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आपदा के सबक PDF Print E-mail
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Tuesday, 16 September 2014 11:41

जनसत्ता 16 सितंबर, 2014: जम्मू-कश्मीर में जल-प्लावन की त्रासदी ने वहां लाखों लोगों को बेघर कर दिया है। एक सूचना के मुताबिक तीन सौ से अधिक लोग अब तक मौत के शिकार हुए हैं। अनेक लापता हैं या फिर बाहरी संसार से अलग-थलग पड़े हुए हैं। कहा जा रहा है कि ऐसा जल-तांडव इस प्रदेश में न पहले कभी हुआ था और न इसकी किसी ने कल्पना की थी। बाढ़ के कारण केसर, अखरोट और सेब की फसलें चौपट हो चुकी हैं। 

जल-प्लावन की यह विभीषिका चाहे पिछले वर्ष उत्तराखंड में हुई हो या फिर अब जम्मू-कश्मीर में, दोनों के पीछे का मुख्य कारण है प्रकृति की मानव के प्रति नाराजगी या उसका भयंकर रोष। एक सूचना के अनुसार जम्मू-कश्मीर में तबाही मचाने वाली बाढ़ के बारे में राज्य के बाढ़ नियंत्रण विभाग ने चार वर्ष पूर्व राज्य-प्रशासन को चेतावनी रिपोर्ट दे दी थी कि अगले पांच वर्षों में राज्य में भारी बाढ़ आने की आशंका है। रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया था कि श्रीनगर-जम्मू राजमार्ग बह सकता है जिससे घाटी देश के शेष हिस्सों से कट जाएगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि श्रीनगर के हवाई अड्डे तक जाने वाला मुख्य मार्ग भी डूब सकता है जिससे पूरी घाटी हवाई मार्ग से भी कट जाएगी। यह रिपोर्ट केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय को बाढ़ नियंत्रण के आवश्यक संसाधन जुटाने की खातिर 2200 करोड़ रुपए की फौरी मदद के लिए केंद्र-सरकार को भेजी गई थी। इस चेतावनी को क्यों अनदेखा किया गया, यह आने वाला समय ही बताएगा जब इस जल-प्लावन के कारणों की जांच होगी।

पर्यावरण-विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी आपदाओं के लिए प्राय: अत्यधिक या असामयिक बारिश, जलवायु में परिवर्तन, पेड़ों की अनाप-शनाप कटाई या फिर बढ़ता प्रदूषण जिम्मेदार होता है। अनियोजित विकास, खासकर नदियों के किनारे बेतरतीब निर्माण-कार्य भी ऐसी आपदा के लिए दोषी महत्त्वपूर्ण कारण हो सकते हैं। कश्मीर के एक पर्यावरणविद ने स्वीकार किया है कि बीते सौ वर्षों में पचास प्रतिशत से ज्यादा झीलों और तालाबों का अतिक्रमण कर उन पर इमारतें और सड़कें


बना दी गई हैं। झेलम/ वितस्ता नदी के दोनों किनारों पर भी ऐसा ही अवैध निर्माण हुआ है जिसके कारण नदी के बहाव में अवरोध उत्पन्न हुआ। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि जम्मू-कश्मीर में मौसम पूर्वानुमान की कोई पुख्ता प्रणाली नहीं है। अगर है भी तो वह  बेहद पुरानी है। आपदा-प्रबंधन के संसाधनों को भी और अधिक कारगर/पुख्ता बनाने की जरूरत है।

पर्यावरणविद अब यह मानने लगे हैं कि विश्व में जलवायु परिवर्तन व्यापक रूप ले रहा है। और इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। यही कारण है कि पूरी दुनिया में आए दिन प्राकृतिक आपदाएं देखने को मिल रही हैं। ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस, मोजाम्बिक, थाईलैंड, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बाढ़ और भूस्खलनों की निरंतरता बनी हुई है। और तो और, अमेरिका में तूफान और बर्फबारी आए दिन कहर बरपा रहे हैं। 

इन विनाशकारी लीलाओं को प्राकृतिक आपदा माना जाए या कथित आधुनिक विकास की देन, यह विवाद का विषय हो सकता है मगर इतना तय है कि कथित विकास की बुनियाद मुख्यतया प्रकृति के दोहन पर ही टिकी है। कुल मिलकर कथित विकास-विस्तार की लालसा में प्रकृति के दोहन या फिर उसके साथ किए जाने वाले खिलवाड़/ अनाचार ने हर क्षेत्र में मनुष्य की मुश्किलें बढ़ाई हैं और इसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार है।

शिबन कृष्ण रैणा, अलवर


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