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कदाचार के लिए सैन्य अधिकारियों पर हो कार्रवाई : सुप्रीम कोर्ट PDF Print E-mail
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Wednesday, 17 September 2014 09:11



जनसत्ता ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से सवाल किया कि हथियारों की गैरकानूनी बिक्री में संलिप्तता स्वीकार करने वाले उन सैन्य अधिकारियों के खिलाफ कदाचार के लिए विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं की जा सकती जिन्होंने अपना अपराध कबूल किया था और जिन्हें मामूली जुर्माना करके और प्रताड़ित करके छोड़ दिया गया था।  

न्यायमूर्ति एचएल दत्तू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी से जानना चाहा कि हम इन अधिकारियों के खिलाफ कदाचार के लिए विभागीय कार्यवाही शुरू  करने को क्यों नहीं कह सकते। यह मामला (अधिकारियों के खिलाफ)सेना के अनुरूप नहीं है तो क्या हम कदाचार की जांच के लिए नहीं कह सकते। अटार्नी जनरल को 14 अक्तूबर को इस मामले की सुनवाई के दौरान इन सवालों के जवाब देने हैं।

कोर्ट अटार्नी जनरल के इस तर्क से संतुष्ट नहीं था कि दंड के रूप में पांच सौ रुपए का जुर्माना लगाकर या निंदा करके सैन्य अधिकारी को छोड़ने से उस पर दोषी ठहराए जाने का धब्बा हटता नहीं है। कानून और सेना की नजर में वह दोषी है और उसे कभी भी पदोन्नति नहीं मिलती है। रोहतगी ने जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि 2007 से शुरू  की गई कार्यवाही को उन अधिकारियों के खिलाफ नए सिरे से सुनवाई का निर्देश देकर इसे अपील में तब्दील नहीं किया जा सकता, जो पहले ही अपना दोष स्वीकार कर चुके हैं और विभिन्न रूप में उन्हें दंड दिया जा चुका है। इस पर जजों ने कहा कि इनके खिलाफ कदाचार के आरोप में विभागीय कार्रवाई तो हो सकती है। रोहतगी का कहना था कि उन अधिकारियों के खिलाफ जो इस याचिका में पक्षकार नहीं हैं, कोई भी कार्यवाही संविधान के अनुच्छेद 20 में दिए गए मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण होगा जो कहता है कि एक ही अपराध के लिए किसी व्यक्ति को एक से अधिक बार दोषी नहीं ठहराया जाएगा।

अटार्नी जनरल के इस पुरजोर विरोध को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि जनहित याचिका में ही विभागीय कार्रवाई शुरू  करने का अनुरोध किया गया है। चूंकि कदाचार का व्यापक भाव होता है, इसलिए इस पर गौर किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वकील अरविंद शर्मा की जनहित याचिका को इस मामले में सात साल हो चुके हैं लेकिन सीबीआइ जांच का उसका अनुरोध अभी भी बरकरार है और क्यों नहीं सीबीआइ जांच का अनुरोध स्वीकार किया जाए। रोहतगी ने कहा कि जिन पर पहले ही कार्यवाही हो चुकी है, उन लोगों के मामले में प्रथम अनुरोध की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत संविधान के अनुच्छेद 142 में प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल करके जनहित


यािचका का दायरा बढ़ाने की संभावना तलाश रही थी। अदालत ने कहा कि जनहित याचिका में कई बार हमने नए मापदंड निर्धारित किए हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि हमारे सामने विचारणीय विषय संस्थागत औचित्य से संबंधित है क्योंकि यह ऐसा मामला है जिसमें वरिष्ठ पदों पर तैनात सेना के उच्चाधिकारी जबलपुर डिपो से गैर मानक वाले हथियार खरीदने और उन्हें ऊंची कीमत पर बेचने के धंधे से जुड़े हैं।

न्यायाधीशों ने कहा कि उन्होंने दोष कबूल किया और उनसे सिर्फ पांच सौ रुपए का जुर्माना अदा करने के लिए कहा गया जबकि सड़क पर 250 रुपए चोरी करने वाला व्यक्ति जेल जाता है। तो क्या हम अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल नहीं कर सकते। जजों ने कहा कि फिर तो 20 रुपए की चोरी करने वाला व्यक्ति भी सवाल कर सकता है कि मैं क्यों तीन महीने के लिए जेल जाऊं। वह इस अदालत में आएगा और कहेगा कि कौन सा अपराध जघन्य है। उसका नहीं। इस नजरिए से सोचिए। अदालत ने कहा- सैन्य अधिकारियों ने डिपो से हथियार खरीदे और उन्हें हर आमोखास में बांट दिया। आतंकवादी भी लाइसेंसधारक हो सकता है। इस देश में क्या लाइसेंस प्राप्त करना मुश्किल है। डकैतों के पास भी लाइसेंस वाले कुछ हथियार हैं। अदालत ने कहा कि यह आवश्यक वस्तु की दुकान से सामान लेकर ऊंचे दाम पर बेचने जैसा हो गया।

       शीर्ष अदालत ने 26 अगस्त को संकेत दिया था कि सिर्फ दक्षिण पश्चिम कमान तक सीमित रखने की बजाय सभी कमान में जांच का आदेश देने पर विचार किया जा सकता है। दक्षिण पश्चिम कमान में ही इस कारोबार का पर्दाफाश हुआ था और मेजर, 

ले. कर्नल और कर्नल रैंक तक के अधिकारी इसका हिस्सा थे। कोर्ट ने अटार्नी जनरल से कहा था कि वह सरकार से निर्देश प्राप्त कर बताएं कि क्यों नहीं इस याचिका का दायर बढ़ाकर सभी कमान में जांच कराई जाए और क्यों नहीं दोषियों को दिया गया दंड निरस्त करके सारे मामले की नए सिरे से कोर्ट आॅफ इंक्वायरी का आदेश दिया जाए।

        अदालत को बताया गया था कि कोई भी सेवारत या सेवानिवृत्त अधिकारी सिर्फ एक हथियार खरीद सकता है लेकिन रिपोर्ट से पता चलता है कि एक अधिकारी ने तो अपने नाम से 17 बार इस सुविधा का लाभ उठाया। राजस्थान सरकार ने अदालत को बताया था कि ऐसे 15 मामलों में आरोप-पत्र दाखिल किए जा चुके हैं। अदालत ने सरकार से जानना चाहा था कि हथियारों की गैरकानूनी बिक्री में कथित रूप संलिप्त होने के बावजूद कुछ सैन्य अधिकारियों को सेवाा में क्यों रहने दिया जा रहा है।  

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