस्तरां से सुबह की चाय पीकर बाहर निकला तो देखा बारिश शुरू हो गई है। फिर भी ड्राइवर को मोबाइल पर फोन किया। वह गाड़ी लेकर आ गया। रात में उससे मोर चर्चा हो गई थी। बोला, अभी तो शायद मोर न दिखें, पर चलते हैं। कोई दो किलोमीटर निकल गए। आगे सड़क कच्ची थी। ऊबड़-खाबड़। पक्की हो रही थी। मैंने कहा, वापस चलते हैं। फिर कभी आना हुआ, तो देखेंगे। बारिश भी कुछ तेज हो गई थी। कार की खिड़की से नई बन रही बहुमंजिला फ्लैटों वाली इमारतें दिखाई पड़ीं। कुछ कोठीनुमा इमारतें भी, मुख्य सड़क पर। अगली बार कभी आना हुआ भी तो शायद मोर और दूर चले जाएंगे।... 


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